उसर खेत फिर से हरा होगा: जिप्सम से मिट्टी सुधार के ५ असरदार स्टेप

बारिश के बाद खेत की मिट्टी सूखती है और ऊपर सफेद पपड़ी जम जाती है। बीज डाला तो अंकुर निकले, लेकिन दो हफ्ते बाद पौधे पीले पड़ने लगे। खाद डाली, पानी भी दिया, फिर भी फसल रेंग रही है। अगर यह हाल आपके किसी खेत का है, तो दिक्कत शायद खाद या बीज में नहीं, मिट्टी में है। यही उसर या क्षारीय मिट्टी का लक्षण है। उत्तर प्रदेश में करीब १२ लाख हेक्टेयर भूमि नमकीन-क्षारीय समस्या से जूझ रही है, और अच्छी खबर यह है कि यह जमीन बंजर नहीं रहनी चाहिए। सही तरीके से जिप्सम सुधार करने पर यही खेत कुछ सीजन में फिर उपज देने लगता है।
पहले पहचानें: उसर मिट्टी के ४ निशान
जिप्सम डालने से पहले यह पक्का करें कि समस्या सच में क्षारीयता की है। चार लक्षण देखें। खेत सूखने पर मिट्टी की सतह पर सफेद या भूरी पपड़ी दिखती है। पानी खेत में देर तक ठहरता है, रिसता नहीं। बीज का जमाव कमजोर होता है और पौधे शुरू में ही पीले पड़ते हैं। गीली मिट्टी हाथ में लेने पर साबुन जैसा चिकनापन महसूस होता है। ये चारों लक्षण एक साथ दिखें तो मिट्टी जांच करवाना जरूरी है। अनुमान पर जिप्सम डालना पैसे की बर्बादी हो सकती है, क्योंकि मात्रा मिट्टी की गंभीरता पर निर्भर करती है।
मिट्टी जांच: नमूना ऐसे लें
मिट्टी परीक्षण के लिए खेत की वह जगह चुनें जहां सफेद पपड़ी सबसे ज्यादा दिखे। वहां गड्ढा करके चार गहराई से नमूने लें: ० से १५ सेमी, १५ से ३० सेमी, ३० से ६० सेमी और ६० से ९० सेमी। लवण कितनी गहराई तक हैं, यह जानना जरूरी है क्योंकि जिप्सम की मात्रा इसी पर तय होती है। नमूने मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में जांच करवाएं; pH और सोडियम (ESP) देखकर मात्रा तय करें।
जिप्सम कितना: ६ से १२ टन प्रति हेक्टेयर
अनुभव के मुताबिक सतही १५ सेमी मिट्टी के सुधार के लिए करीब ६ से १२ टन जिप्सम प्रति हेक्टेयर लगता है। गंभीरता कम हो तो ६ टन काफी, बहुत क्षारीय खेत में १२ टन तक जाना पड़ता है। बलुई में कम, दोमट में मध्यम और चिकनी मिट्टी में ज्यादा मात्रा लगती है। जिप्सम सबसे सस्ता और असरदार सुधारक है क्योंकि इसका कैल्शियम मिट्टी के सोडियम को हटाकर उसकी जगह ले लेता है। जिप्सम का असर धीरे दिखता है; एक-दो सीजन में मिट्टी की बनावट बदलने लगती है।
सुधार के ५ स्टेप
स्टेप १: सही समय चुनें। उसर सुधार साल भर हो सकता है, लेकिन सबसे अच्छा समय गर्मी का महीना है। गर्मी में मिट्टी की पानी सोखने की शक्ति सबसे ज्यादा होती है, जिससे लवण नीचे धकेलने की क्रिया आसान हो जाती है।
स्टेप २: खेत तैयार करें। खेत को समतल करके ५-६ मीटर चौड़ी लंबी क्यारियां बनाएं और चारों तरफ ४५ सेमी ऊंची मेढ़ लगाएं ताकि पानी खेत में रुके। जल निकास की नाली भी पहले से साफ कर लें।
स्टेप ३: जिप्सम मिलाएं। संस्तुत मात्रा का जिप्सम खेत में समान रूप से बिखेरें और १० सेमी गहराई तक जुताई करके मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें। जिप्सम जितना बारीक, उतना असरदार।
स्टेप ४: पानी भरकर रिसाव कराएं। खेत में १२ से १५ सेमी पानी भरकर १० से १५ दिन छोड़ दें। फिर ७-८ दिन बाद बचा पानी निकालकर दोबारा इतना ही पानी भरें। घुले लवण नीचे चले जाते हैं, ऊपरी सतह साफ होती जाती है।
स्टेप ५: धैर्य रखें, जल्दबाजी न करें। रिसाव क्रिया पूरी होने के बाद पहली फसल धान की लें। सुधार के बाद २-३ साल तक पहली फसल धान ही लेनी चाहिए, उसके बाद गन्ना लगाएं।
खर्च घटाने का रास्ता: प्रेसमड और गोबर की खाद
जिप्सम की पूरी मात्रा खरीदना छोटे किसान के लिए भारी पड़ सकता है। यहां चीनी मिल का प्रेसमड काम आता है। सिफारिश है कि जिप्सम की आधी मात्रा के साथ १० टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद या १० टन प्रेसमड या १० टन फ्लाईऐश मिलाकर डालें। प्रेसमड का कैल्शियम सल्फेट सोडियम हटाता है और जैविक पदार्थ मिट्टी की सेहत सुधारता है। हरदोई में हुए एक अध्ययन में जिप्सम-प्रेसमड के मिले-जुले उपयोग से फसल उत्पादकता दोगुनी पाई गई थी। भारत में हर साल करीब १.२ करोड़ टन प्रेसमड बनता है, जो मिल के आसपास आसानी से मिलता है। कुछ जिलों में सरकार रियायती दर पर जिप्सम भी देती है; एक योजना के तहत करीब ५४ रुपये प्रति बोरी की दर से अधिकतम २ हेक्टेयर के लिए १२ बोरी तक जिप्सम मिलता है। अपने जिले के कृषि विभाग से वर्तमान व्यवस्था जरूर पूछें।
सुधार के बाद गन्ना: खाद में दो बदलाव
जब खेत सुधार जाए और गन्ना लगाने की बारी आए, तो खाद में दो बदलाव करें। सुधरी हुई उसर भूमि में सामान्य खेत की तुलना में २५ प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन दें और २५ किलो प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट जरूर डालें। क्षारीय मिट्टी में जिंक की कमी आम है और गन्ने की बढ़वार पर इसका सीधा असर पड़ता है। पहली गन्ना फसल में उम्मीद मध्यम रखें; मिट्टी २-३ सीजन में पूरी तरह सामान्य होती है।
तीन गलतियां जो सुधार बिगाड़ देती हैं
पहली: बिना जांच के अंदाजे से जिप्सम न डालें; कम मात्रा बेकार जाती है, ज्यादा पैसे की बर्बादी। दूसरी: रिसाव में पानी न रोकना; बिना पानी के लवण नीचे नहीं जाते। तीसरी: तुरंत गन्ना न लगाएं; पहले धान की फसल मिट्टी नरम करती है और बचे लवण धुलते हैं।
मुख्य बातें
- उसर खेत की पहचान सफेद पपड़ी, पानी न रिसना और कमजोर जमाव से करें; बिना मिट्टी जांच के जिप्सम न डालें।
- जिप्सम ६ से १२ टन प्रति हेक्टेयर, गर्मी के महीने में, १२-१५ सेमी पानी भरकर दो बार रिसाव कराएं।
- खर्च घटाने के लिए आधी जिप्सम मात्रा के साथ १० टन प्रति हेक्टेयर प्रेसमड या गोबर की खाद मिलाएं; सुधार के बाद २-३ साल धान, फिर गन्ना लगाएं।
स्रोत: कृषि जागरण (क्षारीय-लवणीय मिट्टी सुधार विधि), पंचायत खबर (जिप्सम-प्रेसमड संस्तुति), उत्तर प्रदेश सोडिक भूमि सुधार परियोजना अध्ययन, SciDev.Net/फिज़.ऑर्ग (हरदोई प्रेसमड अध्ययन), न्यूज़18 लोकल18 आजमगढ़ (रियायती जिप्सम वितरण)।
