लाल सड़न से टूट रही खेती को नया सहारा: गन्ने की 4 नई किस्में, 100 टन तक उपज

लाल सड़न नाम का रोग पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश के कई गन्ना किसानों की कमर तोड़ चुका है। फसल खड़ी थी, पर भीतर से खोखली। मिल पहुंचने से पहले ही उपज घट जाती थी। अब इसी दर्द का जवाब ग्रेटर नोएडा से आया है। इंटरनेशनल ट्रेड शो में चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग के स्टॉल पर गन्ने की चार नई उन्नत किस्मों का प्रदर्शन हुआ है, जिनके बारे में दावा किया जा रहा है कि वे लाल सड़न रोग का डटकर मुकाबला कर सकती हैं।
ट्रेड शो में क्यों हुआ इनका प्रदर्शन
ग्रेटर नोएडा में चल रहे इंटरनेशनल ट्रेड शो में विभाग ने ये किस्में किसानों और उद्योग के सामने रखी हैं। मकसद सीधा है: प्रदेश में गन्ने की उत्पादकता बढ़ाना, चीनी परता बेहतर करना और किसानों की आय में इजाफा। उत्तर प्रदेश गन्ना अनुसंधान परिषद (UPCSR) ने इन किस्मों को विकसित किया है। विभाग का कहना है कि ये किस्में प्रदेश की मिट्टी और मौसम के हिसाब से तैयार की गई हैं, ताकि किसान इन्हें अपनाने में किसी मुश्किल का सामना न करें।
ट्रेड शो में प्रदर्शन का मतलब यह भी है कि विभाग इन्हें जल्द से जल्द किसानों तक पहुंचाना चाहता है। ऐसे आयोजन किसानों को सीधे वैज्ञानिकों और अधिकारियों से बात करने का मौका देते हैं, जिससे किस्म की असली खूबियां और खामियां समझने में मदद मिलती है।
इन किस्मों के नाम और खासियत
प्रदर्शित चारों किस्मों के नाम हैं: को.शा. 19231, को.शा. 18231, को.शा. 13235 और को.शा. 17231। इनकी उपज क्षमता लगभग 90 से 100 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। यह संख्या इसलिए अहम है, क्योंकि प्रदेश की औसत उपज इससे काफी नीचे चल रही है। एक ही खेत से ज्यादा गन्ना मतलब मिल को ज्यादा आपूर्ति और किसान की जेब में ज्यादा पैसा।
सबसे बड़ा दावा रोग-प्रतिरोध का है। इन किस्मों में गन्ने के प्रमुख रोग लाल सड़न (रेड रॉट) के प्रति रोगरोधी या प्रतिरोधी प्रवृत्ति पाई गई है। इसके अलावा इनमें अंकुरण और शुरुआती बढ़वार अच्छी होती है। तेज शुरुआत का मतलब है कि फसल जल्दी खड़ी हो जाती है और शुरुआती दौर में खरपतवार से बेहतर तरीके से लड़ पाती है।
मिल में पेराई योग्य गन्नों की संख्या भी इन किस्मों में अधिक रहती है। इससे खेत से मिल तक गन्ने की बर्बादी कम होती है और चीनी उत्पादन बढ़ने की संभावना रहती है।
पेड़ी फसल में भी फायदा
इन किस्मों की एक और खासियत अच्छी पेड़ी क्षमता बताई गई है। पेड़ी फसल का मतलब है कि गन्ना कटने के बाद जड़ से दोबारा फूटने वाली फसल। अच्छी पेड़ी का सीधा फायदा किसान की लागत में कटौती है। दोबारा बुवाई, नई गन्ना बीज और जुताई का खर्च बच जाता है। पेड़ी फसल का बेहतर उत्पादन होने से कम लागत में अच्छा उत्पादन मिल सकता है। यह बात उन छोटे और सीमांत किसानों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, जिनके लिए हर सीजन की बुवाई लागत एक बोझ होती है।
किसान के लिए असली सवाल: अब क्या करें
नई किस्में आती हैं, पर खेत तक पहुंचती कैसे हैं, यह हर बार का सवाल है। किस्म अपनाने से पहले कुछ बातें ध्यान रखें।
सबसे पहले, अपनी गन्ना समिति या चीनी मिल के गन्ना विकास विभाग से इन किस्मों की उपलब्धता के बारे में पूछताछ करें। नई किस्मों का बीज शुरुआत में सीमित मात्रा में आता है, और समितियों या मिलों के माध्यम से ही यह किसानों तक पहुंचता है। जानकारी के लिए विभाग के स्टॉल पर या अपने क्षेत्र के गन्ना पर्यवेक्षक से संपर्क किया जा सकता है।
दूसरी बात, बीज की गुणवत्ता। नई किस्म भी पुरानी फसल से लिए गए रोगग्रस्त गड्ढों से लगाई जाए तो फायदा आधा रह जाता है। स्वस्थ, रोग-मुक्त बीज चुनें। गन्ना बीज को बोने से पहले उपचारित करने की सलाह कृषि विभाग लंबे समय से देता आ रहा है, और नई किस्मों पर भी यही नियम लागू होता है।
तीसरी और सबसे अहम बात, लाल सड़न से जूझ रहे खेतों में सिर्फ किस्म बदलना ही काफी नहीं है। खेत की स्वच्छता बनाए रखें। रोगग्रस्त पौधे दिखें तो उन्हें तुरंत हटाकर नष्ट करें, ताकि रोग आगे न फैले।
चीनी उत्पादन पर भी नजर
गन्ने की किस्में सिर्फ किसान की उपज नहीं, पूरे चीनी उद्योग की सेहत तय करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में लाल सड़न और मौसम की मार ने उत्पादन पर असर डाला है। विभाग का मानना है कि नई उन्नत किस्मों के व्यापक उपयोग से गन्ने की उत्पादकता के साथ चीनी उत्पादन भी बढ़ेगा। यानी इस खबर का फायदा खेत से मिल तक पूरे तंत्र को मिलने की उम्मीद है।
मुख्य बातें
- ग्रेटर नोएडा ट्रेड शो में गन्ने की 4 नई उन्नत किस्मों का प्रदर्शन: को.शा. 19231, को.शा. 18231, को.शा. 13235 और को.शा. 17231।
- इन किस्मों की उपज क्षमता लगभग 90 से 100 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है।
- लाल सड़न रोग के प्रति रोगरोधी/प्रतिरोधी प्रवृत्ति इनकी सबसे बड़ी खासियत है।
स्रोत: नईदुनिया (29 सितंबर 2026), दैनिक समवाद (29 सितंबर 2026), न्यूज ट्रैक (29 सितंबर 2026)
