ट्यूबवेल से आधी सिंचाई बर्बाद? खाल और पंप के 5 काम जो पानी और बिजली दोनों बचाएंगे

मुजफ्फरनगर के एक किसान ने इस बार हिसाब लगाया तो खुद हैरान रह गए। ट्यूबवेल पूरे दो घंटे चला, मगर खेत के आखिरी छोर तक पहुँचते-पहुँचते पानी की धार आधी रह गई। रास्ते में कच्ची खाल ने ही आधा पानी पी लिया था। यह कहानी अकेले उनकी नहीं है। पश्चिमी यूपी के गन्ना बेल्ट में ज्यादातर खेतों में पानी खेत तक पहुँचने से पहले ही रास्ते में घट जाता है, और किसान को लगता है कि बोर कमजोर हो गया है।
असल में बोर अक्सर ठीक होता है, रास्ता खराब होता है। खाल सुधारना, पाइप बिछाना और पंप की छोटी-छोटी देखभाल, यही काम सिंचाई का खर्च घटाते हैं और गन्ने को समय पर पूरा पानी देते हैं।
खाल में पानी कहाँ गुम होता है
कच्ची खाल की मिट्टी पानी सोखती है, खासकर सूखी और रेतीली मिट्टी में। टूटे हुए किनारों से पानी बाहर बह जाता है, चूहों के बिल धार को बाँट देते हैं, और खाल में उगी घास पानी की रफ्तार रोकती है। खाल जितनी लंबी होगी, नुकसान उतना ज्यादा होगा। इसीलिए दूर वाला खेत हमेशा कम पानी पाता है, जबकि पंप के पास वाला खेत डूब जाता है।
पहला काम जाँच का है। पंप चालू करके देखें कि खेत के सिरे तक पानी पहुँचने में कितना समय लगता है, और रास्ते में कहाँ पानी रुकता या किनारे से बाहर निकलता है। जिन जगहों पर पानी ठहरता है, वहीं मरम्मत की जरूरत है।
पक्की खाल या पाइप, क्या चुनें
पक्की खाल एक बार का खर्च है, जिसका फायदा कई साल तक मिलता है। किनारे पक्के होने से रिसाव रुकता है और धार सीधी खेत तक जाती है। जोड़ों को सीमेंट से सील कराना जरूरी है, क्योंकि खुला जोड़ भी पानी चुराता है।
जहाँ पक्की खाल बनवाना मुमकिन नहीं, वहाँ पीवीसी पाइप या लचीली पाइप अच्छा विकल्प है। पाइप में पानी रास्ते में लगभग नहीं घटता, खेत की मेड़ भी बचती है, और पाइप को एक खेत से दूसरे खेत तक ले जाना आसान रहता है। खर्च की तुलना एक सीजन में बचने वाले बिजली या डीजल के बिल से भी करें।
पंप की देखभाल के 5 काम
पंप की हालत सिंचाई की लागत सीधे तय करती है। कमजोर पंप ज्यादा देर चलता है और ज्यादा बिजली या डीजल खाता है।
फुटवाल्व और जोड़ कसें। रिसता हुआ जोड़ हवा खींचता है, जिससे पंप को पानी उठाने में ज्यादा जोर लगाना पड़ता है। जहाँ से पानी टपकता दिखे, वहाँ वॉशर बदलें या जोड़ कसें।
बेल्ट और पुली देखें। ढीली बेल्ट फिसलती है और पंप की रफ्तार घट जाती है। बेल्ट पर दरारें दिखें तो उसे बदल देना ही सस्ता पड़ता है।
मोटर की गर्मी और आवाज पर ध्यान दें। बदली हुई आवाज या सामान्य से ज्यादा गर्मी सर्विस का संकेत है। पंप को बिना पानी के सूखा न चलाएँ, इससे वह जल्दी खराब होता है।
कम वोल्टेज पर जबरन न चलाएँ। कम वोल्टेज पर मोटर ज्यादा करंट खींचती है और जलने का खतरा बढ़ता है। स्टार्टर और केबल की हालत भी साथ में जाँच लें।
सीजन की पहली सिंचाई से पहले सर्विस कराएँ। बोर की जाली साफ कराना, पाइप की जाँच और ग्रीसिंग जैसे काम पहले निपटा लें। बीच सीजन में पंप खराब होना सबसे महँगा पड़ता है, क्योंकि तब गन्ने को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
पानी देने का सही तरीका
सुबह जल्दी या शाम को सिंचाई करने से धूप में उड़ने वाला पानी कम होता है। दोपहर की तेज धूप में खेत में डाला गया पानी का एक हिस्सा भाप बनकर उड़ जाता है।
पानी की मात्रा मिट्टी देखकर तय करें। मुट्ठी में मिट्टी दबाकर देखें, अगर वह आसानी से बँध जाती है तो नमी अभी बाकी है। जरूरत से ज्यादा पानी देना भी नुकसान करता है, क्योंकि गन्ने की जड़ों को हवा नहीं मिल पाती।
सरकारी मदद भी है, शर्तें जान लें
सिंचाई का खर्च घटाने के लिए सरकार की कुछ योजनाएँ सीधे काम आती हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यूपी की मुख्यमंत्री लघु सिंचाई योजना के तहत मध्यम गहरे नलकूप पर 12 बीघा या उससे अधिक जमीन वाले किसान आवेदन कर सकते हैं। करीब 60 हजार रुपये गारंटी जमा करने पर करीब 1.75 लाख रुपये तक का अनुदान, विद्युतीकरण के लिए करीब 68 हजार रुपये और जल वितरण के लिए करीब 14 हजार रुपये तक की सहायता बताई गई है, साथ में 50 मीटर रबर पाइप भी दिया जाता है। शर्त यह भी है कि प्रस्तावित स्थान के 100 मीटर के दायरे में पहले से कोई अन्य ट्यूबवेल न हो। नियम और राशि बदल सकते हैं, इसलिए आवेदन से पहले जिला कृषि या लघु सिंचाई कार्यालय से पुष्टि जरूर करें।
सौर पंप का विकल्प भी है। मेरठ के जिला कृषि अधिकारी के हवाले से खबरों में बताया गया है कि पीएम-कुसुम योजना के तहत 2 एचपी या 3 एचपी के सौर ट्यूबवेल पर 60 प्रतिशत तक का अनुदान मिल सकता है, जिससे दिन में सिंचाई की सुविधा मिलती है और बिजली बिल का बोझ घटता है। इस योजना में बोरिंग की व्यवस्था किसान को खुद करनी होती है।
ड्रिप सिंचाई पर भी यूपी में मदद मिल रही है। गन्ना विकास विभाग के हवाले से खबरों में बताया गया है कि 2025-26 में ड्रिप के लिए 25 हजार हेक्टेयर का लक्ष्य है, जिसमें लघु और सीमांत किसानों को 90 प्रतिशत तक और अन्य किसानों को 80 प्रतिशत तक अनुदान मिलेगा। विभाग के अनुसार ड्रिप से पारंपरिक तरीकों की तुलना में 50 प्रतिशत तक पानी बचता है।
पंप से निकला हर लीटर खेत तक पहुँचे, यही सिंचाई की असली बचत है।
मुख्य बातें
- कच्ची खाल, टूटे किनारे और रिसते जोड़ ही सिंचाई के पानी का सबसे बड़ा नुकसान करते हैं, पहले इन्हीं की जाँच करें।
- पक्की खाल या पीवीसी पाइप से पानी सीधा खेत तक पहुँचता है, और पंप की सर्विस से बिजली व डीजल की बचत होती है।
- योजनाओं का लाभ लेने से पहले जिला कार्यालय से पात्रता और ताजा नियम पूछें।
स्रोत: दैनिक जागरण, न्यूज़18, किसान समाधान और ज़ी न्यूज़ की रिपोर्टें; यूपी गन्ना विकास विभाग की योजना जानकारी।
