सिंभावली की 3 चीनी मिलें बिकेंगी: 5 नवंबर को बोली, 25 कंपनियां दौड़ में

हापुड़ और बहराइच के गन्ना किसानों के मन में इस वक्त एक ही सवाल घूम रहा है। इस पेराई सत्र में हमारी मिल चलेगी या नहीं। गन्ना खेत में तैयार खड़ा है और मिल का भविष्य बोली की मेज पर टिका है। अब इस सवाल का जवाब मिलने की तारीख भी सामने आ गई है। सिंभावली समूह की तीन चीनी मिलों के लिए 5 नवंबर को बोली लगने की संभावना है।
दैनिक जागरण की 28 अक्टूबर की खबर के मुताबिक बिक्री की तैयारी वाली मिलें तीन हैं। हापुड़ जिले की सिंभावली और बृजनाथपुर चीनी मिल, और बहराइच जिले की चिलवरिया चीनी मिल। तीनों मिलें कर्ज के बोझ तले दबी हैं और इनका संचालन अधर में लटका हुआ है। खबर के अनुसार अब तक 25 बड़ी कंपनियों और औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधिमंडल मिलों का दौरा कर चुके हैं। यानी खरीदारों की दिलचस्पी कागज पर नहीं, जमीन पर दिख रही है।
बोली से पहले क्या क्या हो चुका है
बिक्री की प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई है। इसके पीछे लंबी कानूनी कहानी है। सिंभावली शुगर्स लिमिटेड 11 जुलाई 2024 से कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) से गुजर रही है। कंपनी के अपने रिकॉर्ड के मुताबिक उसी दिन से निदेशक मंडल की शक्तियां निलंबित हैं और अंतरिम समाधान पेशेवर (आईआरपी) के तौर पर सीए अनुराग गोयल कंपनी की संपत्तियों और संचालन की देखरेख कर रहे हैं।
रास्ते में एक लंबा ठहराव भी आया। एनसीएलएटी ने जुलाई 2024 में सीआईआरपी पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जो 13 जुलाई 2026 को हटी। इसके बाद 13 अक्टूबर 2026 को लेनदारों की समिति (सीओसी) की बैठक हुई। अब खबर यह है कि न्यायालय से बिक्री प्रक्रिया को हरी झंडी मिलने के बाद आईआरपी की ओर से फार्म-जी जारी किया जा चुका है। फार्म-जी का मतलब सीधा है। इच्छुक खरीदारों से औपचारिक रूप से रुचि मांगी जा चुकी है और बोली की जमीन तैयार है।
शासन ने इस प्रक्रिया में एक शर्त भी जोड़ दी है। मिलों को खरीदने की इच्छुक कंपनियों से पेराई सत्र चलाने की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) मांगी गई है। सरकार सिर्फ मिल बेचना नहीं चाहती, वह यह भी तय करना चाहती है कि नया मालिक सत्र चलाएगा और किसानों का गन्ना लेगा।
किसानों के लिए सबसे बड़ा सवाल: भुगतान और पेराई
मिल बिके या न बिके, किसान के लिए दो चीजें ही मायने रखती हैं। उसका गन्ना समय पर तुल जाए और उसका पैसा समय पर मिल जाए। इसी मोर्चे पर सिंभावली क्षेत्र के किसानों की चिंता गहरी है। अमर उजाला की 25 अक्टूबर की खबर के मुताबिक हापुड़ की दोनों मिलों से जुड़े किसानों का करीब 160 करोड़ रुपये का भुगतान अटका हुआ है। मिल कर्मचारियों का करोड़ों रुपये का वेतन भी बकाया बताया गया है।
इसी खबर में किसानों की नाराजगी की एक और वजह सामने आई है। दस गांवों से सिंभावली और ब्रजनाथपुर मिल के क्रय केंद्र हटाने की मांग उठी है। किसानों ने गन्ना समिति के सचिवों को प्रस्ताव दिए हैं और मुख्य सचिव के यहां अपील की तैयारी चल रही है। जब मिल का संचालन ही अनिश्चित हो, तो किसान अपना केंद्र ऐसी मिल से जोड़ना चाहता है जो गन्ना ले सके और पैसा दे सके।
जागरण की खबर में आईआरपी अनुराग गोयल का पक्ष भी दर्ज है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट के मानकों के अनुसार पिछले वर्षों की तुलना में बेहतर भुगतान किया गया है, लेकिन इसके बावजूद क्रय केंद्र काट दिए गए। उनका तर्क है कि जब गन्ना ही नहीं मिलेगा तो मिल चलेगा कैसे, इसलिए बिक्री ही एकमात्र विकल्प बचा है। वहीं जिला गन्ना अधिकारी अंगद सिंह का कहना है कि प्रशासन का उद्देश्य मिल का संचालन कराना और किसानों का भुगतान कराना है, मिल कोई भी चलाए।
5 नवंबर के बाद दो रास्ते
5 नवंबर को बोली लगती है और प्रक्रिया समय से पूरी होती है, तो एक उम्मीद बनती है। नया खरीदार पेराई सत्र के संचालन की तैयारी कर सकता है और मिलें इसी सत्र में चल सकती हैं। यह वह नतीजा है जिसका इंतजार हापुड़ और बहराइच के किसान कर रहे हैं।
दूसरा रास्ता देरी का है। अगर बोली टलती है या खरीदार की योजना और कागजी प्रक्रिया में वक्त लगता है, तो किसानों और कर्मचारियों को इंतजार करना पड़ सकता है। पेराई सत्र का कैलेंडर किसी का इंतजार नहीं करता। गन्ना खेत में ज्यादा दिन खड़ा रहे तो वजन और मिठास दोनों पर असर पड़ता है। इसीलिए 5 नवंबर की तारीख सिर्फ एक बोली की तारीख नहीं है। यह इस सत्र की दिशा तय करने वाली तारीख बन गई है।
एक बात और समझने वाली है। जागरण की खबर के मुताबिक सिंभावली चीनी मिल वर्ष 1933 से किसानों के गन्ने को मिठास में बदल रही है। करीब नौ दशक पुरानी मिल के बिकने की खबर क्षेत्र के लिए सिर्फ एक कारोबारी घटना नहीं है, क्योंकि हजारों परिवारों की रोजी इससे जुड़ी है।
किसान अभी क्या करें
बोली का नतीजा आने तक किसानों के लिए सबसे समझदारी वाला काम कागज और संपर्क दुरुस्त रखना है। अपनी पर्ची, तौल और भुगतान का रिकॉर्ड संभालकर रखें। अपनी गन्ना समिति से यह पूछते रहें कि आपका केंद्र किस मिल से जुड़ा है और उसमें कोई बदलाव तो नहीं हो रहा। केंद्र बदलवाने के नाम पर कोई व्यक्ति पैसे मांगे तो उसे कुछ न दें और समिति या जिला गन्ना कार्यालय से इसकी जानकारी लें। गन्ना बेचने की जल्दबाजी में क्रशर के हवाले करने से पहले भी समिति से मिल की स्थिति जरूर पूछ लें, क्योंकि क्रशर पर भाव और तौल दोनों में किसान अक्सर घाटे में रहता है।
5 नवंबर को क्या होता है, इस पर नजर रहेगी। बोली लगती है या टलती है, नया खरीदार कौन होता है और एसओपी में पेराई और भुगतान को लेकर क्या वादा किया जाता है, ये तीन बातें ही तय करेंगी कि हापुड़ और बहराइच के किसानों का यह सत्र कैसा बीतेगा।
मुख्य बातें
- सिंभावली, बृजनाथपुर और चिलवरिया चीनी मिलों के लिए 5 नवंबर को बोली लगने की संभावना है; अब तक 25 कंपनियां मिलों का दौरा कर चुकी हैं।
- बिक्री की प्रक्रिया में आईआरपी की ओर से फार्म-जी जारी हो चुका है और शासन ने खरीदारों से पेराई सत्र चलाने की एसओपी मांगी है।
- हापुड़ क्षेत्र के किसानों का करीब 160 करोड़ रुपये का भुगतान अटका बताया गया है, इसलिए बोली का नतीजा इस सत्र की पेराई और भुगतान दोनों को प्रभावित करेगा।
स्रोत: दैनिक जागरण (28 अक्टूबर 2026), अमर उजाला (25 अक्टूबर 2026), सिंभावली शुगर्स लिमिटेड के सीआईआरपी रिकॉर्ड।
