₹1,936 करोड़ के गन्ना बकाए पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर: 15% ब्याज अब किसान को कैसे मिलेगा

6 अक्टूबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट में चीनी मिलों और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं का निस्तारण कर दिया। इनमें इलाहाबाद हाई कोर्ट की कार्यवाही को चुनौती दी गई थी। इसके पीछे का आंकड़ा बड़ा है, ₹1,936 करोड़।
यह वह बकाया है जो वसूली प्रमाणपत्रों के जरिए मिलों से वसूला जाना था। इसमें ₹1,087 करोड़ मूल बकाया और ₹849.5 करोड़ 15% का ब्याज है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 31 अगस्त को दर्ज किया कि ब्याज के मद में “अभी तक एक पैसा भी वसूल नहीं किया गया है”।
कुछ मामले 1990 के दशक तक के हैं। पेराई का नया सीजन 20 अक्टूबर के आसपास शुरू होने जा रहा है, और त्योहारों के दिनों में आई यह खबर किसानों के लिए सिर्फ कागजी जीत नहीं है।
सरकार ने क्या दलील दी, और कोर्ट ने क्यों नहीं मानी
सरकार के दो तर्क थे। पहला, आर्थिक तंगी से जूझ रही मिलों पर 15% ब्याज का दबाव उन्हें दिवालिया कर सकता है, और मिलें बंद हो गईं तो नुकसान किसानों का ही होगा। दूसरा, उत्तर प्रदेश गन्ना (आपूर्ति और खरीद विनियमन) अधिनियम, 1953 की धारा 17(3) में ब्याज कम करने या माफ करने का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों तर्कों को ठुकरा दिया। अदालत ने दोहराया कि गन्ना देने के 14 दिनों के भीतर भुगतान और देरी पर 15% ब्याज किसानों को कर्ज के जाल से बचाने के लिए अनिवार्य सुरक्षा उपाय हैं।
यह 14 दिन की सीमा हवाई बात नहीं है। केंद्र के चीनी (नियंत्रण) आदेश, 1966 की धारा 3(3) कहती है कि मिल को गन्ना डिलीवरी के 14 दिन के भीतर भुगतान करना होगा, और धारा 3(3-A) में लिखा है कि 14 दिन से ज्यादा की देरी पर बकाए पर 15% सालाना ब्याज देना होगा। यानी यह हक 60 साल पुराने कानून से मिलता है।
एक बात समझनी जरूरी है
यहां एक भ्रम दूर कर लें। सुप्रीम कोर्ट ने खुद ब्याज माफ करने या 15% की दिशा रद्द करने पर कोई फैसला नहीं दिया। उसने सरकार और मिल एसोसिएशन की याचिकाओं का निस्तारण किया और उन्हें छूट दी कि वे ब्याज में कमी या माफी की अर्जी कानून के अनुसार इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने रख सकते हैं। हाई कोर्ट उस अर्जी पर विचार करके उचित आदेश देगा।
मतलब, मिलों को राहत भी नहीं मिली और ब्याज का रास्ता बंद भी नहीं हुआ। असली लड़ाई अब हाई कोर्ट के सामने होगी, जहां वसूली की निगरानी पहले से चल रही है।
12% बनाम 15% का खेल भी खुला
एक और अहम बात। पहले 15% ब्याज का निर्देश दिए जाने के बावजूद कुछ वसूली प्रमाणपत्र 12% की गणना पर जारी कर दिए गए थे। हाई कोर्ट ने इस पर अधिकारियों को फटकारा। यानी ब्याज की दर में कोई छेड़छाड़ नहीं चलेगी, 15% का मतलब 15% ही है।
2023-24 का आंकड़ा क्या कहता है
यह सिर्फ पुराने बकाए की कहानी नहीं है। कोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि 2023-24 में 36 जिलों में किसानों को राज्य परामर्शित मूल्य (SAP) के आधार पर करीब ₹35,893 करोड़ का भुगतान होना था। इसमें से सिर्फ 48.70%, यानी ₹17,478 करोड़, 14 दिन की कानूनी सीमा में दिया गया। बाकी 51.24%, करीब ₹18,391 करोड़, देरी से पहुंचा। इस देरी पर 15% ब्याज करीब ₹614.74 करोड़ बनता है, और अदालत को बताया गया कि इसका भी एक रुपया वसूल नहीं हुआ है।
यानी कानून कागज पर मजबूत है, पर जमीन पर उसका पालन आधा-अधूरा है।
किसानों की इस लड़ाई की जड़
यह मामला कोर्ट तक किसी सरकारी पहल से नहीं पहुंचा। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के मुखिया सरदार वीएम सिंह की याचिका पर हाई कोर्ट ने दशकों से लंबित गन्ना भुगतान पर 15% ब्याज देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ मिल मालिकों और उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
गोला गोकर्णनाथ में संगठन के जिलाध्यक्ष अंजनी कुमार दीक्षित ने इसे किसानों की बड़ी जीत बताया और हर किसान से बकाया ब्याज का हिसाब मांगने की अपील की।
नया सीजन आ रहा है, किसान यह करें
20 अक्टूबर के आसपास मिलें पेराई के लिए खुलने वाली हैं। इसका मतलब यह है कि नया गन्ना देने के दिन से ही 14 दिन की घड़ी शुरू हो जाएगी।
पहली बात, पर्ची और तौल की पर्ची संभालकर रखें। यही दोनों कागज बाद में बकाए और ब्याज के दावे का आधार बनते हैं। दूसरी बात, अगर 14 दिन से ज्यादा देर हो तो शिकायत दर्ज कराने में झिझकें नहीं। गन्ना विकास विभाग का 24x7 टोल-फ्री किसान कॉल सेंटर 1800-121-3203 इस काम के लिए है। इस नंबर पर समस्या सुनने के बाद शिकायत संबंधित जिला अधिकारियों को भेजी जाती है, और निस्तारण की सूचना एसएमएस से मिलती है।
तीसरी बात, ई-गन्ना ऐप और caneup.in पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज हो सकती है। कानून आपके साथ है, पर दावा आपको ही करना पड़ेगा।
मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्टूबर को चीनी मिलों और UP सरकार की याचिकाएं खारिज कीं, 14 दिन में भुगतान और 15% ब्याज का नियम कायम रहा।
- ₹1,936 करोड़ के बकाए (₹1,087 करोड़ मूल + ₹849.5 करोड़ ब्याज) में से ब्याज का एक रुपया भी अब तक वसूल नहीं हुआ है।
- ब्याज में कमी या माफी की अर्जी अब इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने रखी जाएगी; किसानों को पर्ची संभालकर DCO, समिति सचिव या 1800-121-3203 पर अपना दावा उठाना चाहिए।
स्रोत: The Times of India (9 अक्टूबर 2026), ThePrint (पीटीआई रिपोर्ट), हिंदुस्तान (लाइव हिंदुस्तान)
