30 साल से अटका ₹849.5 करोड़ ब्याज: SC ने यूपी सरकार की अर्जी खारिज की

₹1,936 करोड़। इतनी रकम चीनी मिलों से रिकवरी सर्टिफिकेट के जरिए वसूलनी बाकी है। इसमें से ₹1,087 करोड़ तो गन्ने का मूल बकाया है, और ₹849.5 करोड़ ब्याज है। सबसे हैरान करने वाला तथ्य यह है कि हाईकोर्ट के सामने खुद सरकार ने स्वीकार किया कि ब्याज के मद में अब तक एक पैसा भी वसूल नहीं किया गया। न एक पैसा। यह खुलासा इलाहाबाद हाईकोर्ट के 31 अगस्त के आदेश में हुआ, और अब 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मसले पर मुहर लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यवाही के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की चुनौती खारिज कर दी। इसका सीधा मतलब है कि देर से गन्ना भुगतान पर 15% सालाना ब्याज का प्रावधान बना रहेगा, और मिलें इससे बच नहीं पाएंगी।
₹1,936 करोड़ का हिसाब कितना
अदालत के सामने रखे आंकड़े किसानों की नाराजगी की जड़ बताते हैं:
- कुल वसूली बाकी: ₹1,936 करोड़ (रिकवरी सर्टिफिकेट के तहत)
- मूल गन्ना बकाया: ₹1,087 करोड़
- ब्याज: ₹849.5 करोड़
- ब्याज की वसूली अब तक: शून्य
यह ब्याज 1990 के दशक से देर से हुए भुगतानों पर चढ़ा है। यानी कई किसान तो ऐसे हैं जिनके बकाये पर ब्याज उनके पिता के जमाने से जमा होता आ रहा है, लेकिन किश्त तक नहीं मिली।
6 अक्टूबर का आदेश: सरकार के दोनों तर्क खारिज
सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने दो तर्क दिए थे। पहला: आर्थिक तंगी से जूझ रही चीनी मिलों पर 15% ब्याज का बोझ डाला गया तो वे दिवालिया हो सकती हैं, और मिलें बंद होने पर सबसे ज्यादा नुकसान किसानों का ही होगा। दूसरा: उत्तर प्रदेश गन्ना (आपूर्ति और खरीद का विनियमन) अधिनियम, 1953 की धारा 17(3) ब्याज में कटौती या उसे माफ करने का अधिकार सरकार को देती है।
अदालत ने दोनों तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गन्ना खरीद के 14 दिन के भीतर भुगतान की समय सीमा और देरी पर 15% ब्याज किसानों के लिए जरूरी कानूनी सुरक्षा उपाय है, जो उन्हें कर्ज के जाल से बचाता है। अदालत का रुख साफ था: ब्याज कोई छूट नहीं, बल्कि किसानों का तय कानूनी हक है।
14 दिन का नियम और 15% का कानून
कई किसानों को यह बात पता ही नहीं होती कि ब्याज का यह हक कहां से आता है। गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 के तहत मिल को गन्ना मिलने के 14 दिन के भीतर भुगतान करना अनिवार्य है। अगर मिल 14 दिन के भीतर भुगतान नहीं करती, तो देरी की अवधि के लिए बकाया राशि पर 15% वार्षिक दर से ब्याज देना होगा। यही प्रावधान दशकों से किसानों की लड़ाई का आधार रहा है।
12% वाली गड़बड़ी पर हाईकोर्ट की फटकार
इस मामले में एक और गंभीर बात सामने आई। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को तब फटकार लगाई जब पता चला कि तय 15% दर के बजाय कई रिकवरी सर्टिफिकेट 12% ब्याज दर पर जारी कर दिए गए थे। सवाल यह है कि जब कानून 15% कहता है, तो सरकारी कागजों में 12% कैसे लिख दिया गया। किसानों का कहना है कि अगर दर सही रखी जाती, तो ब्याज की कुल देनदारी और भी ज्यादा होती।
2006 से चल रही लड़ाई
इस फैसले की नींव राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह ने रखी थी, जिन्होंने 2006 में जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा है कि यह आदेश उनकी लंबी लड़ाई की बड़ी उपलब्धि है, और 30 साल के इंतजार का दर्द सिर्फ एक किसान ही समझ सकता है। दूसरी ओर, किसान नेताओं का एक वर्ग हर किसान के साल दर साल बकाया ब्याज का पूरा हिसाब सार्वजनिक करने की मांग कर रहा है। उनका तर्क है कि असली देनदारी दिखाए जा रहे आंकड़ों से कहीं ज्यादा है।
अब किसानों को क्या करना चाहिए
फैसले के बाद सबसे जरूरी काम अपना हिसाब पक्का करना है:
- तौल पर्चियां संभालकर रखें: पुराने वर्षों की पर्चियां ही आपके दावे का सबसे ठोस सबूत हैं।
- सालवार ब्याज का लिखित विवरण मांगें: जिला गन्ना अधिकारी और गन्ना समिति के सचिव से अपने बकाया ब्याज का वर्ष-दर-वर्ष हिसाब लिखित में लें।
- 15% दर की जांच करें: अपने मामले के रिकवरी सर्टिफिकेट में पुष्टि करें कि ब्याज 15% दर से ही लगाया गया है, 12% से नहीं।
- शिकायत दर्ज करें: भुगतान या ब्याज न मिले तो जिला गन्ना अधिकारी के पास लिखित शिकायत दें। गन्ना विभाग के टोल-फ्री नंबर 1800-121-3203 पर भी शिकायत दर्ज हो सकती है।
इस फैसले से कानूनी रास्ता साफ हुआ है, लेकिन वसूली की असली लड़ाई अब शुरू होगी। किसानों को अपने कागजात दुरुस्त रखने होंगे, क्योंकि ब्याज की गणना तभी संभव होगी जब हर साल का हिसाब ठीक हो।
मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्टूबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही के खिलाफ यूपी सरकार की चुनौती खारिज की; 15% ब्याज का प्रावधान बना रहेगा।
- रिकवरी सर्टिफिकेट के तहत ₹1,936 करोड़ वसूलना बाकी है, जिसमें ₹1,087 करोड़ मूल बकाया और ₹849.5 करोड़ ब्याज है; ब्याज की वसूली अब तक शून्य।
- किसानों को तौल पर्चियां संभालकर रखनी चाहिए और सालवार ब्याज का लिखित विवरण मांगना चाहिए; शिकायत के लिए टोल-फ्री 1800-121-3203 उपलब्ध है।
स्रोत: KisanTak (9 अक्टूबर 2026), Gaon Junction (9 अक्टूबर 2026)
