पेड़ी से मुख्य फसल जैसी उपज: 25% ज्यादा नाइट्रोजन और ठूंठ छंटाई का वैज्ञानिक तरीका

अक्टूबर का महीना आते ही पश्चिमी यूपी के गन्ना क्षेत्रों में पेराई की गहमागहमी शुरू हो जाती है। मिल के फाटक खुलने की खबर के साथ हर किसान के सामने एक पुराना सवाल फिर खड़ा हो जाता है: खेत में जो गन्ना काटा जाएगा, उसके बाद पेड़ी रखनी चाहिए या नहीं? एक तबका ऐसा है जो पेड़ी की उपज देखकर पछताता है। पहले साल अच्छी फसल मिली थी, दूसरे साल कल्ले कम आए, तीसरे साल खेत आधा खाली दिखने लगा।
शाहजहांपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. श्री प्रकाश यादव के मुताबिक पेड़ी की नाकामी की असली वजह किसान की लापरवाही नहीं, बल्कि तीन साफ कमियां हैं: ऊंचे बचे ठूंठ, पुरानी थकी जड़ें और पोषण की कमी। इन तीनों को सही करने पर पेड़ी से मुख्य फसल के बराबर या उससे भी अधिक उपज संभव है। मतलब साफ है। पेड़ी खुद कमजोर नहीं होती, उसे कमजोर किया जाता है।
ऊंचे ठूंठ: सबसे पहली और सबसे आम गलती
मुख्य फसल की कटाई अक्सर जमीन की सतह से थोड़ा ऊपर से कर दी जाती है। बच गए ऊंचे ठूंठ से जो कल्ले निकलते हैं, वे कमजोर और टेढ़े-मेढ़े होते हैं। डॉ. यादव की सलाह है कि कटाई हमेशा जमीन के स्तर से सटाकर करें। अगर ठूंठ ऊपर रह गए हैं तो धारदार हंसिये, गंडासे या कुल्हाड़ी से उन्हें जमीन के बराबर छांट दें।
उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक कहते हैं कि ठूंठों को जमीन के बराबर छांटने से मिट्टी के नीचे से मजबूत कल्ले निकलते हैं, जो फसल की घनी आबादी बनाए रखते हैं।
कटे ठूंठों पर फफूंद का इलाज न भूलें
छंटाई के बाद ठूंठ कटे-खुले हो जाते हैं। इन पर फफूंद लगने का डर रहता है, और मिट्टी में मौजूद बीमारियां नए कल्लों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। बचाव का तरीका भी कृषि वैज्ञानिकों ने बताया है। कटे हुए ठूंठों पर बाविस्टिन 0.1 प्रतिशत या कार्बनडाजिम का छिड़काव कर दें। डॉ. पाठक के मुताबिक यह प्रक्रिया पेड़ी की शुरुआती बढ़त को सुरक्षित और स्वस्थ बनाती है।
इससे आगे का फायदा भी है। हल्की गुड़ाई से मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है। फफूंदनाशक उपचार के साथ हल्की गुड़ाई करने से कल्लों का फुटाव 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। ये आंकड़ा डॉ. यादव ने खुद दिया है। यानी दो काम और पौने आधे ज्यादा कल्ले।
पुरानी जड़ों की छंटाई: पेड़ी का दूसरा जीवन
गन्ना काटने के बाद खेत में पुरानी जड़ों का जाल बचा रहता है। ये जड़ें थक चुकी होती हैं और नई जड़ों के रास्ते में रोड़ा बनती हैं। डॉ. यादव कहते हैं कि कटाई के तुरंत बाद पुरानी जड़ों की छंटाई जरूरी है ताकि नई सफेद जड़ें निकल सकें। छोटा हल या कल्टीवेटर ठूंठों के किनारे की पुरानी जड़ों को काट देता है।
यहीं पर रैटून मैनेजर मशीन काम आती है। डॉ. पाठक बताते हैं कि यह मशीन पुराने ठूंठों के किनारों को काटती है, मिट्टी को हल्का करती है और खाद को जड़ों के पास गहराई में डालने में मदद करती है। जिसके पास मशीन न हो, वह छोटे हल से भी यही काम निकाल सकता है। मकसद एक ही है: पुरानी जड़ें कटें, नई जड़ें आएं, और पोषक तत्व तेजी से पौधों तक पहुंचें।
25% ज्यादा नाइट्रोजन: पेड़ी का अलग खाद-फॉर्मूला
बहुत से किसान पेड़ी में वही खाद देते हैं जो मुख्य फसल में दी थी। यहीं सबसे बड़ी गलती होती है। पेड़ी को पौधा गन्ने से 25 प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन चाहिए। डॉ. यादव और डॉ. पाठक, दोनों वैज्ञानिकों ने इस आंकड़े पर जोर दिया है।
कटाई के बाद पहली सिंचाई के साथ यूरिया, सिंगल सुपर फास्फेट और पोटाश की पहली खुराक दें। खाद को ऊपर से फेंकने के बजाय जड़ों के पास मिट्टी दबाकर दें। डॉ. यादव के मुताबिक जिंक सल्फेट का प्रयोग कल्लों के फुटाव में मदद करता है। डॉ. पाठक आगे बताते हैं कि जिंक सल्फेट और फेरस सल्फेट का छिड़काव पौधों का पीलापन दूर करता है और हरियाली बढ़ाता है।
खाली जगहें भरें, पत्तियां जलाएं नहीं
जहां कल्ले नहीं निकले हैं, वहां खाली जगहें यूं ही न छोड़ें। डॉ. यादव की सलाह है कि ऐसे हिस्सों में नए पौधों की रोपाई करें या एसटीपी विधि से पहले से तैयार पौध लगाएं। एक खाली पैच भी पूरे खेत की औसत उपज घटा देता है।
और एक आदत जो अब छोड़नी ही चाहिए: सूखी पत्तियां जलाना। कटाई के बाद खेत में पड़ी सूखी पत्तियों को कटर से काटकर कतारों के बीच बिछा दें या मल्चर से काटकर मिट्टी में मिला दें। ये पत्तियां सड़कर मुफ्त की जैविक खाद बन जाती हैं और मिट्टी की नमी बनाए रखती हैं। पत्ती जलाने से न सिर्फ प्रदूषण फैलता है, बल्कि मिट्टी के पोषक तत्व भी जलकर नष्ट हो जाते हैं।
पानी और निराई: पहले 60 दिन सबसे नाजुक
कल्ले निकलते समय और गर्मियों में खेत में नमी की कमी न होने दें। 10 से 15 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करते रहें। पेड़ी में खरपतवार तेजी से उगते हैं, इसलिए शुरुआती 30 से 60 दिनों में निराई-गुड़ाई जरूर करें।
पेड़ी का फायदा सीधा है। खेत की तैयारी और बुवाई का पूरा खर्च बच जाता है। सही प्रबंधन से यह सस्ता सौदा महंगे मुनाफे में बदल सकता है। बस शर्त इतनी है कि पेड़ी को मुख्य फसल जितनी गंभीरता से लिया जाए।
मुख्य बातें
- कटाई जमीन की सतह से सटाकर करें, ऊंचे ठूंठ छांटें और कटे ठूंठों पर बाविस्टिन 0.1% या कार्बनडाजिम का छिड़काव करें
- पेड़ी को पौधा गन्ने से 25% अधिक नाइट्रोजन चाहिए: पहली खुराक यूरिया, सिंगल सुपर फास्फेट और पोटाश की, जड़ों के पास दबाकर दें
- पुरानी जड़ों की छंटाई, खाली जगहों में नई रोपाई, पत्तियों की मल्चिंग और शुरुआती 30-60 दिनों में निराई से उपज मुख्य फसल के बराबर हो सकती है
स्रोत: न्यूज18/लोकल18 (शाहजहांपुर) में कृषि वैज्ञानिक डॉ. श्री प्रकाश यादव की सलाह; न्यूज18/लोकल18 में उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक की सलाह
