खेती गाइड

पेड़ी गन्ने पर खर्च 30% कम पड़ता है, फिर भी उपज घटती क्यों है? IISR का जवाब

✍️ Aamir Raza · 🗓 06 Oct 2026 · ⏱ 5 मिनट में पढ़ें

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पेड़ी गन्ने पर खर्च 30% कम पड़ता है, फिर भी उपज घटती क्यों है? IISR का जवाब

कुशीनगर के लाला छपरा गांव में हुई एक किसान गोष्ठी में गन्ना विभाग के अधिकारी ने वह बात कही जो हर गन्ना किसान के काम की है। गन्ना किसान संस्थान पिपराइच की ओर से आयोजित इस गोष्ठी में सहायक निदेशक डॉ. ओमप्रकाश गुप्ता ने कहा कि पेड़ी गन्ने की लागत बावग यानी पहली बार बोए गए गन्ने से 30 प्रतिशत कम होती है, और सही प्रबंधन पर उसका उत्पादन भी अधिक मिलता है।

सुनने में यह बड़ा अच्छा लगता है। एक बार बुआई करो, फिर उसी खेत से कई साल तक फसल लो, और खर्च भी बावग से कम आए। पेराई सत्र 2026-27 शुरू होने से पहले यही सवाल हर किसान के मन में है: इस बार खेत से गन्ना कटने के बाद पेड़ी रखूं या खेत तोड़कर कुछ और बो दूं?

पर जमीनी हकीकत थोड़ी अलग है। कृषि वैज्ञानिकों के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 30 से 40 प्रतिशत गन्ना रकबा पेड़ी के तहत है, लेकिन ज्यादातर जगह पेड़ी की उपज बावग से कम मिलती है। वजह साफ है: पेड़ी पर ध्यान कम दिया जाता है, खाद-पानी में कंजूसी होती है, खरपतवार समय पर नहीं निकाले जाते। यानी 30 प्रतिशत की बचत कागज पर है; खेत में वह तभी मिलती है जब पेड़ी को बावग जैसी ही गंभीरता से संभाला जाए।

IISR लखनऊ ने उपज का फर्क नापकर दिखाया

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने खेत में प्रयोग करके दिखाया कि सही तकनीक से पेड़ी की उपज कितनी बढ़ सकती है। उनके परीक्षण में 75:45 सेंटीमीटर की जोड़ीदार कतारों में बुवाई और 200 किलो नाइट्रोजन व 80 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर देने पर पेड़ी से 85 टन प्रति हेक्टेयर उपज मिली। इसी अध्ययन में देश की औसत पेड़ी उत्पादकता 58 टन प्रति हेक्टेयर के आसपास दर्ज की गई।

भारत सरकार के विज्ञान-प्रौद्योगिकी पोर्टल पर दर्ज IISR के प्रौद्योगिकी पैकेज में पेड़ी की अच्छी उपज के लिए शुरुआत के तीन काम जरूरी बताए गए हैं: कटाई के बाद मेंढों को तोड़ना, ठूंठों की शेविंग और पुरानी जड़ों की छंटाई। पैकेज के मुताबिक जोड़ीदार कतार प्रणाली से खेत में खाली जगहें कम होती हैं, पौधों की संख्या संतुलित रहती है और अकेली कतार वाली बुवाई की तुलना में ज्यादा उपज मिलती है।

पत्तियां जलाना अब अपराध, मल्चिंग ही रास्ता

कटाई के बाद खेत में पड़ी सूखी पत्तियों का क्या करें, यह हर साल का सवाल है। गन्ना आयुक्त संजय आर. भूसरेड्डी कह चुके हैं कि फसल अवशेष जलाना कानूनी अपराध है और इसके लिए जुर्माने का प्रावधान है। उनका कहना है कि पत्तियों को जलाने के बजाय खेत में ही उनका सही प्रबंधन किया जाए।

IISR के पैकेज में भी यही बात दर्ज है: एक-एक कतार छोड़कर पत्तियों की मल्चिंग करने से मिट्टी की नमी बनी रहती है, खरपतवार कम उगते हैं और मिट्टी का जैविक कार्बन बना रहता है। कटी पत्तियां कुछ समय में सड़कर खाद बन जाती हैं। यानी जो पत्ती जलाने पर धुआं और जुर्माना देती है, वही खेत में बिछाने पर मुफ्त की खाद और पानी बचाने का काम करती है।

मशीनें: एक ही बार में कई काम

पेड़ी के ये सारे काम हाथ से करना मेहनत और खर्च दोनों में भारी है। इसके लिए IISR ने रैटून मैनेजमेंट डिवाइस विकसित की है, जो ट्रैक्टर से चलकर एक ही बार में ठूंठ शेविंग, पुरानी जड़ों की छंटाई, गहरी जुताई और खाद डालने का काम करती है। इसी तरह ट्रैश मल्चर-सह-स्टबल शेवर मशीन कटी पत्तियों को बारीक काटकर कतारों के बीच बिछा देती है।

गन्ना आयुक्त ने बताया है कि गन्ना खेती में यंत्रीकरण बढ़ाने के लिए फार्म मशीनरी बैंक स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं, जिनमें ट्रैश मल्चर और रैटून मैनेजमेंट डिवाइस की व्यवस्था की गई है। किसान इन बैंकों से मशीन लेकर पेड़ी का काम समय पर करा सकते हैं।

तो फैसला कैसे लें: पेड़ी रखें या तोड़ें?

पहली पेड़ी में फायदा सबसे ज्यादा होता है, क्योंकि जड़ तंत्र पहले से मजबूत होता है और खेत की तैयारी व बुआई का खर्च बच जाता है। लेकिन दूसरी-तीसरी पेड़ी में प्रबंधन और सख्त चाहिए। अगर खेत में कल्ले छितरे हों और खाली जगहें ज्यादा दिखें, तो उन जगहों पर नए गन्ने लगाकर पौध संख्या पूरी करें। इसे गैप फिलिंग कहते हैं, और पौधों की एक समान संख्या ही अच्छी उपज की गारंटी देती है।

और अगर सही प्रबंधन के बावजूद दो-तीन सीजन से उपज लगातार घट रही है, तो ईमानदारी से खेत तोड़कर नई बुआई करना बेहतर सौदा है। पेड़ी रखना जिद नहीं, गणित है: जहां 30 प्रतिशत की बचत उपज में बदल रही हो, वहां पेड़ी रखें; जहां उपज ही साल-दर-साल घट रही हो, वहां नई बुआई करें। पेराई से पहले लिया गया यही फैसला अगले साल की कमाई तय करेगा।

मुख्य बातें

  • कुशीनगर की किसान गोष्ठी में कृषि विभाग का दावा: पेड़ी गन्ने की लागत बावग से 30% कम होती है, सही प्रबंधन पर उत्पादन भी अधिक मिलता है
  • IISR लखनऊ के प्रयोग में जोड़ीदार कतार (75:45 सेमी) और संतुलित खाद से पेड़ी की उपज 85 टन प्रति हेक्टेयर पहुंची, जबकि राष्ट्रीय औसत 58 टन है
  • पत्तियां जलाना कानूनी अपराध है; ट्रैश मल्चिंग से नमी और खाद दोनों बचती है, और फार्म मशीनरी बैंक से ट्रैश मल्चर व रैटून मैनेजमेंट डिवाइस उपलब्ध है

स्रोत: चिनीमंडी (गन्ना किसान संस्थान पिपराइच की किसान गोष्ठी रिपोर्ट, अमर उजाला के हवाले से), भारत सरकार विज्ञान-प्रौद्योगिकी पोर्टल (IISR लखनऊ प्रौद्योगिकी पैकेज), ICAR शोध पत्रिका (IISR लखनऊ का पेड़ी उपज प्रयोग), चिनीमंडी (गन्ना आयुक्त का ट्रैश मल्चिंग बयान)

#गन्ना #पेड़ी गन्ना #रैटून प्रबंधन #गन्ना उपज #IISR लखनऊ

Aamir Raza
लेखक

GannaUP के संस्थापक एवं मुख्य संपादक। UP गन्ना उद्योग, पर्ची प्रणाली, SAP/FRP मूल्य नीति और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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