नीलगाय ने रात में खेत साफ कर दिया? 60% छूट वाली सोलर बाड़ से बचाव का पूरा हिसाब

सबसे पहले एक जरूरी बात, जो हर गन्ना किसान को पता होनी चाहिए। नीलगाय को गुस्से में मारना या घायल करना अपराध है। नीलगाय वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत संरक्षित प्राणी है। गुस्से में उठाया गया एक कदम जेल और जुर्माने तक पहुंचा सकता है।
तो सवाल यह है कि कानूनी दायरे में रहकर अपनी फसल कैसे बचाएं। अच्छी खबर यह है कि इसके लिए अब सरकार की तरफ से भी मदद मिलती है और किसानों के अपने आजमाए हुए तरीके भी हैं। इस गाइड में हम बचाव का तीन-परत वाला प्लान देंगे: रोकथाम, रात की पहरेदारी और नुकसान के बाद मुआवजा। तीनों परत एक साथ काम करेंगी तो इस पेराई सत्र में नीलगाय आपकी मेहनत का एक भी रुपया नहीं खा पाएगी।
नीलगाय नुकसान कब और कैसे पहुंचाती है
नीलगाय दिन के समय खेतों के आसपास की झाड़ियों, नहर किनारे या पेड़ों की छांव में आराम करती है। अंधेरा होते ही वह झुंड बनाकर खेतों में घुस आती है। उसे गन्ने की नरम पत्तियां और गन्ने की शीर्ष, यानी ऊपरी मुलायम हिस्सा, सबसे ज्यादा पसंद आते हैं।
अक्टूबर से दिसंबर तक का समय सबसे खतरनाक होता है। इस दौरान गन्ना पक रहा होता है, गांठों में रस भरता है और पत्तियां नरम होती हैं। यही वह समय है जब नीलगाय का झुंड एक ही रात में बीघों-बीघे गन्ना रौंद सकता है। सिर्फ खाने का नुकसान नहीं होता। उसके भारी शरीर से गन्ने की कतारें टूट जाती हैं, टूटे गन्ने में सड़न लगती है और चीनी की मात्रा घट जाती है। मतलब एक रात का हमला और उपज भी गई, भाव भी गया।
जंगली सुअर दूसरा बड़ा दुश्मन है। वह गन्ने की जड़ों के पास जमीन खोदकर गांठों को नुकसान पहुंचाता है। बंदर गन्ने की गांठें तोड़कर रस चूसते हैं। इसलिए बचाव का प्लान एक जानवर को देखकर नहीं, पूरे झुंड और पूरी रात को देखकर बनाना पड़ता है।
परत 1: रोकथाम, सोलर फेंसिंग और सरकारी अनुदान
सबसे पक्का हल है सोलर फेंसिंग। खेत के चारों ओर तारों की बाड़ लगाई जाती है जिसमें सोलर पैनल से चलने वाला सिर्फ 12 वोल्ट का हल्का करंट दौड़ता है। जानवर के तार छूते ही उसे हल्का झटका लगता है और साथ में सायरन बजता है। जानवर को कोई चोट नहीं पहुंचती, लेकिन वह डरकर भाग जाता है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत है उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री खेत सुरक्षा योजना। कृषि विभाग की इस योजना में लघु और सीमांत किसानों को सोलर फेंसिंग की कुल लागत का लगभग 60 प्रतिशत अनुदान मिलता है। अनुदान की सीमा प्रति हेक्टेयर 1.43 लाख रुपये तक बताई गई है।
योजना की दो खास बातें याद रखें। पहली, अनुदान का पैसा सत्यापन और स्थापना के बाद सीधे किसान के आधार से जुड़े बैंक खाते में डीबीटी के जरिए आता है। दूसरी, योजना की शर्तें समय-समय पर बदलती रहती हैं, इसलिए आवेदन से पहले अपने जिले के उप कृषि निदेशक कार्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र से मौजूदा नियम जरूर पूछ लें।
परत 2: रात की चौकी और देसी उपाय
अगर बजट अभी सोलर फेंसिंग का नहीं बन रहा, तो देसी उपाय भी काफी हद तक काम करते हैं। इनका मूल मंत्र एक ही है: नीलगाय को खेत में घुसने से पहले ही डरा देना।
पहला उपाय है रात की चौकी। खेत के कोने में मचान बनाकर बारी-बारी से पहरा दें। नीलगाय इंसानी आहट और आवाज से डरती है। अकेले रात भर जागना मुश्किल है, इसलिए आसपास के दो-तीन किसान मिलकर बारी बांट लें। यह तरीका पुराना है, पर आज भी सबसे सस्ता और असरदार है।
दूसरा उपाय है आवाज का जाल। खेत के चारों ओर रस्सी में टिन के खाली डिब्बे या छोटी घंटियां बांध दें। जानवर के धक्का लगते ही शोर होगा और झुंड भाग जाएगा। कई किसान रात में मशाल या धुआं भी करते हैं, पर सूखी पत्तियों वाले खेत में खुली आग से सावधान रहें।
तीसरा उपाय है खेत की सफाई। खेत के आसपास की झाड़ियां और ऊंची घास काट दें। नीलगाय दिन में इन्हीं झाड़ियों में छिपती है। छिपने की जगह खत्म तो झुंड कहीं और डेरा डालेगा। कुछ किसान गोबर और नीम के पत्तों का घोल खेत की सीमा पर छिड़कते हैं, उनका अनुभव है कि तीखी गंध से जानवर दूर रहते हैं।
परत 3: नुकसान हो गया तो मुआवजा कैसे लें
बचाव के बावजूद अगर नुकसान हो जाए, तो मुआवजे का रास्ता खुला है। बहुत से किसान सिर्फ इसलिए मुआवजा नहीं ले पाते कि उन्हें प्रक्रिया ही नहीं पता। प्रक्रिया सरल है, बस क्रम सही होना चाहिए।
सबसे पहले नुकसान की फोटो और वीडियो तुरंत बना लें। यही आपका सबसे बड़ा सबूत है। फिर अपने ग्राम प्रधान या ग्राम सचिव को नुकसान की लिखित जानकारी दें।
इसके बाद लेखपाल खेत आकर नुकसान का सर्वे करेगा। सर्वे रिपोर्ट वन विभाग के रेंज अधिकारी के जरिए प्रभागीय वनाधिकारी के पास जाती है। स्वीकृति के बाद मुआवजे की राशि सीधे किसान के बैंक खाते में भेज दी जाती है। प्रक्रिया में कुछ समय लगता है, लेकिन कागज सही और जानकारी समय पर हो तो मुआवजा मिलना तय रहता है।
एक बात और। मुआवजे के आवेदन में देर न करें। नुकसान के तुरंत बाद सूचना देना जरूरी है, वरना सर्वे में नुकसान का सही आकलन मुश्किल हो जाता है।
पेड़ी और नए गन्ने की खास देखभाल
पेड़ी, यानी रटून की फसल, नीलगाय के लिए सबसे आसान निशाना होती है। नई कोंपलें नरम होती हैं। पेड़ी वाले खेत में नीलगाय की एक रात की चराई अगली फसल की पूरी पैदावार घटा देती है। इसलिए सोलर फेंसिंग हो या चौकी, प्राथमिकता पेड़ी वाले खेत को दें।
शरदकालीन बुवाई वाले नए गन्ने में भी शुरुआत के दो-तीन महीने संवेदनशील होते हैं। इस दौरान खेत की सीमा पर खास नजर रखें।
मुख्य बातें
- नीलगाय मारना अपराध है। बचाव हमेशा कानूनी दायरे में करें: सोलर फेंसिंग, चौकी और देसी उपाय।
- मुख्यमंत्री खेत सुरक्षा योजना में लघु-सीमांत किसानों को सोलर फेंसिंग की लागत का लगभग 60 प्रतिशत, अधिकतम 1.43 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक अनुदान मिलता है। आवेदन से पहले जिला कृषि कार्यालय से मौजूदा नियम जरूर पूछें।
- नुकसान हो जाए तो तुरंत फोटो-वीडियो बनाएं, ग्राम प्रधान को सूचना दें और लेखपाल के सर्वे के जरिए वन विभाग से मुआवजे का दावा करें।
स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया (मुख्यमंत्री खेत सुरक्षा योजना की जानकारी), किसान इंडिया (वन्यजीव फसल नुकसान मुआवजा प्रक्रिया), अड्डा247 करेंट अफेयर्स (योजना अनुदान विवरण)।
