21 मिलों में अटका ₹119 करोड़, 31 अक्टूबर डेडलाइन: नहीं मिला तो अब वसूली की बारी

महाराष्ट्र की 210 चीनी मिलों ने पिछले सीजन में 1,045.63 लाख मीट्रिक टन गन्ना पीसा, और कुल एफआरपी बिल बना 40,446 करोड़ रुपये। 15 अक्टूबर तक इसमें से 40,327 करोड़ रुपये किसानों के खातों में पहुंच चुके हैं। यानी 99.71 प्रतिशत भुगतान पूरा। इस आंकड़े के दूसरी तरफ 21 मिलें हैं, जिनके पास अब भी किसानों के 119 करोड़ रुपये अटके हुए हैं। जिन किसानों की पर्ची इन मिलों में तौली गई, उनके लिए 119 करोड़ कोई छोटा नंबर नहीं है।
राज्य चीनी आयुक्तालय की पंद्रह-दिनी रिपोर्ट के मुताबिक, जो केंद्रीय चीनी निदेशालय को भेजी गई है, 189 मिलों ने एफआरपी का शत-प्रतिशत भुगतान कर दिया है। 17 मिलों ने 80 से 99.99 प्रतिशत के बीच चुकाया, तीन मिलों ने 60 से 79.99 प्रतिशत, और एक मिल ने 60 प्रतिशत से भी कम। मतलब बकाया अब चंद मिलों तक सिमट चुका है, लेकिन वहीं जिद्दी होकर अटका है।
31 अक्टूबर की डेडलाइन: समझौता और साफ चेतावनी
इन 21 बकाया मिलों में से 12-13 मिलों ने किसान संगठनों के साथ समझौता किया है कि वे 31 अक्टूबर तक बकाया रकम चुका देंगी। बाकी मिलों को चीनी आयुक्त डॉ. संजय कोल्टे ने साफ चेतावनी दी है: समय पर भुगतान नहीं हुआ तो दंडात्मक कार्रवाई तय है। कोल्हापुर में स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के प्रमुख राजू शेट्टी के नेतृत्व में हुए आंदोलन की मांगों पर केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों पर चर्चाएं हो चुकी हैं। यानी दबाव किसान संगठनों की ओर से भी है और प्रशासन की ओर से भी।
वसूली प्रमाण-पत्र: बकाया वसूलने का सबसे बड़ा हथियार
चेतावनी सिर्फ कागज पर नहीं है। आयुक्तालय ने 20 मिलों के खिलाफ राजस्व वसूली प्रमाण-पत्र जारी कर दिए हैं और वसूली की कार्यवाही शुरू हो गई है। गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 के तहत चीनी मिलों को गन्ना खरीद के 14 दिनों के भीतर उचित एवं लाभकारी मूल्य यानी एफआरपी चुकाना अनिवार्य है। भुगतान नहीं हुआ तो चीनी आयुक्त वसूली प्रमाण-पत्र जारी कर सकता है, जिसके बाद जिला प्रशासन मिल का चीनी स्टॉक कुर्क करके, संपत्ति जब्त करके या गोदाम से चीनी नीलाम करके बकाया वसूलता है।
यह तरीका काम भी कर रहा है। 15 सितंबर की रिपोर्ट में 30 मिलों पर 194 करोड़ रुपये बकाया था और 15 मिलों पर वसूली की कार्यवाही शुरू हुई थी। एक महीने में आंकड़ा 21 मिलों और 119 करोड़ रुपये पर आ गया। यानी कार्रवाई की धार बकाया घटा रही है।
कैबिनेट का 738 करोड़ वाला सहारा: सॉफ्ट लोन पर ब्याज छूट
भुगतान के दबाव के साथ सरकार ने मिलों के लिए राहत का रास्ता भी खोला है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में सहकारी चीनी मिलों के लिए सॉफ्ट लोन योजना को मंजूरी दी गई, जिस पर ब्याज छूट का अनुमानित खर्च 738.51 करोड़ रुपये है। 31 अक्टूबर तक बैंकों से मंजूर और वितरित कर्ज इस योजना में आएंगे। चुकाने की अवधि 1 अक्टूबर से सात साल रखी गई है और ब्याज सरकार भरेगी।
कर्ज की रकम मुख्य रूप से किसानों के एफआरपी बकाये के निपटारे में लगानी है। जो मिल किस्त समय पर नहीं चुकाएगी, वह अगले साल ब्याज छूट की हकदार नहीं रहेगी। मुख्यमंत्री 14 अक्टूबर को पुणे में मिलों से पेराई सीजन जल्दी शुरू करने और बकाया समय पर चुकाने की अपील भी कर चुके हैं।
यूपी के गन्ना किसानों के लिए क्या सबक है
महाराष्ट्र का यह किस्सा यूपी के किसान के लिए तीन सबक छोड़ता है। पहला, बकाया छोटा हो या बड़ा, किसान संगठनों का दबाव और वसूली प्रमाण-पत्र जैसी कानूनी कार्रवाई मिलकर उसे चुकाती है। एक महीने में 194 करोड़ से 119 करोड़ तक का सफर यही बताता है।
दूसरा, कानून किसान के साथ है। गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के भीतर भुगतान अनिवार्य है, और देरी होने पर 15 प्रतिशत ब्याज का प्रावधान है। तीसरा, कागज संभालकर रखें। पर्ची और तौल की रसीद ही बकाया दावे की सबसे मजबूत नींव है। यूपी में अगर बकाया लंबा खिंचे तो जिला गन्ना अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराएं और टोल-फ्री 1800-121-3203 पर कॉल करें। महाराष्ट्र ने दिखा दिया है कि वसूली की धार चले तो मिलों के पास पैसा न होने का बहाना नहीं टिकता।
मुख्य बातें
- महाराष्ट्र की 21 चीनी मिलों पर किसानों का ₹119 करोड़ एफआरपी बकाया; 189 मिलों ने शत-प्रतिशत भुगतान कर दिया, कुल भुगतान दर 99.71 प्रतिशत।
- 12-13 मिलों ने 31 अक्टूबर तक भुगतान का समझौता किया; 20 मिलों पर वसूली प्रमाण-पत्र जारी, बाकी को दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी।
- एक महीने में बकाया ₹194 करोड़ से घटकर ₹119 करोड़ हुआ; सहकारी मिलों के लिए 738.51 करोड़ की ब्याज-छूट वाली सॉफ्ट लोन योजना भी मंजूर।
स्रोत: ChiniMandi (21 अक्टूबर 2026), CSR Journal (21 अक्टूबर 2026), Deccan Chronicle (सितंबर 2026), Times of India, Kolhapur (सितंबर 2026)
