1 नवंबर से थमेगा 5 लाख मजदूरों का कोयता, UP के किसानों पर भी पड़ेगा असर

महाराष्ट्र के गन्ना खेतों में इस बार पेराई सत्र की शुरुआत से पहले ही बड़ा संकट खड़ा हो गया है। राज्य के करीब 5 लाख गन्ना कटाई मजदूरों ने चेतावनी दी है कि अगर 1 नवंबर तक उनकी मजदूरी पर नया समझौता नहीं हुआ, तो वे कोयता उठाना बंद कर देंगे। सीधे शब्दों में कहें तो खेत में गन्ना खड़ा रहेगा, लेकिन उसे काटने वाला कोई नहीं होगा।
यह चेतावनी ऐसे वक्त आई है जब महाराष्ट्र के कई हिस्सों में सूखे की मार है और मिलें पेराई शुरू करने की तैयारी में हैं। मजदूरों का कहना है कि सूखे और आर्थिक तंगी के बावजूद वे कारखानों तक पहुंचे हैं, लेकिन बिना बढ़ी मजदूरी के काम शुरू नहीं करेंगे।
तीन साल पुराना समझौता खत्म, नया अब तक नहीं
इस विवाद की जड़ में एक पुराना समझौता है। 4 जनवरी 2024 को वरिष्ठ नेता शरद पवार की अध्यक्षता वाली समिति ने मजदूरों की मजदूरी में 34 प्रतिशत बढ़ोतरी का समझौता तय किया था। यह समझौता तीन पेराई सत्रों, 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के लिए था। अब वह अवधि खत्म हो चुकी है।
महाराष्ट्र राज्य गन्ना कटाई और परिवहन मजदूर संघ के मुताबिक पिछले तीन महीने से सरकार और चीनी संघ के साथ बातचीत चल रही है, लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकला है। इसी गतिरोध के चलते मजदूर संगठनों ने 1 नवंबर से कोयता बंद आंदोलन का ऐलान किया है।
संघ के महासचिव अबासाहेब चौगुले ने साफ कहा है कि अगर सरकार मजदूरों से बातचीत को तैयार नहीं होती, तो उन्हें अपने हक की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। उनका कहना है कि मजदूरी बढ़ोतरी पर फैसला हुए बिना कटाई शुरू नहीं होगी।
मजदूर क्या मांग रहे हैं
ताजा खबरों के मुताबिक मजदूर संगठन 100 प्रतिशत तक मजदूरी बढ़ोतरी की मांग पर अड़े हैं। कुछ रिपोर्टों में 80 प्रतिशत बढ़ोतरी की मांग का भी जिक्र है। फर्क चाहे जो हो, बात एक ही है। मजदूरों का कहना है कि महंगाई, डीजल के बढ़ते दाम और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों ने उनकी पुरानी मजदूरी को बेमानी कर दिया है।
एक अहम बात यह भी है कि अभी कमीशन सहित करीब 439 रुपये प्रति टन की राशि किसानों की एफआरपी से काट ली जाती है। मजदूरों का तर्क है कि चीनी के दाम पिछले दो-तीन साल में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे, लेकिन उसका फायदा मजदूर तक नहीं पहुंचा। बीड जिले के मजदूरों ने तो 100 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 30 प्रतिशत कमीशन की मांग भी उठाई है। बीड महाराष्ट्र में गन्ना मजदूरों का सबसे बड़ा स्रोत जिला माना जाता है।
16 जिलों से आते हैं ये मजदूर
महाराष्ट्र में गन्ना कटाई मजदूर 16 जिलों से आते हैं। इनमें पूरा मराठवाड़ा, सोलापुर, यवतमाल, बुलढाणा और वर्धा जैसे जिले शामिल हैं। हर साल पेराई सत्र में ये मजदूर अपने परिवार के साथ कोल्हापुर, सांगली, सतारा और कर्नाटक तक के कारखानों में पहुंचते हैं।
मराठवाड़ा और सोलापुर में इस बार पानी की भारी कमी है। किसान अपनी फसल बचाने के लिए जूझ रहे हैं। ऐसे में अगर कटाई में देर हुई, तो खेत में खड़ा गन्ना और सूखेगा और किसानों का नुकसान बढ़ेगा। मिलें तैयार हैं, लेकिन मजदूरों के बिना पेराई शुरू करना मुमकिन नहीं है।
UP के किसानों पर क्या असर पड़ेगा
अब सवाल यह है कि महाराष्ट्र की इस लड़ाई का उत्तर प्रदेश के किसान से क्या लेना-देना है। सीधा असर दो तरह से दिख सकता है।
पहला, महाराष्ट्र देश का बड़ा चीनी उत्पादक राज्य है। वहां पेराई में देर हुई तो चीनी की आवक पर असर पड़ेगा और बाजार की चाल बदल सकती है। UP के किसान को भी चीनी बाजार की हर हलचल पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि आखिरकार गन्ने का दाम भी उसी बाजार से जुड़ा है।
दूसरा असर मजदूरों को लेकर है। UP में भी पेराई सत्र शुरू हो रहा है और प्रदेश की 122 चीनी मिलों में कटाई के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत पड़ती है। महाराष्ट्र का यह विवाद एक चेतावनी की तरह है। जिस मिल या क्रय केंद्र पर मजदूरों की व्यवस्था आखिरी वक्त तक लटकी रहेगी, वहां कटाई में देर होने का खतरा ज्यादा रहेगा।
UP के किसान अभी क्या करें
महाराष्ट्र का विवाद अभी सुलझा नहीं है, लेकिन UP का किसान अपने स्तर पर कुछ काम अभी से निपटा सकता है। अपनी मिल या समिति से पर्ची और तौल का शेड्यूल पहले से पक्का कर लें। जिस टोली से कटाई करानी है, उससे मजदूरी और तारीख की बात अभी साफ कर लें, ताकि पेराई के बीच में कोई अड़चन न आए।
आगे क्या होगा
मजदूर संगठनों की चेतावनी के बाद अब सबकी नजर सरकार और चीनी संघ की अगली बैठक पर है। अगर 1 नवंबर से पहले नया समझौता हो गया, तो पेराई सत्र पटरी पर आ जाएगा। अगर नहीं हुआ, तो महाराष्ट्र में कटाई ठप होने का खतरा है और उसका असर पड़ोसी राज्यों के बाजार तक महसूस होगा।
मुख्य बातें
- महाराष्ट्र के करीब 5 लाख गन्ना कटाई मजदूरों ने 1 नवंबर से कोयता बंद की चेतावनी दी है।
- तीन साल पुराना मजदूरी समझौता खत्म हो चुका है और 100 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की मांग पर गतिरोध बना है।
- 16 जिलों से आने वाले इन मजदूरों के बिना महाराष्ट्र की मिलों में पेराई शुरू करना मुमकिन नहीं है, और इसका असर चीनी बाजार व UP के किसानों तक पहुंच सकता है।
स्रोत: लोकमत (24 अक्टूबर 2026), चिनीमंडी (अक्टूबर 2026), न्यूजपॉइंट (24 अक्टूबर 2026)
