4 जिलों में लाल सड़न से गन्ना सूखा, अब 12 नई किस्में आईं — को.0238 की जगह लेगी कौन?

पेराई सत्र का काउंटडाउन शुरू हो चुका है, लेकिन चार जिलों के किसान मिल की सीटी सुनने से पहले ही एक और फिक्र में हैं। खबर यह है कि सीतापुर, लखीमपुर खीरी, पीलीभीत और शाहजहांपुर के कई इलाकों में गन्ना सूख रहा है, और निशाने पर वही पुरानी किस्म है, को.0238। ट्रैक्टर जंक्शन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक इन जिलों में कुछ खेतों में फसल बुरी तरह चौपट हो गई है। किसान बताते हैं कि महंगी दवाओं का छिड़काव कर चुके हैं, फिर भी रोग थम नहीं रहा।
पेराई की दहलीज पर खड़े किसान के लिए सवाल यह है कि अभी क्या करे, और लंबी अवधि में को.0238 का विकल्प क्या हो। अच्छी खबर यह है कि इसी हफ्ते सरकार ने 12 नई गन्ना किस्मों को खेती की मंजूरी दे दी है, जिनमें से कई लाल सड़न से लड़ने के लिए ही तैयार की गई हैं।
चार जिलों में क्या हो रहा है
रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा चोट को.0238 पर पड़ी है, जिसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
वैज्ञानिक इसे बीज जनित फफूंदी रोग बताते हैं। यूपी गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर के पैथोलॉजी अनुभाग के अनुभागाध्यक्ष डॉ. सुजीत प्रताप सिंह के अनुसार लाल सड़न को “गन्ने का कैंसर” भी कहा जाता है। तने के अंदर लाल रंग के साथ सफेद धब्बे दिखते हैं, पौधा धीरे-धीरे सूखता है और गन्ने की मिठास घट जाती है।
सिर्फ खेत की नहीं, पूरे उद्योग की समस्या
लाल सड़न अब अलग-अलग खेतों की परेशानी से आगे बढ़ चुकी है। द इंडियन एक्सप्रेस की सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक यूपी का चीनी उत्पादन 2019-20 के 126.4 लाख टन से गिरकर 2025-26 में 89.5 लाख टन रह गया है। सबसे बड़ी वजह को.0238 का लाल सड़न के प्रति संवेदनशील होना बताई गई है। प्रदेश की लगभग 120 चीनी मिलों में पेराई की मात्रा छह साल में पांचवें हिस्से से ज्यादा घट गई। जब तक किस्म नहीं बदलेगी, न किसान का संकट टलेगा, न मिलों का।
सरकार ने उतारीं 12 नई किस्में
अक्टूबर के पहले हफ्ते में आई सबसे राहत भरी खबर बीज समिति की बैठक से आई। दैनिक जागरण और एबीपी की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 12 नई गन्ना किस्मों की खेती को मंजूरी मिली है: चार किस्में शाहजहांपुर और लखनऊ के शोध केंद्रों में तैयार हुईं, आठ किस्में केंद्र सरकार से नोटिफाइड हैं।
चारों प्रदेश-विकसित किस्मों के आंकड़े इस प्रकार हैं:
- को.शा.23232 (अगेती): 95.56 टन प्रति हेक्टेयर, को.0238 से 9.44 फीसदी ज्यादा; पेड़ी उपज 80.57 टन; लाल सड़न के प्रति रोगरोधी।
- को.लख.21201 (अगेती): 86.57 टन प्रति हेक्टेयर, को.0238 से ज्यादा चीनी मात्रा; लाल सड़न के प्रति उच्च प्रतिरोधक क्षमता।
- को.शा.19235 (मध्य-देर): 87.58 टन प्रति हेक्टेयर, को.शा.767 से 21.01 फीसदी ज्यादा।
- को.शा.18232 (मध्य-देर): 92.38 टन प्रति हेक्टेयर, को.शा.767 से 26.51 फीसदी ज्यादा; पेड़ी उपज 82.06 टन।
गन्ना आयुक्त मिंस्थी एस. के अनुसार को.शा.23232 उपज और शर्करा, दोनों मापदंडों पर को.0238 से बेहतर पाई गई है। बैठक में छह पुरानी और कम प्रचलित किस्मों को अगले दो वर्षों में चरणबद्ध तरीके से खेती से बाहर करने का फैसला भी हुआ।
वैज्ञानिकों की दो टूक सलाह: किस्म बदलो
खड़ी फसल में रोग दिखे तो वैज्ञानिकों की सलाह कठोर लेकिन साफ है। बागपत के कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. शिवम सिंह ने द प्रिंट को बताया कि लाल सड़न बीज जनित भी है और मिट्टी जनित भी। संक्रमित बीज बोने पर रोग पूरे सीजन में बढ़ता है। गन्ना दूसरे साल पेड़ी के रूप में रखा जाता है, इसलिए पहले सीजन का छोटा संक्रमण अगले सीजन में 30 से 40 फीसदी तक पहुंच सकता है। उनके शब्दों में रसायनों से इस रोग को काबू करना “लगभग असंभव” है। इकलौता स्थायी समाधान किस्म बदलना है।
रोग को फैलने से रोकने के लिए संक्रमित पौधे को जड़ समेत उखाड़कर नष्ट कर दें। उस जगह 10 से 20 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर बुरकाएं और जड़ों के पास मिट्टी में 0.2 फीसदी कार्बेन्डाजिम या थायोफेनेट मेथिल डालें। बुवाई के लिए रोगमुक्त नर्सरी का बीज ही इस्तेमाल करें, एक ही खेत में हर बार गन्ना न लगाएं, और संक्रमित खेत में गेहूं, धान या हरी खाद के साथ फसल चक्र अपनाएं।
अभी बुवाई करने वाले किसान ध्यान दें
शरदकालीन बुवाई (सितंबर मध्य से नवंबर मध्य) का मौसम चल रहा है। जो किसान अभी बीज डाल रहे हैं, उनके लिए यह खबर सबसे ज्यादा मायने रखती है। को.0238 का बीज अगर पुराने खेत से लिया गया है तो लाल सड़न का जोखिम सबसे ज्यादा उसी में है। नई स्वीकृत किस्मों का बीज जिला गन्ना समिति या अधिकृत स्रोत से लें। किसी भी नई किस्म को वैज्ञानिकों की संस्तुति के बिना दूसरे प्रदेश से लाकर न बोएं।
पेराई सत्र सिर पर है। रोगग्रस्त गन्ने की मिठास घट जाती है, और रोगग्रस्त खेत की पेड़ी रखना अगले साल की बीमारी को न्योता देना है। इस सीजन की सबसे बड़ी बचत यही होगी कि बीज की दिशा अभी से बदल ली जाए।
मुख्य बातें
- सीतापुर, लखीमपुर खीरी, पीलीभीत और शाहजहांपुर में लाल सड़न से को.0238 की फसल सूखने की खबरें; महंगी दवाओं से भी रोग नहीं थमा (ट्रैक्टर जंक्शन)।
- लाल सड़न के चलते यूपी का चीनी उत्पादन 126.4 लाख टन से घटकर 89.5 लाख टन रह गया (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- सरकार ने 12 नई किस्मों को मंजूरी दी, जिनमें को.शा.23232 (95.56 टन/हेक्टेयर, लाल सड़न रोगरोधी) सबसे आगे; वैज्ञानिकों की सलाह है कि को.0238 की जगह अब नई किस्में अपनाएं (दैनिक जागरण, टाइम्स ऑफ इंडिया)।
स्रोत: ट्रैक्टर जंक्शन (अक्टूबर 2026), द इंडियन एक्सप्रेस (सितंबर 2026), दैनिक जागरण (अक्टूबर 2026), टाइम्स ऑफ इंडिया (अक्टूबर 2026), द प्रिंट (सितंबर 2026)
