उपज 40 से घटकर 22 टन रह गई, अब अक्टूबर में करण-20 किस्म पर फैसला

शामली जिले के खेड़ी बैरागी गांव के किसान जितेंद्र सिंह हुड्डा पिछले साल तक अपने आठ एकड़ में गन्ना लगाते थे। इस बार उन्होंने रकबा घटाकर चार एकड़ कर दिया है। खाली हुई जमीन पर अब मक्का, उड़द और पूसा-1509 बासमती धान है। वजह एक ही है, जिसने पश्चिमी यूपी के हजारों किसानों का गणित बिगाड़ दिया है: लाल सड़न।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में हुड्डा बताते हैं कि उनकी उपज पहले 38-39 टन प्रति एकड़ आती थी। आज वह 22-23 टन पर अटकी है। “लाल सड़न रोग ने गन्ने पर किसानों का भरोसा सच में तोड़ दिया है,” उनका कहना है। यह किसी एक खेत की कहानी नहीं है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यूपी का चीनी उत्पादन 2019-20 के 126.4 लाख टन से घटकर 2025-26 में 89.5 लाख टन रह गया।
को-0238 की चमक और पतन: 86.7 फीसदी रकबे की कीमत
एक जमाना था जब को-0238 (करण-4) यूपी के गन्ना किसान की पहली पसंद थी। 2009 में कोयंबटूर के भारतीय गन्ना प्रजनन संस्थान (आईसीएआर-एसबीआई) ने इसे जारी किया था। मोटी पौध, 60 से बढ़कर 80 टन प्रति हेक्टेयर उपज, जल्दी पकने वाली किस्म और नवंबर से अप्रैल तक अच्छी रिकवरी, किसानों और मिलों दोनों के लिए यह फायदे का सौदा था। यूपी के कुल गन्ना रकबे में इसका हिस्सा 2019-20 में 82.2 फीसदी पहुंच गया।
लेकिन इसी एकतरफा बुवाई ने मुसीबत को न्यौता दिया। लाल सड़न फैलाने वाले कवक (कोलेटोट्रिकम फलकेटम) का बेहद उग्र रूप CF13 सामने आया, और 2020-21 के आसपास को-0238 की रोग-प्रतिरोधक क्षमता टूट गई। उस साल तक यह किस्म यूपी के 86.7 फीसदी गन्ना रकबे में फैल चुकी थी, मतलब एक ही वार पर पूरा खेत ढह गया।
यहीं से असली सबक शुरू होता है। इस किस्म को विकसित करने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. बख्शी राम कहते हैं कि उन्होंने एक ही किस्म की इतनी ज्यादा बुवाई से पहले ही आगाह किया था। खासकर मध्य और पूर्वी यूपी व तराई के उन इलाकों में जहां खेतों में पानी भर जाता है, लाल सड़न के कीटाणु पानी के साथ दूर तक फैलते हैं। “किसी भी क्षेत्र में एक गन्ना किस्म का रकबा 40-50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए, ताकि रोग के खिलाफ आनुवंशिक प्रतिरोध बचा रहे,” डॉ. राम का कहना है। यह बात हर किसान को याद रखनी चाहिए।
अक्टूबर में करण-20 पर फैसला: आंकड़े क्या कहते हैं
अब उम्मीद की नजरें एक नई किस्म पर टिकी हैं: को-20016, जिसे करण-20 कहा जा रहा है। आईसीएआर-एसबीआई ने इसे विकसित किया है। मई में हुई एआईसीआरपी की किस्म पहचान समिति की बैठक में इसे को-0238 के संभावित विकल्प के रूप में चुना गया। अक्टूबर में यह केंद्रीय किस्म रिलीज समिति के सामने रखी जाएगी। अगर मंजूरी मिल गई तो किसान इसे आगामी वसंत (फरवरी-मार्च), ग्रीष्म (अप्रैल-मई) या शरदकालीन (सितंबर मध्य से नवंबर मध्य) बुवाई में लगा सकेंगे।
भारतीय चीनी व जैव-ऊर्जा निर्माता संघ (इस्मा) ने अगस्त 2023 से 16 चीनी मिलों में नई किस्मों के परीक्षण कराए, जिनमें यूपी की 11 मिलें शामिल थीं। तीन साल के परीक्षणों में करण-20 की औसत उपज 144.6 टन प्रति हेक्टेयर रही, जबकि को-0238 की 116.4 टन। शर्करा भी करण-20 में 18.7 फीसदी बनाम 18.3 फीसदी मिली। सबसे अहम बात, यह किस्म लाल सड़न के उग्र CF13 प्रकार के प्रति प्रतिरोधी पाई गई।
डॉ. राम समेत वैज्ञानिक खुद मानते हैं कि असली इम्तिहान अभी बाकी है। वह इम्तिहान प्रयोगशाला में नहीं, किसानों के खेतों में होगा। द प्रिंट की जमीनी रिपोर्ट से भी यही पता चलता है कि करण-20 अभी व्यावसायिक तौर पर जारी नहीं हुई है। मिलना अगले साल से शुरू हो सकता है।
फैसले से पहले किसानों की तैयारी: 4 काम की बातें
तो अक्टूबर के फैसले तक किसान क्या करें? चार बातें समझदारी की हैं।
एक, करण-20 के नाम पर महंगा बीज न खरीदें। किस्म अभी रिलीज ही नहीं हुई है, तो बाजार में “करण-20 बीज” के नाम पर जो बिक रहा है, वह प्रमाणित बीज नहीं हो सकता। ऊंचे दाम पर अंधाधुंध बीज लेना रिस्क है। जब किस्म मंजूर होगी, तब सरकारी एजेंसियों और मान्यता प्राप्त बीज उत्पादकों से बीज मिलेगा।
दो, संक्रमित खेत का उपचार करें। जिन खेतों में लाल सड़न लगी है, वहां रोगी पौधों को निकालकर नष्ट करें। बीज के लिए स्वस्थ गन्ने ही चुनें। डॉ. राम की सलाह याद रखें: पानी भराव वाले खेत लाल सड़न को फैलाने का सबसे बड़ा जरिया हैं, इसलिए जल निकासी दुरुस्त रखें।
तीन, एक किस्म पर पूरा दांव न लगाएं। 86.7 फीसदी रकबे पर को-0238 की कहानी दुहराई नहीं जानी चाहिए। किसी भी क्षेत्र में एक किस्म 40-50 फीसदी से ज्यादा रकबे में नहीं होनी चाहिए। दो-तीन किस्मों का मिश्रण रखना सबसे सुरक्षित रणनीति है।
चार, पेड़ी और रोपण की योजना अभी से बनाएं। अगर अक्टूबर में मंजूरी मिलती है तो शरदकालीन बुवाई (सितंबर मध्य से नवंबर मध्य) का मौसम अगले साल तक आएगा। तब तक प्रमाणित बीज की उपलब्धता और सरकारी योजना की जानकारी अपने क्षेत्र की गन्ना समिति से लेते रहें।
इस्मा के परीक्षणों में एक और किस्म को-21012 भी सामने आई है, जिसकी उपज 129.4 टन प्रति हेक्टेयर रही है। लेकिन लाल सड़न के प्रति इसकी प्रतिरोधक क्षमता का परीक्षण 2027 के मध्य तक पूरा होगा। यानी करण-20 ही सबसे करीबी उम्मीद है।
शामली के हुड्डा जैसे किसान आज मक्का और उड़द की ओर मुड़ गए हैं। यह मजबूरी नहीं, समझदारी भी हो सकती है, लेकिन लंबी अवधि में गन्ना ही पश्चिमी यूपी की धुरी है। करण-20 अगर उम्मीदों पर खरी उतरी तो 2027 की बुवाई में गन्ना फिर से भरोसे की फसल बन सकता है। शर्त बस यही है कि किसान इस बार बीज के मामले में आंख मूंदकर एक ही किस्म के पीछे न भागें।
मुख्य बातें
- लाल सड़न से यूपी का चीनी उत्पादन छह साल में 126.4 से घटकर 89.5 लाख टन रह गया; को-0238 की उपज भी कई इलाकों में आधी रह गई है।
- अक्टूबर में केंद्रीय किस्म रिलीज समिति को-20016 (करण-20) पर फैसला करेगी; परीक्षणों में इसकी उपज 144.6 टन/हेक्टेयर बनाम को-0238 की 116.4 टन रही।
- किस्म अभी रिलीज नहीं हुई, इसलिए करण-20 के नाम पर महंगा बीज न खरीदें; एक किस्म पर 40-50 फीसदी से ज्यादा रकबा न लगाएं।
स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस (उत्तर प्रदेश गन्ना रिपोर्ट), द प्रिंट (जमीनी रिपोर्ट), चीनीमंडी।
