गन्ना किसानों के लिए बड़ी खबर: लाल सड़न से बचाव वाली 12 नई किस्मों को मंजूरी

छह साल में उत्तर प्रदेश का चीनी उत्पादन 126.4 लाख टन से घटकर 89.5 लाख टन रह गया है। यह गिरावट बाढ़ या सूखे की वजह से नहीं आई। वजह वह गन्ना किस्म है जिस पर यूपी के किसान एक दशक से भरोसा करते थे। को.0238 लाल सड़न रोग की चपेट में आ गई, और अब करीब 120 चीनी मिलों को पेराई के लिए गन्ना ही कम मिल रहा है।
स्थिति गंभीर है। इसी संकट से निकलने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। गन्ना आयुक्त की अध्यक्षता में 29 सितंबर को हुई बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की बैठक में चार नई किस्मों को खेती की मंजूरी मिली, जिसकी घोषणा 4 अक्टूबर को हुई। इनमें तीन किस्में शाहजहांपुर के उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद की हैं और एक लखनऊ के भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान की। केंद्र सरकार की मंजूर 8 किस्मों को मिलाकर किसानों के पास अब 12 नई किस्मों का विकल्प है।
नई किस्मों में क्या खास है
सबसे ज्यादा उम्मीद को.शा.23232 से है। यह अगेती किस्म है जिसकी औसत उपज 95.56 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज हुई, यानी को.0238 से 9.44 फीसदी ज्यादा। नवंबर, जनवरी और मार्च में इसमें पोल प्रतिशत केन क्रमशः 13.10, 13.77 और 14.31 पाया गया, जो मानक किस्म से अधिक रहा। पेड़ी की उपज 80.57 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। जारी प्रेस नोट के मुताबिक यह किस्म लाल सड़न रोग के प्रति रोगरोधी है और इसमें पेड़ी की अच्छी क्षमता है।
लखनऊ संस्थान की अगेती किस्म को.लख.21201 की औसत उपज 86.57 टन प्रति हेक्टेयर रही, जो को.0238 के लगभग बराबर है। लेकिन इसमें पोल इन केन 13.94 प्रतिशत पाया गया, जबकि को.0238 में 13.71 प्रतिशत था। यानी उतने ही गन्ने से चीनी ज्यादा निकलेगी। प्रेस नोट के अनुसार यह किस्म लाल सड़न के प्रति उच्च प्रतिरोधक क्षमता रखती है और पूरे उत्तर प्रदेश के लिए अनुमोदित की गई है।
दो मध्यकालीन किस्मों को भी मंजूरी मिली है। को.शा.19235 की औसत उपज 87.58 टन प्रति हेक्टेयर रही, जो को.शा.767 से 21.01 फीसदी ज्यादा है। को.शा.18232 ने 92.38 टन प्रति हेक्टेयर की उपज दी, यानी मानक किस्म से 26.51 फीसदी अधिक, और इसकी पेड़ी भी 82.06 टन प्रति हेक्टेयर रही। दोनों किस्मों में लाल सड़न से बचने की अच्छी क्षमता पाई गई है।
छह पुरानी किस्में दो साल में खेती से बाहर
उप समिति ने एक और अहम फैसला लिया है। छह पुरानी गन्ना किस्मों को अप्रचलित बताते हुए दो साल में खेती से बाहर करने का निर्णय हुआ है। अपर गन्ना आयुक्त और गन्ना शोध परिषद के निदेशक अभिषेक आनंद के मुताबिक इन किस्मों की लोकप्रियता और खेती का रकबा नगण्य रह गया है। गन्ना आयुक्त मिनिस्थी एस. ने कहा कि नई किस्में उपज और चीनी परता दोनों में को.0238 से बेहतर हैं, और इनसे किसानों की आमदनी बढ़ेगी तथा चीनी उद्योग को भी फायदा होगा।
लाल सड़न वाली फसल के किसान अभी क्या करें
नई किस्में भविष्य का रास्ता हैं, लेकिन जिस खेत में इस साल लाल सड़न लगा है, वहां अभी के कदम अहम हैं। बागपत के कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. शिवम सिंह के मुताबिक लाल सड़न बीज जनित भी है और मिट्टी जनित भी। संक्रमित गांठ बोने पर रोग पूरे मौसम में बढ़ता रहता है, और पेड़ी में शुरुआती 5-10 फीसदी संक्रमण अगले साल 30-40 फीसदी तक पहुंच सकता है। उनका साफ कहना है कि रासायनिक दवाओं से इसका प्रबंधन व्यावहारिक रूप से असंभव है, इसलिए किस्म बदलना ही असली समाधान है।
इसी सलाह पर अमल करें। जिस खेत में को.0238 पर लाल सड़न लगा है, वहां से पेड़ी बिल्कुल न लें। रोगी खेत के गन्ने को बीज में इस्तेमाल करने की भूल न करें, क्योंकि अंदर से रोगी बीज नई फसल को जन्म से संक्रमित करेगा। प्रभावित पौधों को जड़ समेत उखाड़कर नष्ट कर दें और उस जगह 10-20 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर डालकर ढक दें। खड़ी सूखी फसल को जल्दी काटकर पेराई करा दें, क्योंकि अंदर से सूखा गन्ना किसी दवा से ठीक नहीं होता। बीज के लिए स्वस्थ बीज नर्सरी प्लॉट के गन्ने का ही इस्तेमाल करें। बुवाई के समय भूमि शोधन के लिए ट्राइकोडर्मा 2 लीटर प्रति एकड़ और बीज शोधन के लिए कार्बेंडाजिम 250 ग्राम प्रति एकड़ की सलाह विशेषज्ञों ने दी है।
शरदकालीन बुवाई में बीज चुनते समय
अभी शरदकालीन बुवाई चल रही है। इस बार बीज चुनते समय सिर्फ उपज नहीं, रोग प्रतिरोध भी पैमाना रखें। को.शा.23232, को.लख.21201 जैसी नई किस्मों के बीज गन्ना समितियों और शोध केंद्रों से मांगें। जिस लॉट में कटे सिरे या गांठों पर लाल रंग दिखे, उसे तुरंत हटा दें। वही बीज अगले साल की सबसे बड़ी मुसीबत बनता है।
मुख्य बातें
- छह साल में यूपी का चीनी उत्पादन 126.4 से घटकर 89.5 लाख टन हुआ; वजह को.0238 पर लाल सड़न का प्रकोप है।
- 29 सितंबर की बैठक में 4 नई किस्मों को मंजूरी, घोषणा 4 अक्टूबर को; केंद्र की 8 किस्मों समेत कुल 12 विकल्प।
- छह पुरानी किस्में दो साल में खेती से बाहर होंगी; रोगी खेत से पेड़ी और बीज न लें, नई किस्में अपनाएं।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस (28 सितंबर 2026), एबीपी लाइव (3 अक्टूबर 2026), किसान तक (1 अक्टूबर 2026), द हिंदू (5 अक्टूबर 2026), द प्रिंट, हिंदुस्तान, न्यूज18 हिंदी।
