260 पहियों पर 1300 किमी चलकर कुंभी पहुंची बायोप्लास्टिक मशीन, नवंबर से उत्पादन

लखीमपुर खीरी के गन्ना किसानों के लिए इस हफ्ते एक ऐसी खबर आई है, जो सीधे उनके खेत से जुड़ी है, भले ही वह किसी मिल के गेट से नहीं, बल्कि एक विशाल मशीन के पहुंचने से जुड़ी हो। गुरुवार की देर रात बलरामपुर चीनी मिल्स के कुंभी परिसर में वह रिएक्टर पहुंच गया, जो देश के पहले एकीकृत गन्ना-से-बायोप्लास्टिक प्लांट का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। मशीन पहुंचते ही स्थापना का काम शुरू कर दिया गया है।
अब तक गन्ने का रास्ता तय था। गन्ने से चीनी बनेगी, शीरे और खोई से एथेनॉल बनेगा। कुंभी का यह प्लांट उस रास्ते में एक और मंजिल जोड़ रहा है। उसी गन्ने से अब बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक भी बनेगा। यानी गन्ने की खपत का एक नया रास्ता खुल रहा है, और लंबे समय में इसका असर मिल की कमाई और किसानों के भुगतान की स्थिरता दोनों पर पड़ सकता है।
गुरुवार की रात कुंभी में क्या पहुंचा
कुंभी पहुंची मशीन को साइक्लाइजेशन रिएक्टर कहते हैं। यह बेल्जियम से आई है और पूरे प्लांट का दिल मानी जाती है। ट्रेलर पर लदी यह मशीन करीब 20 फीट ऊंची, 147 फीट लंबी और 23 फीट चौड़ी थी। इसका वजन करीब 200 टन बताया गया है। कंपनी की कुंभी इकाई के मुख्य महाप्रबंधक सुनील कुमार यादव ने बताया कि कंपनी छह महीने से इस मशीन का इंतजार कर रही थी। उनके मुताबिक स्थापना शुरू हो गई है और अगले महीने से प्लांट के संचालन की उम्मीद है।
यह प्लांट मौजूदा चीनी मिल के बगल में ही बन रहा है, इसलिए गन्ने से लेकर तैयार उत्पाद तक का काम एक ही परिसर में होगा। कंपनी ने इस परियोजना में करीब 3,080 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की है, जो चरणों में करीब ढाई साल में लगेगा। प्लांट की सालाना क्षमता 80,000 टन प्रस्तावित है।
6 महीने, 1300 किलोमीटर और 15 करोड़ का सफर
इस मशीन का सफर मई में ओडिशा के पारादीप बंदरगाह से शुरू हुआ था। वहां से सड़क मार्ग से यह करीब 1300 किलोमीटर चली। रास्ते में चार राज्य और उत्तर प्रदेश के सात जिले पड़े। औसत रफ्तार सिर्फ 10 से 12 किलोमीटर प्रतिदिन रही, इसलिए पूरा सफर करीब छह महीने में पूरा हुआ।
रफ्तार धीमी होने की वजह मशीन का आकार था। रास्ते में बिजली के तार उठाने पड़े, ओवरब्रिज पर रुकावटें हटानी पड़ीं और संकरी सड़कों पर लोहे की चादरें बिछाकर अस्थायी रास्ता बनाना पड़ा। मुंबई की एक कंपनी के करीब 35 प्रशिक्षित कर्मी पूरे सफर के दौरान साथ चले। रवाना होने से महीनों पहले ओडिशा, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में रास्ते का विस्तृत सर्वे किया गया था। जिला प्रशासन, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग, पुलिस और बिजली विभाग ने मिलकर रास्ता साफ रखा। सिर्फ ढुलाई पर ही करीब 15 करोड़ रुपये खर्च हुए।
गन्ने से प्लास्टिक कैसे बनेगा
प्लांट में गन्ने से पहले लैक्टिक एसिड बनेगा, फिर उससे पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए तैयार होगा। पीएलए से छोटे-छोटे पेलेट्स बनेंगे, जिनसे उद्योग पैकेजिंग और कपड़ों जैसे उत्पाद बना सकेंगे। पीएलए पौधों से मिलने वाला बायोबेस्ड पॉलिमर है, जिसे जीवाश्म ईंधन से बनने वाले परंपरागत प्लास्टिक का विकल्प माना जाता है।
एक और बात इस प्लांट को अलग करती है। इसमें जीरो लिक्विड डिस्चार्ज प्रणाली लगाई जा रही है, ताकि औद्योगिक तरल कचरा बाहर न जाए। आसपास के गांवों के लिए यह व्यवस्था इसलिए अहम है, क्योंकि बड़े प्लांट के साथ पानी और पर्यावरण का सवाल भी जुड़ता है।
किसान के लिए इसका मतलब क्या है
सीधा सवाल यही है कि इससे किसान को क्या मिलेगा। तुरंत कोई भाव बढ़ने का दावा करना गलत होगा। प्लांट अभी शुरू भी नहीं हुआ है। लेकिन दिशा साफ है। गन्ने की मांग का एक और बड़ा खरीदार तैयार हो रहा है। जब मिल की कमाई सिर्फ चीनी पर नहीं टिकी होगी, तो मंदी के दौर में भी भुगतान की गुंजाइश बेहतर रहती है। यही वह बिंदु है जो कुंभी और आसपास के गांवों के किसानों के लिए मायने रखता है।
यह भी साफ रखना जरूरी है कि पर्ची, तौल और सट्टे की मौजूदा व्यवस्था पर इस खबर का तत्काल कोई असर नहीं है। किसान की रोजमर्रा की प्रक्रिया वही रहेगी। इस बीच 2026-27 सत्र के गन्ना मूल्य की घोषणा का इंतजार जारी है, और किसान संगठन बढ़े हुए भाव की मांग उठा रहे हैं। कुंभी प्लांट की खबर उसी पृष्ठभूमि में आई है, जहां किसान गन्ने के बेहतर दाम के लिए आवाज उठा रहे हैं।
आगे क्या होगा
अब अगला पड़ाव नवंबर है, जब प्लांट के संचालन की उम्मीद जताई गई है। इस परियोजना की आधारशिला 22 फरवरी 2025 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रखी थी। अगस्त 2026 में जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह ने निर्माणाधीन प्लांट का निरीक्षण भी किया था। रिएक्टर के पहुंचने के साथ ही परियोजना अपने आखिरी चरण में दाखिल हो गई है। नवंबर में संचालन शुरू हुआ तो लखीमपुर खीरी का नाम देश के पहले गन्ना-से-बायोप्लास्टिक उत्पादन से जुड़ जाएगा।
मुख्य बातें
- 260 पहियों वाले ट्रेलर पर बेल्जियम से आया साइक्लाइजेशन रिएक्टर गुरुवार देर रात कुंभी पहुंचा, स्थापना शुरू।
- पारादीप बंदरगाह से 1300 किमी का सफर 6 महीने में पूरा हुआ, ढुलाई पर करीब 15 करोड़ खर्च।
- गन्ने से लैक्टिक एसिड और फिर पीएलए बनेगा, सालाना क्षमता 80,000 टन प्रस्तावित, नवंबर से संचालन की उम्मीद।
स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस, 24 अक्टूबर 2026; पीटीआई/आउटलुक बिजनेस, 21 अगस्त 2026; शुगर टाइम्स।
