पत्ती जलाना बंद, 30 क्विंटल खाद घर पर: जैविक गन्ना खेती की विधि

पेराई सीजन सिर पर है और खेतों में गन्ना कटने लगा है। एक तरफ मिल की पर्ची का इंतजार चल रहा है, दूसरी तरफ खाद-कीटनाशक की दुकान पर दाम सुनकर कलेजा मुंह को आता है। हर सीजन यूरिया, डीएपी और पोटाश का थैला भारी पड़ता जा रहा है। इसी खींचतान में पश्चिमी यूपी के कई किसान पुराना रास्ता पकड़ रहे हैं। रासायनिक खाद कम, देसी जुगाड़ ज्यादा।
संख्याएं देखिए। गन्ना फसल के लिए बुवाई के समय नालियों में लगभग 50 क्विंटल गोबर खाद या कम्पोस्ट डाली जाती है। जैविक विधि अपनाने वाले किसानों के अनुभव के मुताबिक एक एकड़ में 30 से 35 क्विंटल सड़ी गोबर खाद के साथ 100 किलो राख फास्फेट और 100 किलो भंजी अमृत डालना काफी रहता है। और सबसे बड़ी बात, खेत की सूखी पत्तियों से जो खाद बनती है, उसका एक भी रुपया बाहर नहीं जाता। यह गाइड उसी रास्ते की है।
सूखी पत्तियों की ट्रेस मल्चिंग: खेत में ही खाद का कारखाना
कटाई के बाद खेत में बची सूखी पत्तियों को जलाना अब पुरानी आदत है, जिस पर एनजीटी के निर्देशों के बाद रोक भी लगी हुई है। पीलीभीत समेत यूपी के कई जिलों में गन्ना विभाग किसानों को यही समझा रहा है कि पत्तियों को जलाने की बजाय उनसे जैविक खाद बनाई जाए।
तरीका सीधा है। गन्ना कटने के बाद ट्रेस मल्चर मशीन और रैटून मैनेजमेंट डिवाइस से खेत में पड़ी सूखी पत्तियों को टुकड़ों में काटा जाता है। फिर इन्हें भूमि में मिला दिया जाता है, जो बहुत जल्दी सड़कर खाद का रूप ले लेती हैं। इस विधि को ट्रेस मल्चिंग कहते हैं। फायदा दोहरा है। मिट्टी में नमी बनी रहती है और जमीन के केंचुओं की संख्या बढ़ती है, जो खेत की सेहत का सबसे सच्चा पैमाना है। जलाने से धुआं, जुर्माना और मिट्टी की बर्बादी, तीनों से छुटकारा मिलता है।
गोबर खाद और वर्मी कम्पोस्ट की सही मात्रा
गोबर की खाद गन्ने की जड़ है। बुवाई के समय नालियों में डाली गई सड़ी गोबर खाद से जमीन में हवा और पानी का संतुलन बना रहता है। मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है और जीवाणुओं की संख्या में इजाफा होता है। आमतौर पर मिट्टी में 0.75 से 1 प्रतिशत तक कार्बनिक पदार्थ होना जरूरी माना जाता है। रासायनिक खाद धीरे-धीरे इस जीवांश को खा जाती है, गोबर की खाद उसे वापस लाती है।
वर्मी कम्पोस्ट घर पर भी बनाई जा सकती है। लगभग 10 फीट लंबा, 3 से 4 फीट चौड़ा और डेढ़ से 2 फीट गहरा बेड बनाइए। सबसे नीचे 2-3 इंच रेत की परत, उसके ऊपर सूखी पत्तियां और भूसा, फिर 15-20 दिन पहले सड़ाया हुआ गोबर डालिए। केंचुओं के लिए रेड विगलर नस्ल सबसे अच्छी मानी जाती है, एक वर्ग मीटर बेड के लिए करीब 1 से 1.5 किलो केंचुए काफी हैं। बेड हल्का नम रखिए, हर 7 से 10 दिन में ऊपरी परत पलटिए। 45 से 60 दिनों में काली, मुलायम और बिना बदबू की खाद तैयार हो जाती है। इसे 2 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से खेत में डाल सकते हैं।
मिट्टी में नाइट्रोजन बनाए रखने के लिए एजोटोबैक्टर और 4 किलो पीएसबी को गोबर खाद में मिलाकर दूसरी सिंचाई के समय देने की सलाह भी कृषि विशेषज्ञ देते हैं।
जैव कीटनाशक: गन्ना विभाग भी यही कह रहा है
बिजनौर में गन्ना विभाग किसानों को रासायनिक की जगह जैविक कीटनाशक अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। जिला गन्ना अधिकारी के मुताबिक ट्राइकोडर्मा, बावेरिया बेसियाना और ट्राइकोकार्ड जैसे जैव पेस्टीसाइड गन्ने की फसल में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। गन्ना सर्वे में लगे कर्मचारी खेत पर ही किसानों को इनके बारे में बता रहे हैं। विभाग का तर्क साफ है। जैव उत्पाद एक तरफ जमीन को रसायनों के दुष्प्रभाव से बचाते हैं, दूसरी तरफ खेती की लागत घटाते हैं।
इससे ऊपर भी बात गई है। उत्तर प्रदेश के गन्ना आयुक्त ने प्रदेश की सभी चीनी मिलों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने क्षेत्रों में जैव उर्वरक और बायोपेस्टीसाइड प्रयोगशालाएं स्थापित करें। मृदा परीक्षण लैब भी हर मिल क्षेत्र में बनाने को कहा गया है, ताकि हर किसान को स्वायल हेल्थ कार्ड मिल सके। मतलब यह कि जैविक रास्ता अब सिर्फ किसानों की पहल नहीं, विभाग की नीति भी है।
सहफसली से एक ही खेत से दो आमदनी
जैविक गन्ने के साथ बीच की फसल लगाना पुराना और कारगर तरीका है। गन्ने की पंक्तियों के बीच मूंग, उड़द, अदरक या हल्दी जैसी फसलें ली जा सकती हैं। जैविक गन्ना करने वाले कुछ किसानों के अनुभव कृषि पत्रिकाओं में छपे हैं, जिनमें गन्ने के साथ अदरक, हल्दी और मूंग लेने से सालाना आमदनी में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
फायदा सिर्फ पैसों का नहीं है। दलहनी फसलें जमीन में नाइट्रोजन छोड़ती हैं, जो गन्ने के काम आती है। दूसरी फसल से नकदी जल्दी मिलती है, जिससे पेराई का इंतजार थोड़ा आसान हो जाता है। गन्ना लंबी अवधि की फसल है, बीच की फसल इस लंबे इंतजार को छोटा करती है।
एकदम से नहीं, धीरे-धीरे बदलिए
जैविक खेती में सबसे बड़ी गलती जल्दबाजी है। एक सीजन में पूरा खेत रसायन-मुक्त करने की जिद में उपज गिरती है और किसान का भरोसा टूटता है। समझदारी इसी में है कि पहले एक हिस्से पर जैविक विधि आजमाइए। पत्तियों की मल्चिंग और गोबर खाद से शुरुआत कीजिए, जो सबसे आसान और सस्ता कदम है।
मृदा परीक्षण को आधार बनाइए। मिट्टी की रिपोर्ट बताएगी कि जमीन में क्या कम है और क्या ज्यादा। उसी के हिसाब से जैविक खाद की मात्रा तय होगी। मिल क्षेत्रों में मृदा परीक्षण लैब बनने के निर्देश पहले ही जारी हो चुके हैं, तो अपने मिल क्षेत्र की लैब से स्वायल हेल्थ कार्ड बनवाने में देर न करें। दो-तीन सीजन में पूरा खेत जैविक रास्ते पर आ जाएगा, और रासायनिक खाद का खर्च हर साल घटता जाएगा।
मुख्य बातें
- कटाई के बाद पत्तियां जलाने की बजाय ट्रेस मल्चिंग से खेत में मिलाइए। मुफ्त जैविक खाद मिलेगी, नमी बनी रहेगी और जुर्माने का डर खत्म।
- एक एकड़ में 30-35 क्विंटल सड़ी गोबर खाद, 100 किलो राख फास्फेट और घर की बनी वर्मी कम्पोस्ट (2-5 क्विंटल प्रति एकड़) रासायनिक खाद का खर्च घटाती है।
- ट्राइकोडर्मा जैसे जैव कीटनाशक और एजोटोबैक्टर जैसे जैव उर्वरक अपनाइए। बिजनौर गन्ना विभाग इन्हीं को बढ़ावा दे रहा है और गन्ना आयुक्त ने मिल क्षेत्रों में जैव उर्वरक प्रयोगशालाओं के निर्देश दिए हैं।
स्रोत: कृषि जागरण, किसान इंडिया, चिनीमंडी (अमर उजाला के हवाले से गन्ना विभाग के बयान), कृषि टाइम्स (गन्ना आयुक्त के निर्देश)।
