गन्ने में 60 किलो सल्फर का कमाल: उपज बढ़े, उस्सर मिट्टी भी सुधरे

मेरठ के एक किसान ने पिछले साल शिकायत की थी कि यूरिया और डीएपी समय पर डालने के बाद भी उनका गन्ना बाकी खेतों जैसा लंबा नहीं हुआ। पत्तियां हल्की पीली पड़ रही थीं और गन्ने की मोटाई भी कम थी। मिट्टी जांच कराई तो पता चला कि खेत में सल्फर की कमी है।
सल्फर की कमी कैसे पहचानें
सल्फर की कमी की सबसे साफ निशानी नई पत्तियों का पीलापन है। नाइट्रोजन की कमी में पुरानी पत्तियां पहले पीली पड़ती हैं, जबकि सल्फर की कमी में ऊपर की नई पत्तियां पीली दिखती हैं। गन्ना छोटा रह जाता है, कल्ले कम निकलते हैं और पत्तियां पतली व हल्की हरी नजर आती हैं।
पक्का पता लगाने का तरीका मिट्टी जांच है। जिले की मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला में जांच सस्ती होती है और रिपोर्ट में सल्फर का स्तर साफ लिखा रहता है। बिना जांच के अंदाजे पर खाद डालना पैसे की बर्बादी है। जिस खेत में सालों से सिर्फ यूरिया और डीएपी पड़ रहा है और गोबर की खाद कम पड़ी है, वहां सल्फर की कमी की आशंका ज्यादा रहती है।
कितना सल्फर चाहिए, किस रूप में
लखनऊ स्थित भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के खेत परीक्षणों में सल्फर की अलग-अलग मात्राओं का असर परखा गया। 20, 40, 60 और 80 किलो सल्फर प्रति हेक्टेयर डालने पर उपज बढ़ी, लेकिन 60 किलो प्रति हेक्टेयर को सबसे सही स्तर माना गया। पेड़ी पर भी इसका फायदा दिखा। पौधा फसल में सल्फर वाले खेत की पेड़ी की उपज बिना सल्फर वाले खेत से करीब 21 प्रतिशत ज्यादा रही।
हिसाब एकड़ में करें तो 60 किलो प्रति हेक्टेयर का मतलब करीब 24 किलो सल्फर प्रति एकड़ हुआ। बेंटोनाइट सल्फर में करीब 90 प्रतिशत सल्फर होता है, इसलिए एक एकड़ में करीब 27 किलो बेंटोनाइट सल्फर काफी है। जिप्सम में सल्फर के साथ कैल्शियम भी मिलता है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश के अनुसार सल्फर की कमी वाली मिट्टी में 500 किलो जिप्सम प्रति हेक्टेयर, यानी करीब 200 किलो प्रति एकड़ डालना फायदेमंद रहता है।
जिप्सम का दोहरा काम
जिप्सम की खासियत यह है कि यह एक साथ दो काम करता है। सल्फर की कमी वाले खेत में यह सल्फर देता है और क्षारीय यानी उस्सर मिट्टी में यह मिट्टी की बनावट सुधारता है। उस्सर मिट्टी में सोडियम ज्यादा होता है, जिससे मिट्टी सख्त हो जाती है, पानी नीचे नहीं जाता और जड़ें ठीक से फैल नहीं पातीं। जिप्सम का कैल्शियम सोडियम की जगह लेता है, मिट्टी भुरभुरी होती है और पानी व हवा जड़ों तक पहुंचने लगती है।
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में हुए एक अध्ययन में उस्सर मिट्टी में जिप्सम और प्रेसमड के मिले-जुले इस्तेमाल से फसल की पैदावार दोगुनी तक बढ़ी थी। प्रेसमड चीनी मिलों से निकलने वाला अवशेष है जिसमें कैल्शियम सल्फेट और जैविक पदार्थ होता है। यह बताता है कि उस्सर मिट्टी को छोड़ देने की चीज नहीं समझना चाहिए। सही सुधार से वही खेत फिर से कमाई देने लगता है।
उस्सर मिट्टी में जिप्सम कैसे डालें
उस्सर मिट्टी का सुधार एक दिन का काम नहीं है। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान की तकनीक के अनुसार सोडिक मिट्टी के सुधार के लिए प्रति हेक्टेयर 10 से 15 टन जिप्सम डाला जाता है, यानी प्रति एकड़ करीब 4 से 6 टन। यह मात्रा मिट्टी जांच में सोडियम के स्तर पर निर्भर करती है, इसलिए बिना जांच के इतनी बड़ी मात्रा डालना ठीक नहीं है।
तरीका यह है कि खेत को समतल करके मेड़बंदी करें, जिप्सम को मिट्टी की ऊपरी 10 सेंटीमीटर परत में अच्छी तरह मिलाएं और फिर सिंचाई करके लवणों को नीचे बह जाने दें। जिप्सम डालने के बाद पहली फसल के तौर पर धान जैसी सहनशील फसल लेना बेहतर रहता है।
कब डालें और कैसे डालें
सल्फर और जिप्सम डालने का सबसे अच्छा समय बुवाई के समय है। बुवाई के पहले कूड़ों में खाद के साथ मिलाकर डालें ताकि सल्फर जड़ों के पास रहे। पेड़ी फसल में सल्फर की जरूरत हो तो कटाई के बाद शुरुआती सिंचाई के साथ देना ठीक रहता है। सल्फर धीरे-धीरे असर करता है, इसलिए इसे आखिरी समय में डालकर तुरंत नतीजा मांगना गलत होगा।
जिप्सम को कभी भी यूरिया के साथ एक ही जगह ढेर करके मत डालें। खादों को मिट्टी में मिलाना जरूरी है, ऊपर बिखेर देने से आधा असर धूप और हवा में खत्म हो जाता है। सिंचाई के बाद नमी वाली मिट्टी में खाद डालने से उसका असर जल्दी दिखता है। गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट के साथ सल्फर का असर और बेहतर होता है क्योंकि जैविक पदार्थ मिट्टी में सल्फर को पकड़कर रखता है।
वे गलतियां जो खर्च बढ़ाती हैं
सबसे बड़ी गलती बिना जांच के हर साल एक ही खाद दोहराना है। दूसरी गलती सल्फर को नजरअंदाज करके सिर्फ यूरिया बढ़ाते जाना है। ज्यादा नाइट्रोजन से गन्ना लंबा तो दिखता है, लेकिन उसकी मोटाई और मिठास नहीं बढ़ती और फसल गिरने का खतरा बढ़ जाता है। तीसरी गलती सस्ते के चक्कर में बिना लेबल वाली सल्फर खाद खरीदना है। नकली या कम गुणवत्ता वाली खाद से खेत को फायदा नहीं होता और शिकायत का कोई ठिकाना नहीं रहता।
खाद हमेशा विश्वसनीय दुकान से बिल के साथ खरीदें और बोरी पर सल्फर की प्रतिशत मात्रा जरूर पढ़ें। सिंगल सुपर फॉस्फेट से फॉस्फोरस के साथ सल्फर भी मिलता है, इसलिए जो किसान डीएपी की जगह एसएसपी इस्तेमाल करते हैं, उन्हें सल्फर का कुछ हिस्सा वहीं से मिल जाता है।
मुख्य बातें
- गन्ने में सल्फर की सही मात्रा करीब 60 किलो प्रति हेक्टेयर यानी 24 किलो प्रति एकड़ है, इससे ज्यादा डालने पर खास फायदा नहीं मिलता।
- सल्फर की कमी में नई पत्तियां पीली पड़ती हैं, इसलिए लक्षण दिखते ही मिट्टी जांच कराएं, अंदाजे पर दवा मत छिड़कें।
- जिप्सम सल्फर भी देता है और उस्सर मिट्टी भी सुधारता है, लेकिन सोडिक मिट्टी के सुधार के लिए मात्रा मिट्टी जांच से तय करें।
स्रोत: भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ (सल्फर परीक्षण); तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, पोषक तत्व प्रबंधन (जिप्सम सिफारिश); केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सोडिक मिट्टी सुधार तकनीक); हरदोई उस्सर मिट्टी अध्ययन।
