गन्ने के ये 7 रोग-कीट बर्बाद कर सकते हैं सालभर की मेहनत, जानिए बचाव के पक्के उपाय

सुबह खेत की मेड़ पर खड़े होकर गन्ने को देखना किसान की रोज की आदत है। जिस दिन गन्ने की तीसरी-चौथी पत्ती पीली पड़े या ऊपर की पत्तियां छलनी सी दिखें, उस दिन दिल में एक ही सवाल उठता है: यह कौन सी बीमारी आई? गन्ना साल भर की फसल है और एक बार में एक ही आमदनी देता है, इसलिए रोग-कीट का एक हमला पूरे साल की मेहनत पर पानी फेर सकता है।
गन्ने के ज्यादातर रोग-कीट शुरू में ही पहचाने जा सकते हैं। इस गाइड में गन्ने के 7 सबसे खतरनाक रोग-कीटों की पहचान और उनके पक्के उपाय दिए गए हैं।
1. लाल सड़न: गन्ने का ‘कैंसर’
उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के अधिकारियों ने लाल सड़न को गन्ने का कैंसर कहा है, क्योंकि एक बार यह रोग खेत में घुस जाए तो इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है। रोकथाम ही असली इलाज है।
पहचान कैसे करें: पत्तियों के बीच के हिस्से पर भूरे-लाल धब्बे दिखते हैं जो पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। गन्ना काटने पर तने के अंदर लाल रंग के बीच सफेद धब्बे नजर आते हैं, रोगी गन्ने से सिरके जैसी गंध आती है और गांठों से वह आसानी से टूट जाता है। यह रोग मुख्य रूप से संक्रमित मिट्टी और संक्रमित बीज से फैलता है।
बचाव के उपाय: रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करें; कृषि विभाग सीओ-85 और एलके-94184 की सलाह देता है। बीज लगाते समय ध्यान दें: कटे सिरे या गांठों पर लाल रंग दिखे तो उस बीज का इस्तेमाल न करें। खड़ी फसल में रोग दिखे तो प्रभावित पौधों को जड़ समेत उखाड़कर नष्ट कर दें और उस जगह 2-3 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर पानी के साथ डाल दें। रोगी खेत की मेड़ बंद कर दें ताकि उसका पानी पास के खेत में न जाए।
दवा के तौर पर कार्बेडाजिम 50 डब्ल्यूपी की 1.5 से 2.0 किलोग्राम और कॉपर आक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी की 2.5 से 3.0 किलोग्राम मात्रा 1000 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। जैविक बचाव के लिए ट्राइकोडर्मा विरडी 2.5 से 5.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें। याद रखें: रोग लगे खेत से पेड़ी न लें और फसल जल्दी काटकर पेराई करा दें।
2. अगोला बेधक और अंकुर बेधक: चोटी पर हमला
गन्ने की चोटी की ओर बढ़ने वाला अगोला बेधक पश्चिमी यूपी में को-238 किस्म पर सबसे ज्यादा कहर ढाता है। यह ऊपर की पत्तियों को छलनी कर देता है और प्रकोप बढ़ने पर गन्ने का ऊपरी हिस्सा टूट भी सकता है। अंकुर बेधक मिट्टी के पास तने में छेद करके अंदर घुस जाता है, जिससे पौधा सूखने लगता है।
बचाव के उपाय: कृषि विज्ञान केंद्र संभल के प्रभारी डॉ. महावीर सिंह की सलाह के अनुसार प्रभावित कल्लों को काटकर अलग कर दें। कोराजन की 150 मिलीलीटर मात्रा को 400 लीटर पानी में घोलकर गन्ने की जड़ों के पास धार बनाकर डालें, फिर सिंचाई कर दें और उसके बाद 10 किलोग्राम यूरिया प्रति बीघा डालें। मई के पहले सप्ताह में क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी की 150 मिलीलीटर मात्रा 400 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव भी कारगर है, ऐसा कि पौधा नीचे तक भीग जाए। अंकुर बेधक से बचाव बुवाई के समय कारटॉप हाइड्रोक्लोराइड से करें; प्रकोप बाद में दिखे तो कोराजेन की ड्रेचिंग शाम को करें और 24 घंटों में हल्की सिंचाई दें। बिना रसायन के बचाव के लिए प्रति हेक्टेयर 5 ट्राइकोग्रामा कार्ड और 20 से 25 फेरोमोन ट्रैप लगाएं।
3. दीमक और सफेद गिडार: मिट्टी के अदृश्य दुश्मन
दीमक का पता लगाना सबसे मुश्किल है क्योंकि यह जमीन के नीचे जड़ों को खाता है। संकेत यह है कि कुछ पौधे अचानक मुरझाने लगते हैं और जरा सा खींचने पर जड़ से अलग हो जाते हैं। सफेद गिडार भी जड़ों को कुतरता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक बार जड़ें नष्ट हो जाएं तो कोई उपचार काम नहीं करता, इसलिए शुरुआती पहचान ही सब कुछ है।
बचाव के उपाय: 2.5 लीटर क्लोरपाईरीफॉस अथवा 600 मिलीलीटर फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एससी प्रति एकड़, 600 से 1000 लीटर पानी में घोलकर बीज और मिट्टी का उपचार करें। जैविक बचाव के लिए गोबर की सड़ी खाद में 2 किलोग्राम मैटाराइजियम एनीसोपली मिलाकर प्रति एकड़ खेत में डालें।
4. स्मट (कंडुआ) और गुलाबी चिकटा: बीज से शुरू होता बचाव
स्मट यानी कंडुआ में पौधों की पत्तियां छोटी, नुकीली और पंखे के आकार की हो जाती हैं। गुलाबी चिकटा गन्ने की गांठों पर झुंड में चिपककर रस चूसता है। स्मट से बचाव की सबसे पक्की तरकीब बीज उपचार है: गन्ने के टुकड़ों को प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी या कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी के 0.1 प्रतिशत घोल में 10 मिनट डुबोएं। रोगी पौधे दिखते ही नष्ट कर दें। गुलाबी चिकटे के लिए लीफशीथ हटाने के बाद इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल की 200 मिलीलीटर मात्रा 625 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।
दवा छिड़कते समय ये 4 बातें याद रखें
मात्रा नापकर ही डालें: “ज्यादा दवा, ज्यादा असर” वाली सोच गन्ना जला सकती है। मात्रा हमेशा कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की सलाह के अनुसार रखें।
खेत में नमी जरूरी: बेधक कीटनाशकों के छिड़काव के बाद करीब 10 दिन तक खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखें, वरना दवा का असर आधा रह जाएगा।
शुरुआत में ही कार्रवाई: कीट-रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही कदम उठाएं। प्रकोप फैलने के बाद खर्च दोगुना और असर आधा हो जाता है।
अपनी सुरक्षा: छिड़काव में मास्क, दस्ताने और लंबी आस्तीन के कपड़े पहनें; बाद में साबुन से हाथ-मुंह धोएं और खाली पैकेट खेत में न फेंकें।
मुख्य बातें
- लाल सड़न का कोई स्थायी इलाज नहीं है, इसलिए रोग प्रतिरोधी किस्म, स्वस्थ बीज और मेड़बंदी ही सबसे पक्का बचाव है।
- अगोला बेधक पर कोराजेन/क्लोरेंट्रानिलिप्रोल का समय पर छिड़काव और ट्राइकोग्रामा कार्ड सबसे असरदार हैं; ड्रेचिंग हमेशा शाम को करें।
- दीमक और सफेद गिडार जड़ें नष्ट करने से पहले ही रोकें: क्लोरपाईरीफॉस से मिट्टी उपचार या मैटाराइजियम से जैविक बचाव अपनाएं।
स्रोत: उत्तर प्रदेश कृषि विभाग (किसान इंडिया के माध्यम से); अमर उजाला, कासगंज (जिला गन्ना अधिकारी की सलाह); चिनीमंडी/हिंदुस्तान; न्यूज18 हिंदी (कृषि विशेषज्ञ); कृषि जागरण हिंदी
