गन्ने में लाल सड़न दिखी तो देर मत करो: 3 पहचान और बचाव के 5 काम

कटाई के मौसम में खेत में खड़े गन्ने को देखकर किसान को सबसे पहले वजन और मिठास का अंदाजा होता है। उसी खेत में अगर कुछ गन्ने अचानक सूखने लगें, पत्तियां ऊपर से पीली पड़कर झुक जाएं और गन्ना हाथ में हल्का लगे, तो मामला सिर्फ पानी या खाद का नहीं रह जाता। यह लाल सड़न की दस्तक हो सकती है। किसान इसे गन्ने का कैंसर भी कहते हैं, क्योंकि एक बार अंदर फैलने के बाद यह गन्ने की मिठास और वजन दोनों खा जाती है। मिल में ऐसे गन्ने की रिकवरी घटती है। अच्छी बात यह है कि इस रोग की पहचान खेत में ही हो जाती है, बस नजर सही जगह होनी चाहिए।
लाल सड़न एक फफूंद से होने वाला रोग है। इसका वैज्ञानिक नाम कोलेटोट्राइकम फाल्केटम है। यह फफूंद संक्रमित बीज के टुकड़ों और खेत में पड़े पुराने अवशेषों में पनपती है। बारिश और सिंचाई का पानी, हवा और खेत में जमा नमी इसके बीजाणुओं को एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचा देते हैं। ठंडा और गीला मौसम, खेत में पानी का रुकना और साल दर साल एक ही खेत में गन्ना बोना इस रोग को बढ़ावा देता है। सूखे की मार झेल रहा कमजोर पौधा भी इसकी चपेट में जल्दी आता है। इसलिए लाल सड़न को सिर्फ दवा का मामला समझना गलत होगा। यह बीज, पानी और खेत की सफाई से जुड़ा पूरा प्रबंधन है।
पत्तियों पर पहली निशानी
रोग की सबसे पहली बाहरी निशानी ऊपर की तीसरी या चौथी पत्ती पर दिखती है। यह पत्ती किनारों से सूखने लगती है, फिर पीली पड़कर मुरझा जाती है। धीरे धीरे सूखा ऊपर से नीचे की तरफ बढ़ता है। खेत में चलते हुए अगर कुछ पौधों की ऊपरी पत्तियां बाकी खेत से अलग दिखें, पीली और बेजान, तो वहीं रुककर जांच करना सबसे सस्ता उपाय है। इस स्टेज पर रोग को पकड़ लिया तो नुकसान को एक जगह रोकना आसान रहता है।
गन्ना चीरकर देखने वाली असली जांच
पत्ती की निशानी शक पैदा करती है, पक्की पहचान गन्ना चीरकर होती है। शक वाले गन्ने को लंबाई में चीरें। स्वस्थ गन्ने का गूदा सफेद और रसीला होता है। लाल सड़न वाले गन्ने के अंदर लाल रंग की धारियां और धब्बे दिखेंगे, जिनके बीच आड़े सफेद धब्बे बने होंगे। यही लाल और सफेद का मेल इस रोग की खास पहचान है। गन्ने से खट्टी या शराब जैसी गंध भी आ सकती है। रोग बढ़ने पर गन्ना अंदर से खोखला हो जाता है और हाथ से दबाने पर आसानी से टूट जाता है।
फैलाव कैसे रुकता है, यह समझना जरूरी है
रोग फैलने का सबसे बड़ा रास्ता संक्रमित बीज है। जिस खेत में रोग रहा हो, वहां से लिया गया बीज अगली फसल में रोग ले जाता है। बीज के टुकड़े की आंख के दोनों तरफ लालिमा दिखे तो ऐसा बीज बोना ही नहीं चाहिए। दूसरा रास्ता पानी है, और तीसरा खेत में छोड़ा गया कचरा, जो फफूंद को अगली फसल तक जिंदा रखता है। इन तीनों रास्तों को बंद कर दिया तो रोग की आधी ताकत वहीं खत्म हो जाती है।
खेत में दिखते ही ये काम करें
रोग दिखते ही संक्रमित पौधों या गुच्छों को उखाड़कर खेत से बाहर निकालें और जला दें। उन्हें खेत के किनारे या नाली में फेंकना रोग को और फैलाता है। रोग वाले हिस्से की कटाई जल्दी कर लें, रोगग्रस्त फसल की पेड़ी बिल्कुल न रखें और कटाई के बाद खेत के अवशेष पूरी तरह साफ करें। खेत में पानी रुकने न दें। ये काम दवा से ज्यादा असरदार हैं, क्योंकि खड़ी फसल पर छिड़काव से लाल सड़न पूरी तरह काबू में नहीं आती।
अगली बुवाई के लिए बीज का इंतजाम
अगली फसल की तैयारी रोगमुक्त खेत से स्वस्थ बीज चुनने से शुरू होती है। प्रमाणित स्रोत से बीज लें और बोने से पहले हर टुकड़े को देख लें। मानक सिफारिश के अनुसार बीज के टुकड़ों को कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत घोल में करीब 15 मिनट तक डुबोकर उपचारित किया जाता है। दवा हमेशा पैकेट पर लिखी मात्रा और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार इस्तेमाल करें। अपने क्षेत्र में रोगरोधी किस्म उपलब्ध हो तो उसे तरजीह दें।
फसल चक्र: वह कदम जिसे किसान टाल देते हैं
गंभीर रूप से प्रभावित खेत में जानकारों की सलाह है कि 2 से 3 साल तक धान या हरी खाद वाली फसलें लेकर चक्र बदलें। इससे मिट्टी में पड़ी फफूंद का चक्र टूटता है और अगली गन्ना फसल को साफ खेत मिलता है। लगातार एक ही खेत में गन्ना बोना और हर साल पेड़ी रखना रोग को स्थायी मेहमान बना देता है। जिन किसानों के पास खेत कम है, वे कम से कम रोग वाले हिस्से का चक्र तो बदल ही सकते हैं।
वे गलतियां जो नुकसान बढ़ा देती हैं
सबसे बड़ी गलती है रोग वाले गन्ने को बीज के लिए बचा लेना। ऊपर से हरा दिखने वाला गन्ना भी अंदर से संक्रमित हो सकता है, इसलिए बीज की जांच चीरकर ही करें। एक और गलती है संक्रमित पौधों को खेत में ही छोड़ देना। पत्तियों पर दवा छिड़ककर निश्चिंत हो जाना भी नुकसान बढ़ाता है, क्योंकि लाल सड़न अंदर की बीमारी है। रोग की सूचना समिति या कृषि विभाग तक समय पर पहुंचे तो पूरे गांव का खेत बच सकता है।
कटाई के इस मौसम में खेत की एक चक्कर जांच ही सबसे बड़ा बचाव है। तीन निशानियां मिलते ही रोग को पहचान लें, संक्रमित पौधे हटाएं, पेड़ी न रखें और अगली फसल के लिए रोगमुक्त बीज का इंतजाम करें। दवा बीज उपचार तक ठीक है, खड़ी फसल में चमत्कार की उम्मीद न रखें।
मुख्य बातें
- तीसरी या चौथी पत्ती का पीला पड़ना और सूखना लाल सड़न की पहली निशानी है।
- गन्ना चीरने पर लाल गूदे के बीच आड़े सफेद धब्बे और खट्टी गंध पक्की पहचान है।
- संक्रमित पौधे उखाड़कर जलाएं, रोगग्रस्त फसल की पेड़ी न रखें और अगली बुवाई के लिए रोगमुक्त बीज का उपचार करें।
स्रोत: कृषि विश्वविद्यालयों के फसल रोग प्रबंधन पैकेज, केरल कृषि विश्वविद्यालय का फसल रोग पोर्टल, प्लांटिक्स रोग पुस्तकालय और कृषि विस्तार सामग्री।
