गन्ना रकबा घटा तो मिलें चिंतित: पर्ची, भाव और भुगतान पर क्या असर पड़ेगा?

“इस बार पेराई कब से शुरू होगी? और पर्ची पहले जैसी आसानी से मिलेगी या नहीं?” सितंबर के आखिरी हफ्ते में गन्ना बेल्ट के खेतों और चौराहों पर यही दो सवाल सबसे ज्यादा सुनाई दे रहे हैं। अक्टूबर में नया पेराई सत्र शुरू होने वाला है, और इस बार जवाब थोड़ा चिंता बढ़ाने वाला है।
यूपी के 11 सबसे बड़े गन्ना जिलों में 2026-27 सत्र के लिए गन्ने का रकबा 1.6 प्रतिशत घटकर 17.14 लाख हेक्टेयर रह गया है। इसके पीछे सिर्फ आंकड़े नहीं, तीन बड़ी वजहें हैं: जल्दी पेराई की सरकारी ज़िद, गुड़ कारखानों की बढ़ती टक्कर और खेत की बढ़ती लागत।
रकबा कितना घटा, किन जिलों में
ये 11 जिले हैं: अमरोहा, बिजनौर, बुलंदशहर, हरदोई, लखीमपुर खीरी, मेरठ, मुजफ्फरनगर, पीलीभीत, सहारनपुर, शाहजहांपुर और सीतापुर। यहीं राज्य की शीर्ष 20 चीनी मिलें स्थित हैं, जिनमें त्रिवेणी और डीसीएम श्रीराम की खतौली, अजबापुर और दौराला जैसी बड़ी इकाइयां भी शामिल हैं। इन 20 मिलों ने मौजूदा सत्र में 32.11 लाख टन चीनी बनाई, जो राज्य के कुल 89.52 लाख टन उत्पादन का करीब 68 प्रतिशत है।
2025-26 का चीनी सत्र 30 सितंबर को खत्म हो रहा है और 1 अक्टूबर से नया सत्र शुरू हो जाएगा। लेकिन पेराई के लिए उपलब्ध गन्ने का रकबा सिकुड़ गया है। बिजनौर और लखीमपुर खीरी को छोड़कर बाकी 9 जिलों में रकबा घटा है। कुछ जिलों में गिरावट 14 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि जिन दो जिलों में बढ़ोतरी हुई है, वहां यह सिर्फ आधा प्रतिशत के आसपास है। राज्यभर की बात करें तो गन्ने का रकबा 28.61 लाख हेक्टेयर से घटकर करीब 28.13 लाख हेक्टेयर रहने का अनुमान है।
रकबा सिकुड़ने की असली वजह खेत में है
आंकड़ों के पीछे की कहानी किसान की जेब से जुड़ी है। खाद, कीटनाशक और मजदूरी की लागत हर साल बढ़ रही है। गन्ने की प्रमुख किस्म सीओ-0238 में लाल सड़न (रेड रॉट) जैसी बीमारियों ने भी पैदावार को नुकसान पहुंचाया है। मजदूरों की कमी एक और बड़ी परेशानी है। नतीजा यह है कि कई किसान गन्ने से हटकर मक्का, आलू या बागवानी जैसी फसलों की ओर देख रहे हैं, जिनमें पैसा जल्दी और कम झंझट में आता है।
मिलों से भुगतान में देरी भी पुरानी शिकायत है। कुछ जिलों में बकाया महीनों तक अटका रहता है, जिससे किसान को अगली फसल के लिए कर्ज लेना पड़ता है। खर्च बढ़े, भुगतान अटके और बीमारी सताए, तो गन्ने का रकबा घटाना कोई हैरानी की बात नहीं।
जल्दी पेराई की बहस: रिकवरी का सवाल
इस बार सरकार चाहती है कि मिलें जल्दी पेराई शुरू करें। लेकिन चीनी उद्योग के जानकार डी.के. त्यागी चेताते हैं कि कच्चे गन्ने से चीनी की रिकवरी कम मिलती है। उनका कहना है कि अगर मिलें जल्दी शुरू हुईं तो रिकवरी घटने से कुल चीनी उत्पादन कम हो सकता है। हालांकि मिलें सच में जल्दी शुरू होंगी या नहीं, यह उस वक्त चीनी के भाव पर निर्भर करेगा।
दूसरी ओर, इस बार पैदावार की उम्मीद अच्छी है। पश्चिमी यूपी में गन्ने की पैदावार करीब 10 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। मशहूर गन्ना प्रजनक बख्शी राम, जिन्होंने सीओ-0238 किस्म विकसित की थी, कहते हैं कि पैदावार का पूरा फायदा तभी मिलेगा जब मिलें नवंबर से पेराई शुरू करें। जल्दबाजी में कच्चा गन्ना काटना मिल और किसान, दोनों के लिए घाटे का सौदा हो सकता है। कच्चे गन्ने में चीनी की मात्रा कम होती है, जिससे मिल को कम चीनी और किसान को कमजोर गन्ने का कम भाव मिलता है।
गुड़ कोल्हुओं से मिलों को टक्कर
एक और दबाव स्थानीय गुड़ इकाइयों से आ रहा है। गुड़ के दाम मजबूत चल रहे हैं, ऐसे में कोल्हू चलाने वाले किसान को मिल से ज्यादा भाव देने की स्थिति में हो सकते हैं। 2026-27 के लिए सरकार ने गन्ने का एसएपी 400 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। अगर गुड़ वाले इस भाव से ऊपर बोली लगाते हैं, तो गन्ने का बड़ा हिस्सा मिलों के बजाय कोल्हुओं की ओर मुड़ सकता है। मिलों के लिए यह दोहरी मार होगी: रकबा पहले से कम, और उसमें से भी गन्ना बंट जाए।
किसान पर इसका सीधा असर क्या पड़ेगा?
पहला असर पर्ची पर: गन्ना कम हुआ तो मिलें पर्ची कैलेंडर कस सकती हैं और तौल केंद्रों पर भीड़ बढ़ सकती है।
दूसरा भाव पर: चीनी की उपलब्धता घटी तो बाजार भाव चढ़ सकते हैं, पर किसान को फायदा तभी मिलेगा जब गन्ना पका हुआ, समय पर और पूरे तौल के साथ मिल पहुंचे।
तीसरा भुगतान पर: कम रिकवरी से मिलों पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा, तो बकाया अटकने का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए ई-गन्ना ऐप में सट्टा, पर्ची और भुगतान की स्थिति देखते रहें, गन्ना पूरी तरह पकने से पहले न काटें और तौल के समय पर्ची की प्रति संभालकर रखें।
मुख्य बातें
- यूपी के 11 प्रमुख गन्ना जिलों में 2026-27 के लिए रकबा 1.6 प्रतिशत घटकर 17.14 लाख हेक्टेयर रह गया; 9 जिलों में गिरावट, सिर्फ बिजनौर और लखीमपुर खीरी में मामूली बढ़त।
- जल्दी पेराई से चीनी रिकवरी घटने का खतरा; विशेषज्ञों के मुताबिक पैदावार का पूरा फायदा नवंबर से पेराई शुरू करने पर मिलेगा।
- गुड़ इकाइयों की टक्कर और 400 रुपये एसएपी के बीच किसान पर्ची कैलेंडर और ई-गन्ना ऐप पर नजर रखें, कच्चा गन्ना न बेचें।
स्रोत: The Hindu BusinessLine, ChiniMandi, AgriInsite, The Times of India, Rural Voice
