200 लीटर पानी, 10 किलो गोबर: गन्ने की जीवामृत खेती और ₹4000/एकड़ मदद का पूरा हिसाब

हर बुवाई से पहले गन्ना किसान एक ही गणित लगाता है: DAP की बोरी कितनी लगेगी, यूरिया का भाव क्या चल रहा है। एक रास्ता ऐसा भी है जिसमें खेत की मेड़ के पास ही खाद की तैयारी होती है: 200 लीटर पानी, 10 किलो देशी गाय का गोबर और घर के सामान से बना जीवामृत।
दूसरी अच्छी खबर यह है कि केंद्र सरकार का राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) प्राकृतिक खेती अपनाने वालों को ₹4000 प्रति एकड़ प्रति वर्ष, दो साल तक प्रोत्साहन राशि देता है। यानी घर का बना इनपुट और सरकारी मदद, दोनों एक साथ।
जीवामृत है क्या, गन्ने के लिए क्यों काम का है
जीवामृत गोबर, गौमूत्र, गुड़ और बेसन को पानी में सड़ाकर बनाया जाने वाला सूक्ष्मजीव कल्चर है। खेत में देने पर ये सूक्ष्मजीव मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों को पौधे के लिए उपलब्ध रूप में बदलते हैं।
गन्ना 12 से 14 महीने खेत में रहता है और लगातार पोषण मांगता है। रासायनिक खाद तेज पर अल्पकालिक पोषण देती है, जीवामृत धीमा पर निरंतर काम करता है। जो किसान पूरा रसायन एक साथ बंद करने से घबराता है, वह छोटे हिस्से से शुरुआत कर सकता है।
जीवामृत बनाने का नुस्खा: एक एकड़ के लिए 200 लीटर
200 लीटर का ड्रम या सीमेंट की टंकी छांव में रखें, धूप या बारिश न लगे। सामग्री इस क्रम में डालें:
- 200 लीटर पानी
- 10 किलो ताजा देशी गाय का गोबर
- 5 से 10 लीटर गौमूत्र
- 2 किलो गुड़ (कूटकर)
- 2 किलो बेसन (चना या अरहर का)
- एक मुट्ठी अपने ही खेत की जीवंत मिट्टी
गोबर और गौमूत्र को पानी में घोलें, फिर गुड़, बेसन और मिट्टी मिलाकर लकड़ी के साफ डंडे से 5 से 10 मिनट एक दिशा में चलाएं। ड्रम को जूट के बोरे से ढक दें और रोज सुबह-शाम एक बार चलाते रहें। 48 से 72 घंटे में जीवामृत तैयार हो जाता है। तैयार होने के 7 दिन के भीतर इस्तेमाल कर लें।
गन्ने में देने का हिसाब: कब, कितना, कैसे
जीवामृत की 200 लीटर मात्रा एक एकड़ के लिए होती है। सिंचाई के पानी के साथ देना सबसे आसान है। पहले साल प्रति सिंचाई 400 लीटर तक दी जा सकती है, उसके बाद 200 लीटर प्रति एकड़ पर्याप्त माना जाता है। गन्ने में महीने में दो बार, यानी हर 15 दिन में एक बार देना ठीक रहता है। गन्ने की कतारों के पास जड़ क्षेत्र में देना सबसे असरदार रहता है।
फोलियर स्प्रे करना हो तो 10 प्रतिशत घोल बनाएं (1 हिस्सा जीवामृत, 9 हिस्से पानी) और छिड़काव शाम को करें। ड्रिप सिंचाई वाले किसान छानकर दें ताकि नोजल न जाम हो।
बीजामृत: गन्ने के टुकड़ों का उपचार
बुवाई से पहले गन्ने के टुकड़ों को बीजामृत में उपचारित किया जा सकता है। नुस्खा: 5 किलो देशी गाय का गोबर, 5 लीटर गौमूत्र, 50 ग्राम चूना, एक मुट्ठी खेत की मिट्टी और 20 लीटर पानी। गोबर को 12 घंटे भिगोएं, चूने को अलग रातभर घोलें, फिर सब मिलाएं।
गन्ने के टुकड़ों को घोल में डुबोकर छांव में सुखाएं, फिर बुवाई करें। गोबर प्राकृतिक फफूंदनाशी और गौमूत्र जीवाणुरोधी का काम करता है। यह उपचार बुवाई के बाद मिट्टी और बीज से होने वाले रोगों से जड़ों की रक्षा में मदद करता है।
मल्चिंग के साथ जीवामृत का जोड़ा
प्राकृतिक खेती के साथ मल्चिंग चलती है। गन्ने में यह आसान है: कटाई के बाद बची पत्तियां और खोई खेत में ही बिछा दें। यह मल्च नमी बचाता है, खरपतवार दबाता है और सड़कर मिट्टी को जैविक पदार्थ देता है। जीवामृत इस सड़े-गले पदार्थ को तेजी से खाद में बदलने में मदद करता है। बारिश के बाद मल्च के नीचे जीवामृत देना सबसे अच्छा रहता है।
NMNF से मदद कैसे लें: ₹4000/एकड़ और बायो-इनपुट केंद्र
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 25 नवंबर 2024 को राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को मंजूरी दी। कुल बजट ₹2,481 करोड़ है और लक्ष्य 15,000 क्लस्टरों के जरिए एक करोड़ किसानों को जोड़ना है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक मार्च 2026 तक 18.19 लाख किसान जुड़ चुके थे।
किसान के लिए सबसे काम की बातें:
- प्रोत्साहन राशि: ₹4000 प्रति एकड़ प्रति वर्ष, दो साल तक, अधिकतम एक एकड़ के लिए। प्राकृतिक खेती अपनाने, पशुधन के रखरखाव और इनपुट तैयार करने के लिए मिलती है।
- बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRC): क्लस्टर स्तर पर ऐसे केंद्र बन रहे हैं जहां जीवामृत, बीजामृत जैसे तैयार इनपुट मिलते हैं। हर BRC को ₹1 लाख की सहायता, लक्ष्य 10,000 केंद्रों का।
- प्रशिक्षण: KVK और कृषि विश्वविद्यालयों में 33,676 से अधिक संसाधन व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
मदद के लिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या जिला कृषि अधिकारी से NMNF क्लस्टर की जानकारी लें। आधिकारिक पोर्टल naturalfarming.dac.gov.in पर पंजीकरण की प्रक्रिया देखी जा सकती है।
पहले साल में किन बातों का ध्यान रखें
प्राकृतिक खेती में बदलने का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि सब कुछ एक बार में बदलना पड़ता है। समझदारी यह है कि आधा या एक एकड़ से शुरुआत करें। मिट्टी को रसायन-मुक्त व्यवस्था की आदत पड़ने में समय लगता है, इसलिए धीमा बदलाव सुरक्षित रहता है।
जीवामृत में पोषक तत्वों की मात्रा रासायनिक खाद जैसी तयशुदा नहीं होती, यह मिट्टी और मौसम के हिसाब से असर दिखाता है। इसलिए मिट्टी परीक्षण करवाकर ही तय करें कि किस खेत में कितना देना है। एक ईमानदार बात: प्राकृतिक खेती से उपज बढ़ने के दावे कई जगह किए जाते हैं, पर हर खेत का नतीजा अलग होता है। अपना हिसाब-किताब खुद रखें, पहले साल का रिकॉर्ड ही असली गाइड है।
मुख्य बातें
- 200 लीटर पानी में 10 किलो गोबर, 5-10 लीटर गौमूत्र, 2 किलो गुड़ और 2 किलो बेसन मिलाकर 48-72 घंटे में जीवामृत तैयार करें; 7 दिन में इस्तेमाल कर लें।
- गन्ने में सिंचाई के साथ 200 लीटर प्रति एकड़, महीने में दो बार दें; बुवाई से पहले गन्ने के टुकड़ों का बीजामृत से उपचार करें।
- NMNF के तहत ₹4000/एकड़/वर्ष (2 साल तक) प्रोत्साहन और बायो-इनपुट केंद्रों से तैयार इनपुट मिलता है; अपने KVK से क्लस्टर की जानकारी लें।
स्रोत: प्रेस सूचना ब्यूरो (कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, 24 मार्च 2026, NMNF प्रगति); naturalfarming.dac.gov.in (मिशन दिशा-निर्देश); कृषि विशेषज्ञ प्रकाशन (जीवामृत/बीजामृत नुस्खे)।
