गन्ने की नई पत्ती पीली पड़ रही है? जिंक-आयरन की कमी के 5 लक्षण और 3 सस्ते इलाज

सुबह खेत में घुसे तो गन्ना ऊपर से पीला दिखा। नीचे की पत्तियां हरी, ऊपर की नई पत्तियां हल्की पीली। कई किसान इसे रोग समझकर दवा छिड़क देते हैं, खर्चा भी होता है और फायदा नहीं मिलता। असल में यह नजारा अक्सर जिंक और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी का होता है। इनकी जरूरत बहुत कम मात्रा में होती है, लेकिन कमी हो जाए तो बढ़वार रुक जाती है और वजन पर सीधा असर पड़ता है।
पीली पत्ती हमेशा रोग नहीं होती
पत्ती का पीलापन देखकर सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पीलापन कहां से शुरू हुआ है। यही छोटी सी पहचान सही इलाज की दिशा तय करती है।
आयरन की कमी सबसे पहले नई और ऊपर वाली पत्तियों पर दिखती है। नसें हरी रहती हैं, नसों के बीच का हिस्सा पीला पड़ जाता है। कमी ज्यादा बढ़ जाए तो पूरी पत्ती पीली या सफेद सी हो जाती है। जिंक की कमी में पौधे की गांठों के बीच की दूरी कम हो जाती है, गन्ना बौना सा दिखता है, पत्तियां छोटी रह जाती हैं और उन पर धब्बेदार पीली धारियां नजर आती हैं। कल्ले भी कम फूटते हैं।
नाइट्रोजन की कमी से भी पत्तियां पीली होती हैं, लेकिन वहां उल्टा पैटर्न दिखता है। पीलापन पुरानी, नीचे वाली पत्तियों से शुरू होता है और पूरी पत्ती एक समान पीली पड़ती है। अगर नीचे की पत्तियां हरी हैं और ऊपर की पीली, तो नाइट्रोजन की जगह आयरन या जिंक पर शक करना चाहिए।
एक और निशानी ध्यान रखने लायक है। कमी अक्सर पूरे खेत में एक समान नहीं दिखती। ऊंची pH वाली, कल्लर या चूनेदार मिट्टी के टुकड़े में, या जहां पानी ज्यादा देर ठहरता है, वहां लक्षण पहले और ज्यादा दिखते हैं।
कमी होती क्यों है
पश्चिमी यूपी के कई इलाकों की मिट्टी की pH ज्यादा है। ऐसी मिट्टी में जिंक और आयरन मौजूद तो होते हैं, पर पौधे की जड़ों को मिल नहीं पाते। फास्फोरस वाली खाद का ज्यादा इस्तेमाल भी जिंक को बांध देता है, जिससे पौधा उसे उठा नहीं पाता।
दूसरी वजह है गन्ने की लंबी फसल। एक बार बोया गन्ना तीन साल तक खेत में रहता है, पौधा गन्ना और दो पेड़ी। पहले खेतों में गोबर की खाद खूब पड़ती थी, जिससे सूक्ष्म तत्व वापस मिट्टी में लौट आते थे। अब खाद कम पड़ी और रासायनिक खाद में सूक्ष्म तत्व होते नहीं, तो कमी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है।
पहले मिट्टी जांच, फिर खाद
लक्षण देखकर अंदाजा लगाना ठीक है, पर इलाज से पहले मिट्टी की जांच करा लेना सबसे समझदारी का काम है। अपने जिले की मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला या कृषि विज्ञान केंद्र से जांच कराएं। रिपोर्ट में जिंक और आयरन की स्थिति साफ लिखी रहती है।
जांच नहीं हुई है तो भी घबराने की बात नहीं। कृषि विश्वविद्यालयों की सामान्य सिफारिशों के हिसाब से सुधार किया जा सकता है, लेकिन मात्रा अंदाजे से दोगुनी-तिगुनी मत करें।
इलाज: कितना, कब और कैसे
जिंक की कमी का इलाज: जिंक सल्फेट 37.5 किलो प्रति हेक्टेयर, यानी करीब 15 किलो प्रति एकड़, मिट्टी में डालें। इसे बुवाई के समय या फसल की शुरुआती बढ़वार में, सूखी बालू या सड़ी गोबर की खाद में मिलाकर डालना अच्छा रहता है। एक बात का ध्यान रखें, जिंक सल्फेट को फास्फोरस वाली खाद के साथ एक ही जगह मिलाकर न डालें। दोनों को अलग-अलग समय या अलग जगह देना बेहतर है।
आयरन की कमी का इलाज: फेरस सल्फेट 100 किलो प्रति हेक्टेयर, यानी करीब 40 किलो प्रति एकड़, मिट्टी में डालें। खड़ी फसल में कमी दिखे तो पत्तियों पर छिड़काव जल्दी असर दिखाता है। 1 प्रतिशत फेरस सल्फेट और 1 प्रतिशत यूरिया का घोल बनाकर छिड़काव करें, यानी 100 लीटर पानी में 1 किलो फेरस सल्फेट और 1 किलो यूरिया। 15 दिन के अंतर पर छिड़काव दोहराएं, जब तक लक्षण खत्म न हो जाएं। छिड़काव सुबह या शाम को करें, तेज धूप में नहीं।
सभी सूक्ष्म तत्व एक साथ: अगर कई तत्वों की कमी का शक हो तो बुवाई से पहले 50 किलो प्रति हेक्टेयर सूक्ष्म पोषक मिश्रण दिया जा सकता है। इसमें 20 किलो फेरस सल्फेट, 10 किलो मैंगनीज सल्फेट, 10 किलो जिंक सल्फेट, 5 किलो कॉपर सल्फेट और 5 किलो बोरेक्स होता है। इसे 100 किलो सड़ी गोबर की खाद में मिलाकर मिट्टी में डालें।
तीन गलतियां जो नुकसान बढ़ा देती हैं
पहली गलती है हर पीलेपन को नाइट्रोजन की कमी समझकर बार-बार यूरिया डालना। आयरन की कमी में यूरिया से पत्ती हरी नहीं होगी। दूसरी गलती है सब कुछ एक साथ मिलाकर डाल देना। जिंक और फास्फोरस एक जगह मिल जाएं तो जिंक का फायदा घट जाता है। तीसरी गलती है एक छिड़काव से हार मान लेना। छिड़काव का असर धीरे-धीरे दिखता है, इसलिए 15 दिन के अंतर पर दो-तीन बार छिड़काव करना पड़ता है।
कब क्या करें
बुवाई से पहले मिट्टी जांच कराएं और कमी के हिसाब से जिंक या आयरन मिट्टी में डालें। बुवाई के 30 से 45 दिन बाद खेत में घूमकर ऊपर की पत्तियां जरूर देखें। नई पत्तियों में पीलापन दिखे तो छिड़काव शुरू करें। पेड़ी की फसल में भी यही नजर रखें, क्योंकि पेड़ी में कमी के लक्षण जल्दी दिखते हैं।
पत्ती का पीलापन कोई बड़ी बीमारी नहीं है, पर इसे नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। सही पहचान, सही मात्रा और सही समय, यही तीन बातें सूक्ष्म तत्वों की कमी को सस्ते में ठीक कर देती हैं।
मुख्य बातें
- आयरन की कमी नई पत्तियों पर दिखती है, नसें हरी रहती हैं और बीच का हिस्सा पीला पड़ता है, जबकि नाइट्रोजन की कमी पुरानी पत्तियों से शुरू होती है।
- जिंक सल्फेट 37.5 किलो प्रति हेक्टेयर (करीब 15 किलो प्रति एकड़) और फेरस सल्फेट 100 किलो प्रति हेक्टेयर (करीब 40 किलो प्रति एकड़) मिट्टी में डालें।
- खड़ी फसल में 1 प्रतिशत फेरस सल्फेट और 1 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव 15 दिन के अंतर पर दोहराएं, और इलाज से पहले मिट्टी जांच जरूर कराएं।
स्रोत: तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (eagri) गन्ना खाद सिफारिशें, कृषि जागरण, फ्लोरिडा विश्वविद्यालय IFAS गन्ना पोषक निदान, अमर उजाला में कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह।
