पराली न जलाएं: 20 दिन में खेत में बनाएं जैविक खाद, ₹15,000 तक के जुर्माने से बचें

अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा। धान की कटाई चल रही है और खेतों में सुनहरी पराली के ढेर लगे हैं। हर साल इसी समय एक ही दृश्य दोहराता है। एक खेत से धुआं उठता है, फिर दूसरा किसान भी माचिस उठा लेता है। गन्ना बेल्ट के जिन जिलों में धान-गन्ना चक्र चलता है, वहां यह दुविधा आम है: पराली का क्या करें?
माचिस सबसे सस्ता विकल्प लगता है, असल में सबसे महंगा पड़ता है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने 28 जुलाई 2026 को यूपी समेत चार राज्यों को पराली जलाने की ड्रोन निगरानी के निर्देश दिए हैं। पहले निगरानी सैटेलाइट पर ही टिकी थी, पर अब देर शाम या रात में लगाई गई आग भी पकड़ में आएगी। ड्रोन की तस्वीरें साफ होती हैं और खेत की सटीक पहचान हो जाती है।
आग की एक माचिस का असली बिल
उत्तर प्रदेश में पराली जलाने पर ₹2,500 से ₹15,000 तक जुर्माने का प्रावधान बताया गया है (जागरण, अक्टूबर 2025)। सीएम योगी आदित्यनाथ ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में पराली जलाने की घटनाओं को शून्य करने का निर्देश दिया था, और ड्रोन निगरानी के साथ यह अभियान और सख्त हो गया है। जुर्माने के अलावा एक छिपा हुआ खर्च और है। पराली जलाने से मिट्टी का कार्बनिक पदार्थ, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश हवा में उड़ जाता है। अगली फसल में ज्यादा रासायनिक खाद डालनी पड़ती है। मतलब, आग जलाकर किसान अपनी ही जेब से पैसा निकालकर आग में डाल देता है।
पहला तरीका: पूसा डीकंपोजर से 20-25 दिन में खाद
खेत में पराली को खाद में बदलना सबसे आसान और सस्ता तरीका है। पूसा डीकंपोजर (IARI) की विधि हर किसान के काम की है।
घोल बनाना शुरू कीजिए। डेढ़ सौ ग्राम गुड़ को 5 लीटर पानी में उबाल लें, मैल उतार लें और पानी हल्का गुनगुना रह जाने पर उसमें करीब 50 ग्राम बेसन घोल दें। इसके बाद किट के 4 कैप्सूल तोड़कर घोल में मिला दें, कैप्सूल के खोल भी उसी में डाल दें। घोल को मिलाकर गर्म जगह पर रख दें। 4 दिन में घोल तैयार। यही प्रक्रिया दोहराकर 25 लीटर तक घोल बनाया जा सकता है।
खेत में इस्तेमाल यूं करें। 1 एकड़ की पराली के लिए करीब 10 लीटर घोल चाहिए। 10 लीटर घोल को 200 लीटर पानी में मिलाकर पराली बिछे खेत में छिड़क दें, फिर रोटावेटर से पराली को मिट्टी में मिला दें। पराली का मिट्टी में दबना जरूरी है। इसके बाद हल्की सिंचाई कर दें ताकि नमी बनी रहे। करीब 15 दिन बाद पराली गलनी शुरू हो जाती है और लगभग 25 दिन में 95% तक पराली गलकर जैविक खाद बन जाती है। इससे मिट्टी में कार्बन, नाइट्रोजन और फास्फोरस बढ़ता है, जिससे रासायनिक खाद पर निर्भरता घटती है।
दूसरा तरीका: मशीन से पराली मिट्टी में मिलाना
जिनके पास समय कम है या क्षेत्रफल ज्यादा, वे इन-सीटू प्रबंधन की मशीनों से काम निकाल सकते हैं। यूपी सरकार की CRM (फसल अवशेष प्रबंधन) योजना के तहत हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, जीरो टिल सीड ड्रिल, श्रब मास्टर, पैडी स्ट्रॉ चॉपर, मल्चर, रोटरी स्लेशर, एमबी प्लाऊ, बेलिंग मशीन और क्रॉप रीपर जैसी मशीनों पर अधिकतम 50% अनुदान मिलता है। कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) लगाने पर अनुदान 80% तक है।
आवेदन कृषि विभाग के पोर्टल agriculture.up.gov.in पर “यंत्र पर अनुदान हेतु टोकन निकालें” लिंक से होता है। एक कृषक परिवार एक वित्तीय वर्ष में एक से अधिक यंत्र भी ले सकता है। आवेदन के समय ही जमानत धनराशि ऑनलाइन जमा करनी होती है: ₹1 लाख तक के अनुदान वाले यंत्रों पर ₹2,500 और उससे ज्यादा पर ₹5,000। लक्ष्य से ज्यादा आवेदन आने पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति के सामने ई-लॉटरी से चयन होता है। चयन के बाद टोकन कंफर्म होने की तारीख से 30 दिन के अंदर यंत्र खरीदकर रसीद, फोटो और सीरियल नंबर पोर्टल पर अपलोड करना होता है, CHC के लिए यह समय 45 दिन का है। छोटे किसानों के लिए सबसे बढ़िया रास्ता यही है: पूरी कीमत खुद न देकर CHC या यंत्र बैंक से किराए पर मशीन लेकर पराली का प्रबंधन कराएं।
तीसरा तरीका: पराली बेचकर या चारे में बदलकर कमाई
पराली सिर्फ बोझ नहीं, कच्चा माल भी है। बेलिंग मशीन से पराली की गांठें बनाकर बायोमास संयंत्रों को बेचा जा सकता है, जहां से बिजली या बायोगैस बनती है। दूसरा विकल्प चारा है: चॉपर मशीन से पराली काटकर गुड़ और यूरिया मिलाकर साइलेज बनाएं, जो गाय-भैंस के लिए पौष्टिक चारा होता है। इससे चारा खरीद का खर्च घटता है। गांव में कस्टम हायरिंग सेंटर से चॉपर मशीनें किराए पर मिल जाती हैं। यानी पराली को या तो बेचें, या खिलाएं, या खाद बनाएं। आग वाला चौथा रास्ता ही इकलौता घाटे का है।
काम की सही क्रम-योजना
अक्टूबर-नवंबर की खिड़की छोटी होती है, इसलिए क्रम पहले से तय कर लें। कटाई के तुरंत बाद पराली को खेत में समान रूप से बिखेर दें। डीकंपोजर अपनाना हो, तो उसी हफ्ते घोल बनाना शुरू कर दें, क्योंकि उसे तैयार होने में 4 दिन लगते हैं। छिड़काव के बाद रोटावेटर चलाएं और हल्की सिंचाई करें। 25 दिन बाद खेत अगली बुवाई के लिए तैयार हो जाएगा। नवंबर में गेहूं या शरदकालीन गन्ना बोने वाले किसानों के लिए यह समय-सीमा एकदम फिट बैठती है। मशीन का रास्ता चुनना हो, तो CRM पोर्टल पर आवेदन कटाई से पहले ही निपटा लें, क्योंकि ई-लॉटरी और खरीद में समय लगता है। सबसे जरूरी बात: पड़ोसी के खेत में आग देखकर दबाव में न आएं। जुर्माना और मिट्टी का नुकसान, दोनों उसी के खाते में आएंगे जो माचिस जलाएगा।
मुख्य बातें
- पूसा डीकंपोजर से पराली 20-25 दिन में खाद बन जाती है: 150 ग्राम गुड़ + 50 ग्राम बेसन + 4 कैप्सूल का घोल, प्रति एकड़ 10 लीटर घोल + 200 लीटर पानी का छिड़काव, फिर रोटावेटर और हल्की सिंचाई।
- CRM योजना में पराली प्रबंधन मशीनों पर 50% और कस्टम हायरिंग सेंटर पर 80% तक अनुदान; agriculture.up.gov.in पर टोकन से आवेदन, जमानत ₹2,500-₹5,000, ई-लॉटरी से चयन।
- पराली जलाने पर ₹2,500 से ₹15,000 तक जुर्माना और अब ड्रोन निगरानी भी; जलाने के बजाय खाद, चारा या बायोमास बेचकर फायदा लें।
स्रोत: https://hindi.news18.com/news/nation/caqm-drone-monitoring-stubble-burning-punjab-haryana-up-rajasthan-10704002.html, https://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-strict-action-will-be-taken-against-those-burning-stubble-in-uttar-pradesh-cm-yogi-issued-strict-instructions-40006610.html, https://www.etvbharat.com/hindi/delhi/bharat/indian-agricultural-research-institute-develope-pusa-d-composer-capsule-for-stubble-execution/na20211007203103101, https://hindi.krishijagran.com/government-scheme/crm-agricultural-equipment-scheme-in-hindi-subsidy-on-agricultural-machine-for-crop-residue-management-farmers-scheme-2024/?amp=1
