गन्ने के बीच मेंथा: 90 दिन में दूसरी कमाई, 1 एकड़ से 125-200 किलो तेल

बाराबंकी के एक खेत में फरवरी के आखिर में गन्ना बोया गया। पंक्तियां सीधी थीं, पौधे अभी छोटे थे और दो पंक्तियों के बीच करीब तीन फुट की खाली जगह धूप में पड़ी थी। किसान ने उस खाली जगह को खाली नहीं छोड़ा। मार्च में उसने मेंथा की पौध लगा दी। जून आते आते मेंथा कट गया, तेल निकल गया और गन्ना अपनी जगह बढ़ता रहा। उसी खेत से दो फसलें, एक ही सीजन में। यही मेंथा की असली ताकत है। वह गन्ने की जगह नहीं लेता, गन्ने के बीच की खाली जगह का इस्तेमाल करता है।
उत्तर प्रदेश मेंथा तेल के मामले में देश में सबसे आगे है। देश के कुल मेंथा तेल उत्पादन का करीब 90 प्रतिशत अकेले यूपी से आता है और दुनिया के मेंथा तेल में भारत की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत बताई जाती है। तराई के जिले बाराबंकी, रामपुर, बरेली, बदायूं, मुरादाबाद, सहारनपुर और मेरठ मेंथा की पहचान बन चुके हैं।
गन्ने के साथ मेंथा क्यों जमता है
बसंतकालीन गन्ना फरवरी मार्च में बोया जाता है और शुरुआती तीन चार महीनों में उसकी पत्तियां पूरी छाया नहीं बनातीं। मेंथा को धूप चाहिए और उसे भी यही तीन महीने चाहिए। मार्च में लगी मेंथा जून तक तैयार हो जाती है, तब तक गन्ना इतना ऊंचा नहीं होता कि मेंथा दब जाए।
एक बात यहां साफ रखनी जरूरी है। मेंथा गन्ने की देखभाल की जगह नहीं ले सकता। गन्ने की सिंचाई, निराई और खाद अपने समय पर होनी ही चाहिए। जिस खेत में जलभराव होता हो, वहां मेंथा सोच समझकर लगाएं। मेंथा को नमी पसंद है, लेकिन खड़ा पानी उसकी जड़ों को सड़ा देता है।
किस्म चुनें: कोसी और सीम-क्रांति पर भरोसा
लखनऊ के केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान सीमैप ने मेंथा की कई उन्नत किस्में दी हैं। किसानों में सबसे ज्यादा नाम कोसी का है। कोसी की फसल करीब 90 से 95 दिन में तैयार हो जाती है और इसमें मेंथॉल की मात्रा ज्यादा होती है। नई किस्म सीम-क्रांति ठंड और पाले को ज्यादा सहती है और शोध में इसने दूसरी किस्मों से 10 से 15 प्रतिशत ज्यादा तेल दिया है। पौध सामग्री सीमैप, कृषि विज्ञान केंद्र या भरोसेमंद सरकारी नर्सरी से ही लें। मेंथा सकर से लगता है और एक बार अच्छी किस्म का सकर मिल जाए तो किसान उसे दो साल तक अपने खेत में बढ़ा सकता है।
रोपाई का समय ही आधी कमाई तय करता है
मेंथा की रोपाई मार्च से अप्रैल के पहले हफ्ते के बीच करना सबसे अच्छा रहता है। शोध में पाया गया है कि 17 मार्च से 7 अप्रैल के बीच लगाई गई कोसी की फसल का तेल अच्छा रहा, जबकि 14 अप्रैल को लगाई गई फसल का तेल करीब 30 प्रतिशत कम हो गया। देर से रोपाई का मतलब है गर्मी में पौधे का कम समय पाना और तेल की मात्रा घटना। रोपाई के बाद खेत में नमी बनाए रखना जरूरी है, वरना पौध सूख जाती है।
पानी और खाद का हिसाब
मेंथा को बार बार पानी चाहिए। सामान्य सलाह यह है कि सर्दी में करीब 15 दिन और गर्मी में करीब 10 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। पानी का मतलब खेत को तालाब बनाना नहीं है। हर सिंचाई के बाद पानी निकल जाना चाहिए। खाद में गोबर की खाद का अच्छा असर देखा गया है। खेत तैयार करते समय प्रति हेक्टेयर करीब 20 टन गोबर की खाद डालने की सलाह शोध पत्रों में मिलती है। नाइट्रोजन की मात्रा किस्तों में दें, एक बार में पूरा न डालें। शुरुआती दो तीन महीने निराई जरूरी है, क्योंकि तब तक पौधा छोटा होता है और खरपतवार उसे दबा देते हैं।
कटाई और तेल निकालना: जहां मुनाफा बनता या बिगड़ता है
मेंथा की कटाई फूल आने पर, सूखे और धूप वाले दिन करनी चाहिए। बादल वाले दिन या बारिश के बाद काटी गई फसल में मेंथॉल की मात्रा कम हो जाती है। फसल को जमीन से 5 से 10 सेंटीमीटर ऊपर से तेज दरांती से काटें।
तेल निकालने के लिए आसवन इकाई जरूरी है। सीमैप से जुड़ी छोटी आसवन इकाइयां कई गांवों में लगी हैं और कुछ किसान समूह मिलकर भी इकाई चलाते हैं। एक सामान्य इकाई एक बार में करीब 500 किलो हरी पत्ती से करीब 5 किलो तेल निकाल देती है। तेल की कीमत उसकी मेंथॉल मात्रा की जांच से तय होती है और व्यापारी खेत पर आकर तेल खरीदते हैं। तेल को साफ, सूखे और ढक्कन वाले बर्तन में रखें।
कमाई का हिसाब और कीमत का जोखिम
सामान्य प्रबंधन में प्रति हेक्टेयर 20 से 40 टन हरी पत्ती से 125 से 200 किलो तेल मिलता है। अच्छी किस्म और समय पर रोपाई में यह मात्रा इससे ऊपर भी जा सकती है। शोध में कोसी से रोपाई विधि से प्रति हेक्टेयर करीब 293 किलो तेल तक दर्ज हुआ है, लेकिन यह आदर्श स्थिति का आंकड़ा है।
मेंथा तेल की कीमत घटती बढ़ती रहती है। किसी एक साल की कीमत को हमेशा का भाव समझकर खेत में उतरना गलत होगा। ताजा भाव मंडी और व्यापारी से पूछें, पुराने लेखों के भाव पर भरोसा न करें। मेंथा का फायदा यह है कि लागत कम है और फसल सिर्फ तीन महीने की है।
गन्ने के साथ मेंथा कोई जादू नहीं है। यह खाली जगह, खाली समय और सही किस्म का हिसाब है। मार्च में रोपाई, समय पर पानी, धूप में कटाई और सही आसवन। इन चार कड़ियों में से कोई एक टूटे तो तेल घटता है।
मुख्य बातें
- बसंतकालीन गन्ने की पंक्तियों के बीच मार्च से अप्रैल के पहले हफ्ते तक मेंथा लगाएं, जून में धूप वाले दिन कटाई करें।
- कोसी या सीम-क्रांति जैसी सीमैप किस्म का स्वस्थ सकर सरकारी स्रोत से लें, देर से रोपाई से तेल करीब 30 प्रतिशत तक घट सकता है।
- फसल को 5 से 10 सेंटीमीटर ऊपर से काटकर भाप आसवन से तेल निकालें, तेल की कीमत मेंथॉल जांच से तय होती है और भाव घटता बढ़ता रहता है।
स्रोत: सीएसआईआर-सीमैप की किस्म जानकारी और कृषि शोध पत्र, बिज़नेस टुडे और बिज़नेस स्टैंडर्ड की मेंथा खेती रिपोर्ट, कृषि विश्वविद्यालयों के उत्पादन तकनीक लेख।
