गन्ना खेती में ₹4,500/हेक्टेयर तक बचत: 7 आजमाए हुए तरीके

मिल का भुगतान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर खेती की लागत ही भारी पड़ जाए तो खाते में बचता कुछ नहीं। पश्चिमी UP के कई किसान यही बताते हैं कि बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी मिलाकर खर्च इतना बढ़ गया है कि मुनाफे का आधा हिस्सा वहीं निकल जाता है। अच्छी खबर यह है कि खेती की वैज्ञानिक विधियों से यह लागत काफी घटाई जा सकती है, और इसके सरकारी आंकड़े भी मौजूद हैं। UP गन्ना विभाग के मुताबिक ट्रैश मल्चिंग अपनाने वाले किसानों को करीब ₹4,500 प्रति हेक्टेयर की बचत हुई है। इस गाइड में 7 ऐसे ही व्यावहारिक तरीके दिए गए हैं जिन्हें लाखों किसान पहले से आजमा रहे हैं।
1. पेड़ी फसल को प्रबंधन से मजबूत बनाएं
गन्ने की दोबारा बुवाई पर होने वाला खर्च पेड़ी (रटून) प्रबंधन से पूरी तरह बचाया जा सकता है। कटाई के बाद ठूंठों को जमीनी स्तर के पास से बराबर काटें (स्टबल शेविंग), जड़ों के पास की मिट्टी ढीली करें (ऑफ-बारिंग) और खाली जगहों में नई आंखों वाले गन्ने लगाकर गैप भरें। कटाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई देने से आंखें जल्दी फूटती हैं। पेड़ी में नमी बनी रहती है तो सिंचाई की संख्या भी कम लगती है, जिससे पानी और डीजल दोनों की बचत होती है।
2. सहफसली खेती से दोहरी आय, बंटी लागत
गन्ने की लंबी अवधि वाली फसल के बीच खाली जगह में दलहन या सब्जी लेना लागत बांटने का सबसे पुराना और कारगर तरीका है। ट्रेंच विधि से बोए गए गन्ने में मटर, मसूर, चना, आलू या लहसुन आसानी से लगाया जा सकता है। UP गन्ना विभाग के अनुसार राज्य में दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा में किसानों ने गन्ने के साथ दालें, मटर, आलू और लहसुन लगाए, जिससे प्रति हेक्टेयर ₹1,13,640 तक अतिरिक्त आय हुई। दलहनी फसलें हवा से नाइट्रोजन खींचकर मिट्टी में छोड़ती हैं, तो अगले सीजन में यूरिया का खर्च भी घटता है।
3. मिट्टी जांच कराकर खाद डालें, अंधाधुंध नहीं
बिना जांच के यूरिया और DAP डालना पैसे फेंकने जैसा है। गन्ना विभाग के अनुसार मृदा स्वास्थ्य कार्ड के हिसाब से संतुलित खाद डालने वाले किसानों के खाद का खर्च करीब 25% तक घटा। नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या गन्ना समिति से मिट्टी जांच कराएं, फिर उसी के अनुसार NPK की मात्रा तय करें। DAP को बुवाई के समय कूंड में डालें, यूरिया को 2-3 किस्तों में टिलरिंग और बढ़वार के समय दें। इससे पौधे को पोषक तब मिलता है जब उसे जरूरत होती है, बर्बादी नहीं होती।
4. पत्तियां न जलाएं, ट्रैश मल्चिंग करें
गन्ने की सूखी पत्तियां जलाना लागत बढ़ाने वाला सबसे बड़ा नुकसान है। इन्हीं पत्तियों को कतारों के बीच बिछा दें तो वे खरपतवार दबाती हैं, नमी रोकती हैं और सड़कर जैविक खाद बनती हैं। गन्ना विभाग के ट्रैश मल्चिंग कार्यक्रम के तहत राज्य में करीब एक करोड़ हेक्टेयर में यह विधि अपनाई गई, जिससे प्रति हेक्टेयर लगभग ₹4,500 की बचत किसानों को हुई। पत्ती जलाने पर रोक भी है और जुर्माने का डर भी, इसलिए मल्चिंग दोहरा फायदा देती है।
5. ड्रिप सिंचाई पर अनुदान का फायदा उठाएं
सिंचाई पर होने वाला डीजल और मजदूरी का खर्च ड्रिप से काफी घटता है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत सूक्ष्म सिंचाई पर छोटे और सीमांत किसानों को 55% और अन्य किसानों को 45% अनुदान मिलता है, अधिकतम 5 हेक्टेयर तक, राशि सीधे खाते में DBT से आती है। इसके अलावा UP गन्ना विभाग ने गन्ने के लिए ड्रिप पर पायलट योजना चलाई है, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर सीमांत किसानों को 90% और अन्य श्रेणियों को 80% तक अनुदान का प्रावधान है, 45 जिलों में 25,000 हेक्टेयर के लक्ष्य के साथ। ड्रिप से पानी सीधे जड़ों तक पहुंचता है, खरपतवार कम होते हैं और गन्ना आयुक्त के अनुसार उपज 20-25% तक बढ़ सकती है।
6. जैविक विकल्पों से रासायनिक खर्च घटाएं
पूरी तरह जैविक बनना हर किसान के बस की बात नहीं, लेकिन आंशिक विकल्प अपनाकर रासायनिक खाद का खर्च जरूर घटाया जा सकता है। बीजोपचार में ट्राइकोडर्मा जैसे जैव फफूंदनाशी का इस्तेमाल करें, खेत में गोबर की सड़ी खाद या प्रेसमड डालें। एजोटोबैक्टर और PSB जैसे जैव उर्वरक नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाते हैं, जिससे यूरिया और DAP की मात्रा कुछ हद तक कम की जा सकती है। बीजोपचार से शुरुआती रोगों का खतरा भी घटता है, तो दवा का खर्च बचता है।
7. बीज और बुवाई की विधि पर ध्यान दें
गन्ने की बुवाई में बीज की मात्रा ही बड़ी लागत है। चौड़ी कतारों वाली विधियों में प्रति एकड़ गन्ने की खपत कम होती है और अंतःकृषि कार्य आसान होता है। स्वस्थ, रोगमुक्त और प्रमाणित किस्म के बीज से अंकुरण अच्छा होता है, तो दोबारा बुवाई का खर्च नहीं आता। बुवाई से पहले बीज को फफूंदनाशी से उपचारित करना छोटा खर्च है जो बड़े नुकसान से बचाता है।
मुख्य बातें
- पेड़ी प्रबंधन, ट्रैश मल्चिंग और सहफसली खेती बिना नया निवेश किए लागत घटाने के सबसे असरदार तरीके हैं।
- मिट्टी जांच के अनुसार खाद डालने से खाद खर्च में 25% तक की कमी संभव है, यह गन्ना विभाग का आधिकारिक अनुभव है।
- ड्रिप सिंचाई पर PMKSY के 55%/45% अनुदान और UP की पायलट योजना के 80-90% अनुदान की जानकारी लेकर आवेदन करें।
स्रोत: PMKSY आधिकारिक FAQ (pmksy.gov.in); टाइम्स ऑफ इंडिया और ChiniMandi की UP गन्ना विभाग की ड्रिप पायलट योजना पर रिपोर्ट; UP गन्ना विभाग के लागत-घटाव कार्यक्रमों पर प्रकाशित रिपोर्ट।
