गन्ना बुवाई से पहले खेत के 6 काम: ट्रेंच की 30 सेमी नाली से पूरी तैयारी

अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा है। पश्चिमी यूपी के खेतों में ट्रैक्टर चक्कर लगा रहे हैं। शरदकालीन गन्ने की बुवाई की तारीख नजदीक आ रही है और हर किसान का ध्यान अब बीज और खाद पर टिक गया है। पर एक सवाल जो बुवाई के दिन जवाब मांगता है, वह अक्सर पूछा ही नहीं जाता — खेत तैयार है या नहीं?
गन्ना बारह महीने खेत में रहने वाली फसल है। बुवाई के बाद इसकी जड़ों को सुधारने का दूसरा मौका नहीं मिलता। जो किसान बुवाई से पहले खेत पर दो हफ्ते मेहनत करता है, उसे पूरे सीजन उसका फायदा मिलता है। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR) के वैज्ञानिकों की सलाह और धामपुर-बिजनौर क्षेत्र के किसानों के अनुभव के आधार पर यह 6 कामों की तैयारी सूची तैयार की गई है।
1. सबसे पहले सही खेत चुनें
IISR लखनऊ के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार साह की पहली सलाह खेत के चुनाव पर है। ऐसा खेत लें जिसमें पिछली गन्ना फसल में कोई बीमारी न लगी हो। दूसरा, खेत में जलभराव की समस्या न हो। दोमट मिट्टी वाला सामान्य खेत सबसे अच्छा रहता है।
यह बात सुनने में मामूली लगती है। पर लाल सड़न जैसी बीमारी मिट्टी में टिकी रहती है। पिछले साल जिस खेत में बीमारी आई थी, वहां इस बार भी खतरा बना रहता है। खेत बदलना संभव न हो तो कम से कम बीज स्वस्थ और रोगमुक्त रखें।
2. सही नमी पर गहरी जुताई
बारिश थमने के बाद जब खेत में उचित नमी हो, तब पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें। धामपुर चीनी मिल क्षेत्र के किसान इन दिनों गोबर की खाद डालकर गहरी जुताई कर रहे हैं। गहरी जुताई से मिट्टी की निचली परतें ढीली होती हैं और गन्ने की जड़ों को फैलने की जगह मिलती है। बारिश का पानी जमीन में समाता है और नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
गहरी जुताई का एक फायदा ऐसा भी है जो आंखों से नहीं दिखता। मिट्टी में छिपी खरपतवार की जड़ें ऊपर आकर धूप में सूख जाती हैं। कीटों के अंडे और लार्वा भी धूप के संपर्क में आकर कम हो जाते हैं। पिछली फसल के अवशेष मिट्टी में मिलकर जैविक पदार्थ बढ़ाते हैं।
एक चेतावनी भी याद रखें। बहुत गीली मिट्टी में जुताई न करें। गीली मिट्टी में हल चलाने से वह गूंथ जाती है और सख्त ढेले बन जाते हैं, जो बाद में टूटते नहीं।
3. गोबर की खाद जुताई के समय ही मिलाएं
गहरी जुताई के समय ही अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिला दें। मानक सिफारिश 10 टन प्रति हेक्टेयर है, यानी एक एकड़ में करीब 4 टन। खाद मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाती है और नमी रोकने की क्षमता सुधारती है।
खाद को ऊपर बिखेरकर छोड़ देना बेकार है। जुताई के समय उसे मिट्टी में दबाएं ताकि वह निचली परतों में मिल जाए। कच्ची या अधसड़ी खाद न डालें — उसमें खरपतवार के बीज और कीट हो सकते हैं।
4. खेत समतल करें, जल निकास बनाएं
जुताई के बाद कल्टीवेटर या देसी हल से खेत को समतल कर लें। पत्थर और रोड़े निकाल दें। मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए। ऊबड़-खाबड़ खेत में सिंचाई का पानी एक जैसा नहीं बंटता — कहीं ज्यादा पहुंचता है, कहीं कम।
साथ ही जल निकास की नालियां बना लें। अक्टूबर-नवंबर में कभी-कभी तेज बारिश हो जाती है। एक दिन का जलभराव भी गन्ने के बीज को सड़ा सकता है। IISR की सलाह साफ है — जिस खेत में पानी ठहरे, वहां गन्ना न लगाएं।
5. ट्रेंच विधि: 30 सेमी गहरी नाली
पिछले चार-पांच साल में यूपी में ट्रेंच विधि तेजी से लोकप्रिय हुई है। ट्रेंच का मतलब है नाली खोदकर उसमें गहराई में गन्ने की बुवाई करना। IISR के डॉ. साह बताते हैं कि सामान्य विधि से 60-70 टन प्रति हेक्टेयर उपज लेने वाला किसान ट्रेंच विधि से 80-90 टन तक ले सकता है। यानी 10 से 20 टन ज्यादा उपज की संभावना।
ट्रेंचर से 30 सेमी गहरी और 30 सेमी चौड़ी नाली बनाएं। अक्टूबर की बुवाई में एक नाली से दूसरी नाली की दूरी 4 फीट रखें। फरवरी-मार्च की बसंतकालीन बुवाई में यह दूरी घटाकर 3 से साढ़े 3 फीट कर सकते हैं।
6. नाली की तलहटी में बेसल खाद
ट्रेंच बनने के बाद नाली की तलहटी में पहले खाद डालें, फिर बुवाई करें। IISR की सिफारिश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से है — 100 किलो यूरिया, 130 किलो डीएपी और 100 किलो पोटाश। यह तीनों मिलाकर नाली की तलहटी में डाल दें।
बीज के लिए हमेशा स्वस्थ गन्ना चुनें। अपने क्षेत्र के लिए संस्तुत प्रजाति ही लगाएं।
तीन गलतियां जो पूरी तैयारी बिगाड़ देती हैं
पहली — बहुत गीली मिट्टी में जुताई करना। दूसरी — रोगग्रस्त पुराने खेत में बिना सोचे बुवाई कर देना। तीसरी — जल निकास को नजरअंदाज करना। इन तीनों का खामियाजा पूरे सीजन भुगतना पड़ता है।
मुख्य बातें
- गहरी जुताई सही नमी पर पलटने वाले हल से करें; गोबर की खाद 10 टन प्रति हेक्टेयर जुताई के समय ही मिलाएं।
- ट्रेंच 30 सेमी गहरी और 30 सेमी चौड़ी बनाएं; अक्टूबर बुवाई में नालियों के बीच 4 फीट का अंतर रखें।
- नाली की तलहटी में 100 किलो यूरिया + 130 किलो डीएपी + 100 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर डालकर ही बुवाई करें।
स्रोत: भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR) लखनऊ के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार साह (गांव कनेक्शन से बातचीत), धामपुर चीनी मिल क्षेत्र के किसानों के अनुभव (गांव जंक्शन), गन्ना पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज।
