गन्ना कटाई में मजदूर की किल्लत से बचने के 5 पक्के इंतजाम

परची हाथ में आते ही गाँव में एक ही चर्चा शुरू होती है। मिल कब चलेगी, केंद्र पर गन्ना कब तुलेगा और सबसे बड़ा सवाल, कटाई के लिए मजदूर कहाँ से आएँगे। मजदूर मिलने में देर हुई तो खेत में खड़ा गन्ना सूखने लगता है, तौल छूटती है और गेहूँ की बुवाई भी पीछे खिसक जाती है।
पश्चिमी यूपी में 2026-27 का पेराई सीजन अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में ही शुरू हो गया है। प्रदेश में कुल 122 चीनी मिलें हैं, जिनमें से 71 से ज्यादा पश्चिमी यूपी में हैं। इतनी मिलें एक साथ चलेंगी तो मजदूर की माँग भी एक साथ बढ़ेगी। जो किसान अभी से तैयारी कर लेगा, उसका सीजन सबसे कम अटकेगा।
परची मिलते ही बुकिंग पक्की करें
सबसे आम गलती यही है कि किसान परची मिलने के बाद भी मजदूर खोजने में हफ्ते लगा देता है। सही तरीका यह है कि सर्वे और परची की स्थिति साफ होते ही अपने ठेकेदार या मजदूर टोली से बात कर लें। कितने बीघे गन्ना काटना है, किस हफ्ते में काटना है और कितने दिन का काम है, यह सब पहले से बता दें।
मुँहजबानी बात पर भरोसा करना महँगा पड़ता है। पीक सीजन में ठेकेदार के पास कई गाँवों के काम होते हैं। जो किसान पहले बुक करता है, उसी के खेत में टोली पहले पहुँचती है।
कितने मजदूर चाहिए, इसका हिसाब पहले लगाएँ
अंदाजे पर मजदूर बुलाने से दो नुकसान होते हैं। कम बुलाए तो काम लटकता है, ज्यादा बुलाए तो मजदूरी का खर्च बढ़ता है। हिसाब लगाने का आसान तरीका यह है कि पहले अपने गन्ने का अंदाजा लगाएँ। कितने बीघे में गन्ना है और प्रति बीघा कितने क्विंटल निकलने की उम्मीद है।
रिपोर्टों के मुताबिक महाराष्ट्र में एक मजदूर जोड़ी दिन में करीब 2 से ढाई टन गन्ना काट लेती है। मान लीजिए आपको एक हफ्ते में 500 क्विंटल गन्ना काटना है। तो रोजाना करीब 70 क्विंटल कटाई का लक्ष्य रखना होगा। इस लक्ष्य के हिसाब से टोली का आकार तय करें।
मजदूरी दर की बात भी पहले से तय कर लें। रिपोर्टों के अनुसार यूपी में गन्ना कटाई की मजदूरी करीब 55 से 60 रुपये प्रति क्विंटल चल रही है। दर गाँव और सीजन के हिसाब से कुछ ऊपर नीचे हो सकती है। इसलिए अपने इलाके की मौजूदा दर पता करके ही सौदा करें। दर के साथ यह भी तय करें कि मजदूरी में छिलाई, बंडल बनाना और ट्रॉली तक ढुलाई शामिल है या नहीं।
पेशगी का हिसाब लिखित में रखें
कटाई सीजन में पेशगी यानी एडवांस देना आम बात है। ठेकेदार या टोली को पहले कुछ रकम देनी पड़ती है ताकि वे काम के लिए रुकें। दिक्कत तब होती है जब यह लेनदेन सिर्फ याददाश्त पर चलता है। सीजन के आखिर में दोनों तरफ के आँकड़े अलग निकलते हैं और झगड़ा शुरू हो जाता है।
एक छोटी सी डायरी इस झगड़े से बचा सकती है। हर बार रकम देते समय तारीख, रकम और लेने वाले का नाम लिख लें। रोजाना की कटाई भी इसी डायरी में दर्ज करें। किस दिन कितनी ट्रॉली भरी, कितने मजदूर लगे और कितना गन्ना केंद्र पर पहुँचा। सीजन खत्म होने पर यही डायरी हिसाब चुकाने का सबसे पक्का सबूत बनती है।
ट्रॉली और केंद्र का तालमेल बिठाएँ
मजदूर का काम सिर्फ गन्ना काटना नहीं है। कटा हुआ गन्ना समय पर केंद्र या मिल तक पहुँचना भी उतना ही जरूरी है। कटा गन्ना खेत में पड़ा रहे तो उसका वजन घटता है और गुणवत्ता भी गिरती है। इसलिए कटाई का कार्यक्रम ट्रॉली की उपलब्धता से जोड़कर बनाएँ।
जिस दिन कटाई हो, उसी दिन या अगले दिन ट्रॉली लग जाए, यही सबसे अच्छा है। ट्रॉली मालिक से पहले से बात कर लें कि किस तारीख को कितनी ट्रॉली चाहिए। केंद्र पर तौल की पर्ची मिलने के बाद उसकी फोटो या प्रति संभालकर रखें। अगर तौल में कोई गड़बड़ लगे तो उसी समय समिति या केंद्र पर बात करें। हफ्तों बाद शिकायत करने से सबूत कमजोर पड़ जाता है।
मशीन का विकल्प कब अपनाएँ
मजदूर न मिलने की समस्या ने मशीनों की तरफ भी ध्यान खींचा है। महाराष्ट्र में 2026-27 सीजन के लिए करीब 2,720 हार्वेस्टर मशीनें उपलब्ध बताई गई हैं। वहाँ मशीन से कटाई की लागत करीब 450 से 500 रुपये प्रति टन बताई जाती है, जबकि हाथ से कटाई करीब 366 रुपये प्रति टन पड़ती है। अच्छी परिस्थितियों में एक मशीन दिन में 200 टन तक गन्ना काट सकती है।
यूपी में हालात अलग हैं। यहाँ खेत छोटे और बिखरे हुए हैं, और परची की व्यवस्था भी मशीन के हिसाब से लचीली नहीं है। इसलिए मशीन हर किसान के लिए सही नहीं है। जिन किसानों का गन्ना एक जगह बड़े रकबे में है और मजदूर मिलने में लगातार दिक्कत आती है, उनके लिए पड़ोसी किसानों के साथ मिलकर मशीन मँगाना एक विकल्प हो सकता है।
मजदूरों की बुनियादी सुविधा का भी ध्यान रखें
कटाई का काम सुबह से शाम तक धूप और धूल में होता है। जो किसान मजदूरों के लिए पीने के पानी, छाँव में आराम की जगह और प्राथमिक उपचार का इंतजाम करता है, उसकी टोली काम छोड़कर कम जाती है।
महिला मजदूरों की सुरक्षा और सुविधा का खास ध्यान रखें। रात में खेत में अकेले काम न कराएँ। बच्चों को कटाई के खतरनाक काम से दूर रखें। अगर कोई मजदूर बीमार पड़े या चोट लगे तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र ले जाएँ। मजदूर के साथ अच्छा व्यवहार सिर्फ इंसानियत नहीं है, यह अगले सीजन की बुकिंग की गारंटी भी है। अच्छी टोली उसी किसान के पास लौटती है जिसके यहाँ काम और व्यवहार दोनों ठीक मिले हों।
मुख्य बातें
- परची मिलते ही मजदूर टोली की बुकिंग पक्की करें, पीक सीजन में देर करना सबसे महँगा पड़ता है।
- पेशगी और रोजाना की कटाई का लिखित हिसाब डायरी में रखें ताकि सीजन के आखिर में कोई विवाद न हो।
- कटाई, ट्रॉली और केंद्र की तौल का तालमेल बनाएँ, कटा गन्ना खेत में पड़ा रहने से वजन और गुणवत्ता दोनों घटते हैं।
स्रोत: चिनीमंडी, रूरल वॉयस और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टें; यूपी गन्ना विभाग से जुड़ी सार्वजनिक जानकारियाँ।
