पर्ची आ गई, मजदूर नहीं मिले तो क्या होगा? कटाई से पहले ये 7 काम निपटा लें

बिजनौर के एक किसान को पिछले सीजन पर्ची का मैसेज दोपहर में मिला और शाम तक ठेकेदार का फोन नहीं लगा। ठेकेदार की टीम दूसरे गांव में फंसी थी। अगले दो दिन वह खुद मजदूर ढूंढता रहा, तब तक पर्ची की तारीख निकल गई और दोबारा इंडेंट के लिए केंद्र के चक्कर लगाने पड़े। पेराई सीजन में यह कहानी हर गांव में किसी न किसी किसान के साथ दोहराई जाती है। कटाई का काम आखिरी दिन नहीं सुलझता, वह पर्ची आने से हफ्तों पहले सुलझता है।
पर्ची का कैलेंडर पहले समझ लें
कटाई की प्लानिंग पर्ची से शुरू नहीं होती, वह पर्ची के अंदाज़े से शुरू होती है। अपने क्रय केंद्र से पूछें कि आपके गांव की बारी कब आने की संभावना है। सट्टा और पिछले साल की पर्चियों का क्रम देखने से अंदाज़ा लग जाता है कि आपकी बारी नवंबर की शुरुआत में आएगी या दिसंबर में। जिस हफ्ते पर्ची की संभावना बने, उससे दस से पंद्रह दिन पहले मजदूरों की बात पक्की कर लें और ठेकेदार को तारीख व खेत का रकबा साफ बता दें।
कितने मजदूर चाहिए, यह पिछले साल के हिसाब से गिनें
किताबी फॉर्मूले से मजदूर गिनना अक्सर गलत निकलता है क्योंकि हर गांव की रफ्तार अलग होती है। सबसे भरोसेमंद तरीका अपना ही पुराना हिसाब है। पिछले साल कितने बीघे गन्ने की कटाई में कितने आदमी कितने दिन लगे थे, वह डायरी में देख लें। नया खेत हो तो पड़ोस के किसी अनुभवी किसान से पूछें कि उसके खेत में कितनी टीम कितने दिन में निपटी थी। काम का अंदाज़ा लगाने के बाद टीम में दो-चार आदमी ज़्यादा रखें। बीमारी या किसी के न आने पर भी काम रुकेगा नहीं।
ठेका या दिहाड़ी, पहले ही तय करें
दोनों मॉडल चलते हैं और दोनों के अपने फायदे हैं। ठेके में पूरी कटाई की एक तय रकम होती है, इसलिए किसान को रोज़ की हाज़िरी गिनने की चिंता कम रहती है। दिहाड़ी में रोज़ के हिसाब से भुगतान होता है, जो छोटे रकबे या अनिश्चित पर्ची में सुविधाजनक रहता है। ठेका हो या दिहाड़ी, ये बातें पहले साफ कर लें: कटाई के साथ बंडल बंधाई और ट्रॉली तक लदाई शामिल है या नहीं, खाना-रहना किसके ज़िम्मे है, और काम अधूरा छोड़ने पर क्या होगा। रकम व तारीख एक कागज़ पर लिख लें। बाद में याददाश्त पर भरोसा करना महंगा पड़ता है।
दाम तय करते वक्त गांव का रेट और सरकारी बेंचमार्क दोनों देखें
मजदूरी का कोई एक सरकारी रेट कटाई के लिए तय नहीं होता, इसलिए गांव का चलन ही असली बेंचमार्क है। दो-तीन गांवों में पता करें कि इस सीजन कटाई का क्या भाव चल रहा है। बातचीत में एक सरकारी आंकड़ा भी काम आता है। केंद्र सरकार की अधिसूचना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मनरेगा मजदूरी 2025-26 में 252 रुपये प्रतिदिन है। यह कटाई का रेट नहीं है, पर मजदूरों से बातचीत में एक न्यूनतम संदर्भ ज़रूर बनता है। मशीन का विकल्प भी दाम के साथ तौल लें। अमर उजाला की खबर के मुताबिक बहराइच के जरवलरोड क्षेत्र में हार्वेस्टर से कटाई की दर 55 रुपये प्रति क्विंटल तय हुई है, साथ में छह प्रतिशत करदा कटौती। अपने क्षेत्र में हार्वेस्टर सेंटर का रेट पूछकर तुलना करें।
एडवांस दें, पर हिसाब किताब लिखित रखें
कटाई सीजन में एडवांस आम बात है। ठेकेदार को टीम लाने के लिए पहले कुछ रकम चाहिए होती है। एडवांस देने से मना करना टीम ही गंवा सकता है, पर बिना हिसाब के एडवांस देना भी नुकसान करता है। हर भुगतान के साथ तारीख, रकम, किसे दी और किस काम के लिए, यह एक रजिस्टर में लिखें। रोज़ शाम को हाज़िरी गिनें कि कितने आदमी आए और कितना काम हुआ। सीजन के आखिर में सबसे ज़्यादा झगड़े इसी हिसाब को लेकर होते हैं, और लिखा हुआ हिसाब ही दोनों पक्षों को बचाता है।
रहने, खाने और सुरक्षा का इंतज़ाम पहले से करें
बाहर से आने वाली टीम के लिए पीने का पानी, छाया और रात रुकने की जगह का इंतज़ाम पहले दिन से होना चाहिए। काम के दौरान दांती और औज़ारों से चोट का खतरा रहता है, इसलिए एक छोटी फर्स्ट एड किट खेत के पास रखें। महिला मजदूरों के लिए अलग और सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था रखें। बच्चों से कटाई का काम कराना कानूनी और नैतिक दोनों तरह से गलत है, इसलिए टीम में बच्चों को शामिल न करें।
कटाई और पर्ची का तालमेल बिठाएं
सबसे बड़ी गलती पर्ची से पहले ज़्यादा गन्ना काट लेना है। कटा गन्ना जितनी देर खेत में पड़ा रहेगा, उसका वजन उतना घटेगा। इसलिए कटाई उसी रफ्तार से कराएं जिस रफ्तार से ट्रॉली केंद्र तक पहुंच रही है। जिस दिन पर्ची है, उससे एक दिन पहले से कटाई शुरू करना आमतौर पर सही रहता है। ट्रॉली भरने के बाद तुरंत रवाना करें, खेत में भरी ट्रॉली खड़ी रखना सीधा नुकसान है। केंद्र पर तौल की पर्ची मिलने के बाद उसे भी संभालकर रखें, भुगतान के वक्त वही कागज़ काम आता है।
अगर टीम बीच में छोड़ जाए तो बैकअप तैयार रखें
कभी ठेकेदार की टीम दूसरी जगह ज़्यादा भाव मिलने पर चली जाती है, कभी गांव में शादी-त्योहार के कारण आदमी कम पड़ जाते हैं। ऐसे में बैकअप होना ही बचाव है। एक दूसरे ठेकेदार का नंबर पहले से रखें और अपने क्षेत्र के हार्वेस्टर सेंटर का संपर्क भी संभालकर रखें। पड़ोस के किसानों से मिलकर टीम बुक करना भी एक तरीका है। तीन-चार किसान एक साथ बड़ी टीम बुलाएं तो ठेकेदार को भी काम का भरोसा रहता है।
कटाई का प्रबंधन असल में समय का प्रबंधन है। पर्ची आने के बाद दौड़ने वाला किसान हमेशा महंगा मजदूर पाता है और देर से कटा गन्ना पाता है। जो किसान पर्ची से दो हफ्ते पहले टीम, दाम और हिसाब पक्का कर लेता है, उसकी कटाई शांत ढंग से निपटती है। इस सीजन पर्ची का इंतज़ार मत कीजिए, आज ही ठेकेदार से बात करके तारीख पक्की कीजिए।
मुख्य बातें
- पर्ची की संभावना बनते ही दस से पंद्रह दिन पहले मजदूरों की बुकिंग पक्की करें, आखिरी दिन पर मत छोड़ें।
- ठेका या दिहाड़ी, दाम, लदाई, खाना-रहना और एडवांस की शर्तें पहले ही लिखित में तय करें।
- कटाई पर्ची की रफ्तार से कराएं, कटा गन्ना खेत में न पड़ा रहने दें और हर भुगतान का लिखित हिसाब रखें।
स्रोत: अमर उजाला (बहराइच हार्वेस्टर कटाई दर, अक्टूबर 2026); भारत सरकार ग्रामीण विकास मंत्रालय की अधिसूचना (उत्तर प्रदेश मनरेगा मजदूरी 2025-26: 252 रुपये प्रतिदिन); गन्ना विकास विभाग, उत्तर प्रदेश (पर्ची व क्रय केंद्र व्यवस्था)।
