गन्ना कटा तो 20 नवंबर तक गेहूं बो दें, हर दिन की देर 40 किलो उपज घटाएगी

ट्रॉली मिल से लौट आई है और खेत खाली पड़ा है। अब किसान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि गेहूं कब बोया जाए। मुजफ्फरनगर में 8 मिलों की पेराई 24 अक्टूबर से शुरू हो रही है, और जैसे-जैसे पेराई आगे बढ़ेगी, खेत खाली होते जाएंगे। इस खाली खेत पर गेहूं की बुवाई जितनी जल्दी होगी, उतनी ही अच्छी उपज की उम्मीद रहेगी।
गेहूं की बुवाई में देर का हिसाब सीधा है। शोध के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सबसे अच्छा समय 1 से 20 नवंबर तक है। इस समय बोया गया गेहूं सर्दी का पूरा फायदा उठाता है और दाना भरने का समय भी ठंडा रहता है। 20 नवंबर के बाद हर दिन की देर प्रति हेक्टेयर 40 से 50 किलो उपज घटा देती है। दस दिन की देर का मतलब है करीब 4 से 5 क्विंटल का नुकसान, जो सीधा किसान की जेब से जाता है।
देर हो जाए तो किस्म बदलना ही असली बचाव है
गन्ने के खेत देर से खाली होते हैं, यह सच्चाई है। इसलिए गन्ने के बाद गेहूं बोने वाले किसान को समय वाली किस्म की जिद छोड़नी चाहिए। भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए लेट बुवाई की किस्मों में PBW 752, PBW 771, DBW 173, JKW 261, HD 3059 और WH 1021 की सिफारिश की है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए DBW 316, PBW 833, DBW 107 और HD 3118 सुझाई गई हैं।
इनमें DBW 173 का नाम खास तौर पर ध्यान देने लायक है। यह लेट बुवाई की सिंचित दशा के लिए विकसित किस्म है, गर्मी सहने की क्षमता इसमें बेहतर है और पीले तथा भूरे रतुए के प्रति प्रतिरोध भी है। परीक्षणों में इसकी औसत उपज 47.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अधिकतम क्षमता 57 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज हुई है। लेट किस्में कम समय में पक जाती हैं, इसलिए मार्च के आखिर की गर्मी से दाना भरने का काम ज्यादा प्रभावित नहीं होता।
IIWBR की सलाह के मुताबिक बुवाई 25 दिसंबर तक पूरी कर लेनी चाहिए। इसके बाद बोया गया गेहूं गर्मी की चपेट में आकर दाना सिकोड़ देता है। बीज खरीदते समय दुकानदार से यह भी पूछें कि वह किस्म समय वाली है या लेट वाली। गलत किस्म का बीज सबसे महंगी गलती साबित होता है।
बीज दर में कंजूसी नहीं, बुवाई विधि में समझदारी चाहिए
उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के मुताबिक लाइन में बुवाई करने पर सामान्य दाने के लिए 100 किलो और मोटे दाने के लिए 125 किलो बीज प्रति हेक्टेयर काफी है। छिटकवां विधि में यही मात्रा बढ़कर 125 और 150 किलो हो जाती है। बुवाई से पहले बीज का अंकुरण जरूर जांचें, क्योंकि कम अंकुरण वाला बीज खेत में जगह-जगह खाली पौधे छोड़ देता है।
सीड ड्रिल से बुवाई में बीज और खाद दोनों सही गहराई पर गिरते हैं, बीज की बचत होती है और पौधे एक समान उगते हैं।
जीरो टिलेज: गन्ने के बाद गेहूं का सबसे तेज रास्ता
गन्ना कटने के बाद खेत तैयार करने में सबसे ज्यादा समय जुताई में जाता है। दो-तीन जुताई और पाटा चलाने में एक से दो हफ्ते निकल जाते हैं। जीरो टिल ड्रिल इस चक्कर को खत्म कर देती है, बिना जुताई के सीधे बीज बो दिया जाता है, जिससे मिट्टी की नमी बची रहती है और बुवाई समय पर हो जाती है।
गन्ने के खेत के लिए यह तरीका इसलिए भी ठीक है क्योंकि कटाई के बाद खेत में नमी मौजूद रहती है। जीरो टिलेज से डीजल और मजदूरी दोनों की बचत होती है। जिन किसानों के पास अपनी ड्रिल नहीं है, वे कस्टम हायरिंग से यह काम करा सकते हैं।
दिसंबर की बुवाई में नुकसान का पूरा हिसाब समझ लें
कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर में बुवाई करने पर उपज में 3 से 4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की कमी आती है। जनवरी में बुवाई हुई तो हर हफ्ते की देर 4 से 5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का नुकसान कर देती है। पर्ची और तौल का काम अपनी जगह है, पर गेहूं की बुवाई को उसके भरोसे टालना ठीक नहीं। जिस खेत की कटाई हो गई है, उसकी बुवाई की तैयारी उसी दिन से शुरू कर देनी चाहिए। बीज पहले से मंगा लें और ड्रिल की बुकिंग पहले से करा लें।
तीन गलतियां जो भारी पड़ती हैं
समय वाली किस्म को देर से बोना, खेत की तैयारी में हफ्तों लगा देना और बीज दर में कंजूसी करना, ये तीनों गलतियां गन्ने के बाद गेहूं में भारी पड़ती हैं। कम बीज से पौधों की संख्या घट जाती है और खाली जगह खरपतवार ले लेता है, जिसकी भरपाई बाद में खाद या पानी से नहीं होती।
गन्ने के बाद गेहूं की फसल किसान की दूसरी कमाई है, घर का अनाज और बाजार की आमदनी दोनों संभालती है। इसीलिए बुवाई का कैलेंडर पर्ची के कैलेंडर से अलग रखना होगा। खेत खाली होते ही गेहूं का बीज खेत में होना चाहिए, यही इस सीजन का सबसे सीधा नियम है।
मुख्य बातें
- उत्तर प्रदेश में गेहूं बुवाई का सबसे अच्छा समय 1 से 20 नवंबर है, इसके बाद हर दिन की देर प्रति हेक्टेयर 40 से 50 किलो उपज घटाती है।
- गन्ने के बाद लेट बुवाई में पश्चिमी यूपी के लिए DBW 173, PBW 752, PBW 771 और पूर्वी यूपी के लिए DBW 107, DBW 316 जैसी किस्में चुनें, बुवाई 25 दिसंबर तक पूरी करें।
- लाइन बुवाई में 100 से 125 किलो बीज प्रति हेक्टेयर रखें, सीड ड्रिल या जीरो टिल ड्रिल से बुवाई करें ताकि नमी बचे और समय की बचत हो।
स्रोत: उत्तर प्रदेश कृषि विभाग (गेहूं उत्पादन तकनीक), ICAR-IIWBR की लेट बुवाई किस्म सलाह, टाइम्स ऑफ इंडिया (वाराणसी) में प्रकाशित बुवाई समय पर शोध।
