एक कूड़े में 6 से कम कल्ले? उपज आधी रह जाएगी — शरद गन्ने की टिलरिंग जांच गाइड

खेत के मुंहाने पर दो किसान फसल देख रहे थे। एक बोला, “फसल तो हरी-भरी है, बढ़िया निकलेगा।” दूसरा खेत में उतरा, दस जगह झुककर कूड़ों के कल्ले गिने और बोला, “हरी तो है, पर कल्ले कम हैं — आधा ही निकलेगा।” कटाई के समय दूसरा किसान सही निकला।
गन्ने की उपज का सबसे ईमानदार पैमाना आंखों से नहीं, गिनती से मिलता है। हर कल्ला (टिलर) एक संभावित गन्ना है — कल्ले आधे, तो मिल तक पहुंचने वाले गन्ने भी आधे। अक्टूबर-नवंबर शरदकालीन बुवाई का समय है, और सितंबर-अक्टूबर में बोए खेतों में अभी कल्ले निकलने की अवस्था अपने चरम पर है। यही वह खिड़की है, जब खेत की सेहत जांची भी जा सकती है और सुधारी भी जा सकती है।
कल्ले गिनने का दस मिनट वाला तरीका
खेत के बीच से दस कूड़े चुनिए — किनारे वाले मत लीजिए, उन्हें ज्यादा धूप मिलती है और वे पूरे खेत का हाल नहीं बताते। हर कूड़े के कल्ले गिनकर दसों का औसत निकालिए।
गिनती के साथ मोटाई भी देखिए — पेंसिल जितने पतले कल्ले गिनती में तो जुड़ जाते हैं, पर मिल तक पहुंचने से पहले ही सूख जाते हैं। उंगली जितने मोटे, हरे और सीधे खड़े कल्ले ही असली पूंजी हैं।
आपकी गिनती क्या कहती है
औसत 8 से 10 कल्ले: खेत बढ़िया हाल में है। खाद-पानी की जो व्यवस्था चल रही है, उसे जारी रखिए। बस मिट्टी चढ़ाने का समय न चूकिएगा।
औसत 6 से 8 कल्ले: सुधार की गुंजाइश है। नीचे बताए चार इलाजों में से जो कमी दिखे, उसे इसी हफ्ते ठीक कर लीजिए।
औसत 6 से कम कल्ले: यह खतरे का संकेत है। इतने कल्लों से मिलेबल गन्नों की संख्या इतनी कम रहेगी कि उपज आधी से ज्यादा नहीं निकलेगी। अब इलाज का समय है।
कल्ले कम निकलने के चार बड़े कारण और हर एक का इलाज
1. नाइट्रोजन एक ही बार में देना
कल्ले बनाने में नाइट्रोजन सबसे अहम है, पर पूरी यूरिया बुवाई पर डाल देने वालों के खेत में कल्ले फूटने के समय तक पोषक तत्व खत्म हो चुके होते हैं।
उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव पाठक की सलाह है कि बची हुई नाइट्रोजन दो-तीन बार में सिंचाई के बाद डालें — सिंचाई के बाद अच्छी गुड़ाई करके प्रति एकड़ एक बोरी यूरिया पौधों की जड़ों के पास डालने से कल्लों की संख्या तेजी से बढ़ती है। उनकी चेतावनी भी याद रखिए — टॉप ड्रेसिंग में डीएपी न डालें, क्योंकि उसमें मौजूद फास्फोरस जड़ों तक नहीं पहुंचता और खाद बेकार जाती है।
किस्तों का फॉर्मूला: बुवाई पर नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा, कल्ले निकलते समय दूसरी किस्त, मिट्टी चढ़ाते समय तीसरी। फास्फोरस, पोटाश और जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही दे दीजिए।
2. खेत में खाली जगह (गैप)
जहां बीज नहीं उगा, वहां कल्ले निकलने का सवाल ही नहीं — हर खाली जगह उस हिस्से से शून्य उपज का मतलब है। बुवाई के तीन-चार हफ्ते के अंदर खेत घूमकर गैप देखिए और ताजे सेट लगाकर भर दीजिए। देर से भरे गैप के पौधे पुराने पौधों की छांव में दब जाते हैं।
3. खरपतवार का कब्जा
कल्ले निकलने के समय खरपतवार फसल का करीब 30 प्रतिशत पोषण चुरा लेते हैं। समय पर निराई-गुड़ाई सबसे सस्ता इलाज है — खरपतवार हटते हैं और मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है, जिससे गांठों से नए कल्ले फूटने में मदद मिलती है।
4. जड़ों के पास ठहरा पानी
कल्लों को नमी चाहिए, पर ठहरा पानी नहीं। कूड़े के पास दो-तीन दिन भी पानी ठहर जाए तो नीचे की गांठें सड़ने लगती हैं और नए कल्ले मर जाते हैं। अक्टूबर की बारिश के बाद खेत में पानी ठहरा है या नहीं, जरूर देखिए — नालियों की निकासी साफ रखिए।
शरदकालीन बुवाई वालों के लिए खास बातें
अक्टूबर-नवंबर में बुवाई कर रहे किसानों के लिए सर्दियों की कम और तिरछी धूप में कतारों की दूरी का असर दोगुना हो जाता है। कृषि विज्ञानियों की सिफारिश है कि ट्रेंच विधि अपनाएं — एक फीट चौड़ी और 25-30 सेमी गहरी नाली, दो नालियों के बीच 120 सेमी की दूरी। चौड़ी नालियों में हर कूड़े तक धूप पहुंचती है और कल्ले दबते नहीं।
बीज दर भी कल्लों की नींव है — तीन आंख वाले टुकड़े हों तो प्रति एकड़ 14 से 16 हजार, दो आंख वाले हों तो 20 से 24 हजार टुकड़े पर्याप्त माने जाते हैं। बीज कम डालने पर खेत में जगह खाली रह जाती है।
खाद की मात्रा मिट्टी परीक्षण के अनुसार तय कीजिए। लाल बहादुर शास्त्री गन्ना किसान संस्थान, लखनऊ की सिफारिश: सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 200 किलो नाइट्रोजन, 80 किलो फास्फोरस, 60 किलो पोटाश और 30 किलो सल्फर। जिंक सल्फेट 10 किलो और सल्फर 10 किलो प्रति एकड़ से गन्ने की मोटाई और वजन दोनों बढ़ते हैं।
पेड़ी फसल में टिलरिंग की जांच
पेड़ी में कल्ले ठूंठ की गांठों से निकलते हैं, इसलिए इलाज अलग है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. श्री प्रकाश यादव के अनुसार कटाई जमीन की सतह से सटाकर करें — ऊपर बचे ठूंठ से कमजोर कल्ले निकलते हैं। कटे ठूंठों पर बाविस्टिन 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें, पुरानी जड़ों को काटकर नई जड़ें निकलने दें, और नाइट्रोजन की 25 प्रतिशत अतिरिक्त मात्रा समय पर दें। इन उपायों से पेड़ी में फुटाव 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ता है।
गिनती को आदत बनाइए
खेत के एक कोने में दस कूड़े चिह्नित करके हर पंद्रह दिन में गिनती नोट कीजिए। जो किसान तीन-चार बार कल्ले गिनता है, वह खाद-पानी का हर फैसला आंकड़े पर करता है, अंदाजे पर नहीं।
मुख्य बातें
- खेत के बीच से 10 कूड़े चुनकर कल्ले गिनिए — औसत 6 से कम हो तो तुरंत इलाज शुरू कीजिए, औसत 8-10 आदर्श स्थिति है।
- नाइट्रोजन तीन किस्तों में दें — बुवाई पर एक तिहाई, कल्ले निकलते समय दूसरी, मिट्टी चढ़ाते समय तीसरी; टॉप ड्रेसिंग में डीएपी न डालें।
- शरदकालीन बुवाई में ट्रेंच विधि (120 सेमी दूरी) और सही बीज दर अपनाएं; पेड़ी में ठूंठ प्रबंधन और 25 प्रतिशत अतिरिक्त नाइट्रोजन से फुटाव बढ़ता है।
स्रोत: News18 हिंदी (उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर — डॉ. संजीव पाठक; कृषि वैज्ञानिक डॉ. श्री प्रकाश यादव), Krishi Jagran (शरदकालीन गन्ने की वैज्ञानिक खेती), Dainik Jagran (बाराबंकी — लाल बहादुर शास्त्री गन्ना किसान संस्थान, लखनऊ)
