खेत में पानी भर गया? गन्ने की फसल बचाने के ये 7 काम तुरंत कर लीजिए

बारिश थम चुकी है, लेकिन खेत में अब भी घुटनों तक पानी खड़ा है और गन्ना आधा डूबा हुआ है। मन में एक ही सवाल घूम रहा है कि ये पानी फसल का कितना नुकसान कर जाएगा? निचले खेतों में पानी जमा होना आम बात है, लेकिन इसे समय पर न निकाला जाए तो गन्ने की जड़ें सड़ने लगती हैं और फसल बीमारियों की चपेट में आ जाती है।
अच्छी खबर ये है कि थोड़ी सी समय पर सावधानी से बड़ा नुकसान टाला जा सकता है। गन्ना विकास विभाग और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के आधार पर यहां जलभराव से गन्ना बचाने के व्यावहारिक उपाय दिए जा रहे हैं।
जलभराव से गन्ने को असल नुकसान क्या होता है
गन्ने की जड़ों को सांस लेने के लिए हवा चाहिए। खेत में लंबे समय तक पानी भरा रहने से मिट्टी के भीतर की हवा खत्म हो जाती है और जड़ें कमजोर पड़ने लगती हैं। माधोपुर के क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार, खड़े पानी से जड़ों का नुकसान शुरू होता है और फफूंद जनित रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
चीनी मिलों की तरफ से किसानों को जारी सलाह में भी कहा गया है कि जलभराव वाले खेतों में रेड रॉट और विल्ट जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, और पानी उतरने के बाद पत्तियों के पीले पड़ने जैसे लक्षणों पर नजर रखनी चाहिए।
पहला और सबसे जरूरी काम: पानी की निकासी
सबसे पहले खेत से खड़ा पानी निकालिए। ये काम जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा। खेत के निचले सिरे पर नाली खोदकर पानी को बाहर की ओर बहा दीजिए। अगर खेत बिल्कुल समतल है और पानी अपने आप नहीं निकल रहा, तो डीजल या इलेक्ट्रिक पंप से पानी निकालना ही एकमात्र रास्ता है।
एक बात का ध्यान रखें: जल निकासी की नाली ऐसी बनाएं कि अगली बारिश में भी पानी खेत से बाहर जाए, अंदर न ठहरे। जिन खेतों में हर साल पानी भरता है, वहां मेड़बंदी के साथ स्थायी जल निकासी की व्यवस्था बनाना लंबे समय में फायदेमंद रहता है।
खरपतवार हटाना भी उतना ही जरूरी
पानी उतरते ही खेत में खरपतवार तेजी से पनपते हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, ये खरपतवार मिट्टी के पोषक तत्वों को तेजी से सोख लेते हैं, जिससे गन्ने के पौधों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर फसल की बढ़वार और गुणवत्ता पर पड़ता है।
जलजमाव और खरपतवार मिलकर फफूंद जनित रोगों का खतरा बढ़ा देते हैं, इसलिए पानी निकलते ही निराई-गुड़ाई करके खरपतवार साफ कर दीजिए।
जड़ सड़न और बीमारियों पर कड़ी नजर
जलभराव के बाद सबसे बड़ा खतरा जड़ सड़न रोग का होता है। गन्ना विकास विभाग, उत्तर प्रदेश ने किसानों को सलाह दी है कि प्रभावित खेतों का नियमित भ्रमण करें और बीमारी के लक्षण वाले पौधों की पहचान करें।
अगर जड़ सड़न के लक्षण दिखें, तो विभाग की सिफारिश के अनुसार 2 ग्राम थायोफेनेट मिथाइल 70 WP या कार्बेन्डाजिम 50 WP को प्रति लीटर पानी में घोलकर जड़ों के पास ट्रेंचिंग करें। मतलब, प्रभावित पौधों की जड़ों के आसपास इस घोल को डालना है ताकि फफूंद का प्रकोप रुक सके। खुद से कोई भी दवा इस्तेमाल करने के बजाय कृषि विशेषज्ञ की सलाह पर ही उपचार करें, ये चीनी मिलों की सलाह में भी दोहराया गया है।
फसल को दोबारा ताकत देने के लिए पोषण
पानी में डूबी फसल की जड़ें पोषक तत्व सोखना बंद कर देती हैं, इसलिए पानी उतरने के बाद फसल को बाहरी पोषण देना जरूरी हो जाता है। गन्ना विकास विभाग के परामर्श के अनुसार, किसान NPK 19:19:19 उर्वरक का 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर पत्तियों पर छिड़काव कर सकते हैं।
ये फोलियर छिड़काव पौधों को तेजी से ताकत देता है क्योंकि पोषक तत्व सीधे पत्तियों से अवशोषित होते हैं। इससे फसल की बढ़वार दोबारा पकड़ में आती है और उत्पादन पर पड़ने वाला असर कम होता है।
गिरे हुए गन्ने को सीधा करके बांध दीजिए
तेज हवा के साथ हुई बारिश में जहां गन्ना जमीन पर गिर गया है, उसे बारिश रुकते ही सीधा करके बांध दीजिए। कृषि परामर्श के अनुसार, लंबे समय तक जमीन पर पड़े गन्ने में अनचाही नई शाखाएं (वाटर शूट्स) निकलने लगती हैं, जिससे गन्ने की क्वालिटी और वजन दोनों घट जाते हैं।
खासतौर पर बीज वाले गन्ने को सुरक्षित रखना जरूरी है, क्योंकि आगामी बुआई के समय उसी की जरूरत पड़ेगी। पौधों को एक साथ बांधने से फसल दोबारा संभल जाती है।
अगली बार के लिए: सही किस्म का चुनाव
जिन इलाकों में हर साल जलभराव की समस्या रहती है, वहां जलभराव सहन करने वाली किस्में लगाना समझदारी है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार राजेंद्र गन्ना-01, राजेंद्र गन्ना-02 और CoP 9301 जैसी किस्में जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं, जो बेहतर उत्पादन और अधिक शर्करा के लिए जानी जाती हैं। अपने क्षेत्र की चीनी मिल या कृषि विभाग से सलाह लेकर ही किस्म का चुनाव करें।
फसल बीमा है तो सूचना समय पर दें
अगर आपकी फसल का बीमा हुआ है और जलभराव से नुकसान हुआ है, तो नुकसान की सूचना तय प्रक्रिया के तहत 48 घंटे के भीतर देनी होती है। कृषि परामर्श में इस बात पर खास जोर दिया गया है। देरी करने पर दावा प्रक्रिया में दिक्कत आ सकती है। अपने क्षेत्र के कृषि अधिकारी या बीमा कंपनी के टोल-फ्री नंबर पर तुरंत संपर्क करें।
मुख्य बातें
- खेत में खड़ा पानी तुरंत निकालें, वरना जड़ें सड़ेंगी और रेड रॉट जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ेगा।
- जड़ सड़न पर थायोफेनेट मिथाइल या कार्बेन्डाजिम (2 ग्राम प्रति लीटर) की ट्रेंचिंग और NPK 19:19:19 (5 किलो प्रति हेक्टेयर) का पत्तियों पर छिड़काव फायदेमंद है।
- गिरे गन्ने को बांधें, खरपतवार हटाएं और बीमा होने पर 48 घंटे के भीतर नुकसान की सूचना दें।
स्रोत: गन्ना विकास विभाग उत्तर प्रदेश की किसान सलाह; क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र माधोपुर के वैज्ञानिकों की सिफारिशें; चीनी मिलों (सिसवा आईपीएल, उत्तम शुगर, शामली शुगर) द्वारा जारी कृषि परामर्श; कृषि समाचार रिपोर्टें (News18 हिंदी, TractorJunction, KisanTak, GaonJunction)।
