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पानी भरे खेत में गन्ना गलता क्यों है: ट्रेंच विधि से 60-70% जमाव का तरीका

✍️ GannaUP डेस्क · 🗓 30 Oct 2026 · ⏱ 5 मिनट में पढ़ें

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पानी भरे खेत में गन्ना गलता क्यों है: ट्रेंच विधि से 60-70% जमाव का तरीका

बारिश थमे चार दिन हो गए, पर खेत का पानी वहीं का वहीं है। गन्ने की निचली पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं और जड़ के पास की मिट्टी से सड़ांध सी उठ रही है। नीची जमीन वाले हर किसान ने यह मंजर देखा है। पानी एक-दो दिन रुके तो गन्ना झेल जाता है, लेकिन हफ्ता भर खड़ा पानी फसल की सांस ही रोक देता है। इस नुकसान से बचा जा सकता है, बशर्ते बुआई से पहले ही निकासी का इंतजाम हो।

पानी रुकते ही जड़ों की सांस क्यों रुकती है

मिट्टी के कणों के बीच के छिद्रों से ही जड़ों तक हवा पहुंचती है। पानी भरते ही इनमें हवा की जगह पानी भर जाता है और ऑक्सीजन का संचार बंद हो जाता है। बढ़वार रुक जाती है, पत्तियां पीली पड़ती हैं, जड़ें सड़ने लगती हैं। लंबे समय तक पानी रहे तो पोक्का बोइंग और लाल सड़न जैसी बीमारियों का हमला तेज हो जाता है। समतल बुआई वाले खेत में यह खतरा सबसे ज्यादा होता है, क्योंकि पानी निकलने की कोई राह ही नहीं होती। पानी में डूबी पेड़ी की क्षमता भी खत्म हो जाती है।

सबसे पहले पानी निकालो, खाद बाद में

पानी भरे खेत में पहला काम सिर्फ एक है, पानी बाहर निकालना। खेत के निचले किनारे से निकासी की नाली खोलें और गांव की नाली या नाले तक रास्ता साफ रखें। कई बार खेत की नाली सही होती है, पर आगे कचरा या मिट्टी जमने से पानी अटक जाता है। टूटी मेड़ों की मरम्मत भी साथ करें, वरना पानी खेतों में घूमता रहेगा और कोई खेत नहीं सूखेगा।

पानी भरे खेत में यूरिया मत डालें, गीली मिट्टी में खाद पौधे तक पहुंचती ही नहीं। सिंचाई भी तब तक रोकें जब तक ऊपरी मिट्टी सूखने न लगे। पानी उतरने के बाद हल्की गुड़ाई करें, ताकि मिट्टी में हवा फिर घुस सके। पीली पत्ती या सड़न दिखे तो गन्ना विशेषज्ञ या कृषि विज्ञान केंद्र से तुरंत सलाह लें, पहचान में देर ही सबसे महंगी पड़ती है।

ट्रेंच विधि: बुआई से पहले का पक्का इलाज

जलभराव वाले खेतों के लिए उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद्, शाहजहांपुर ने संशोधित ट्रेंच विधि विकसित की है। इसमें समतल बुआई की बजाय 25 से 30 सेंटीमीटर गहरी और 30 सेंटीमीटर चौड़ी नाली खोली जाती है। इसी नाली में गन्ने के टुकड़े बोए जाते हैं। परिषद् के अनुसार, इस विधि से जमाव 60 से 70 प्रतिशत तक मिलता है, जबकि पारंपरिक विधि में जमाव सिर्फ 40 से 50 प्रतिशत तक रहता है। वजह साफ है: बीज के ऊपर सिर्फ 2 से 3 सेंटीमीटर मिट्टी पड़ती है, इसलिए अंकुर आसानी से बाहर आता है और नमी टिकी रहती है।

नाली में दो आंख वाले उपचारित टुकड़े प्रति मीटर 10 की दर से क्षैतिज या सीढ़ीनुमा ढंग से डालें, आंखें अगल-बगल में रहें। भारी बारिश में यही नाली पानी की निकासी का रास्ता बन जाती है और मेड़ें सूखी रहती हैं। नमी कम हो तो पहली सिंचाई तुरंत करें, नमी पर्याप्त हो तो 2 से 3 दिन बाद भी चलती है। फरवरी-मार्च की बसंतकालीन बुआई करने वाले किसान इस विधि पर अभी से विचार करें, ट्रेंच बुआई से पहले ही खोलनी होती है। बसंतकालीन बुआई की पूरी तैयारी अलग गाइड में दी गई है।

किस्म चुनते समय पानी सहने की क्षमता पूछो

जलभराव वाले इलाके में बीज का चुनाव आधी लड़ाई है, ऐसी किस्म चुनें जो ज्यादा पानी और नमी सह सके। विशेषज्ञों के अनुसार, इन क्षेत्रों में CoS 13231, CoP 9301, Co 98014 और CoLk 94184 जैसी किस्में सफल पाई गई हैं। बीज लेने से पहले गन्ना विकास अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र से पूछें कि इनमें से कौन सी किस्म आपके इलाके की मिट्टी और मिल क्षेत्र के लिए ठीक है। पड़ोसी की देखादेखी में किस्म मत चुनें, गलत चुनाव की मार बीज पर भी पड़ती है और उपज पर भी।

मिट्टी को पहले से मजबूत करो

जलभराव से लड़ने की ताकत मिट्टी की संरचना से भी आती है, इसलिए बुआई से पहले प्रति एकड़ 10 से 15 टन सड़ी गोबर खाद या प्रेसमड डालें। सड़ी खाद मिट्टी के कणों को जोड़ती है, जिससे पानी रुकने पर भी जड़ों को कुछ हवा मिलती है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद का हिसाब लगाना सबसे सही तरीका है, क्योंकि हर खेत की कमी अलग होती है। जिंक या फास्फोरस की कमी हो तो मात्रा मिट्टी परीक्षण की रिपोर्ट से ही तय करें, अंदाजे से खाद डालना नुकसान ही करता है।

पानी उतरने के बाद खड़ी फसल की देखभाल

पानी उतरते ही काम खत्म नहीं होता। सूखी पत्तियों की छंटाई करें, ताकि हवा और रोशनी पौधों तक पहुंचे, वरना पत्तियों के बीच की उमस में रोग जल्दी फैलता है। पेड़ी वाले खेतों में सड़े ठूंठों की सफाई के बाद ही देखभाल शुरू करें, सड़े ठूंठ से नई कोंपल नहीं निकलती। पेड़ी की शुरुआत के 30 दिन के काम इसमें मदद करेंगे।

जलभराव के बाद गन्ना कमजोर होता है, इसलिए रस चूसने वाले कीटों पर भी नजर रखें। पत्तियों के नीचे की तरफ नियमित जांच करें, शुरुआत में पकड़ में आ जाए तो नुकसान सीमित रहता है।

मुख्य बातें

  • खेत में लंबे समय तक पानी रुकने से जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिलती, बढ़वार रुकती है और पोक्का बोइंग व लाल सड़न का खतरा बढ़ता है; पहला काम निकासी की नाली खोलना है।
  • संशोधित ट्रेंच विधि में 25-30 सेंटीमीटर गहरी, 30 सेंटीमीटर चौड़ी नाली में दो आंख वाले उपचारित टुकड़े बोए जाते हैं, जिससे जमाव 60-70 प्रतिशत तक मिलता है, जबकि पारंपरिक विधि में 40-50 प्रतिशत ही रहता है।
  • जलभराव वाले खेतों के लिए CoS 13231, CoP 9301, Co 98014 और CoLk 94184 जैसी किस्में सफल पाई गई हैं; बुआई से पहले प्रति एकड़ 10-15 टन सड़ी गोबर खाद या प्रेसमड डालें और किस्म की पुष्टि स्थानीय विशेषज्ञ से करें।

स्रोत: उ.प्र. गन्ना शोध परिषद् (UPCSR), शाहजहांपुर, संशोधित ट्रेंच विधि से गन्ना बुआई की तकनीक; किसान तक, बाढ़ और जलभराव वाले इलाकों में गन्ने की तकनीक व किस्में।

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Aamir Raza
लेखक

GannaUP के संस्थापक एवं मुख्य संपादक। UP गन्ना उद्योग, पर्ची प्रणाली, SAP/FRP मूल्य नीति और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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