गन्ने में फव्वारा सिंचाई: 32% पानी बचाएं, 5 स्टेप में रेनगन सेट करें

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक किसान का ट्यूबवेल हर सिंचाई में पहले से ज्यादा देर चलता था, फिर भी खेत के एक कोने में पानी खड़ा रहता था और दूसरे तक नमी पहुंचती नहीं थी, क्योंकि ढलान एक सी नहीं थी। फव्वारा लगाकर देखने पर उसी ट्यूबवेल से पानी पूरे हिस्से में बराबर फैला। पानी छिड़ककर दिया जाए तो बंटवारा बराबर होता है और बर्बादी कम होती है।
फव्वारा सिंचाई असल में क्या करती है
फव्वारा सिस्टम में पंप से पानी पाइपों के जरिए स्प्रिंकलर तक पहुंचता है और वहां से बारीक बूंदों के रूप में फसल पर गिरता है, जैसे हल्की बारिश हो रही हो। नाली खोदने का काम इसमें नहीं होता, और ऊंची-नीची जमीन पर भी पानी एक जैसा फैलता है।
गन्ने के लिए तीन रूप सबसे ज्यादा काम आते हैं। पोर्टेबल स्प्रिंकलर छोटे खेतों में एक जगह से दूसरी जगह लगाया जा सकता है। रेनगन बड़े खेतों में कम पॉइंट से ज्यादा रकबा कवर करता है। मिनी और माइक्रो स्प्रिंकलर नई बुवाई या पेड़ी की शुरुआती बढ़त में काम आते हैं।
कितना पानी बचता है, और यह आंकड़ा कहां से आया
पुणे के वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट के प्रयोगों में रेनगन से सतही सिंचाई की तुलना में 32 प्रतिशत पानी, 15 प्रतिशत ज्यादा उपज और 25 प्रतिशत तक खाद की बचत दर्ज की गई। यह प्रयोग महाराष्ट्र में हुआ था, इसलिए इसे हर खेत का गारंटीड नतीजा नहीं मानना चाहिए।
उत्तर प्रदेश के उद्यान विभाग के एक प्रदर्शन कार्यक्रम में भी स्प्रिंकलर से परंपरागत सिंचाई की तुलना में लगभग 25 से 40 प्रतिशत तक जल उपयोग में कमी और उत्पादन में 20 से 25 प्रतिशत तक वृद्धि की बात कही गई थी। बचत तभी मिलती है जब दबाव सही हो, स्प्रिंकलर के दायरे थोड़े ओवरलैप करें और समय सही हो।
गन्ना पानी मांगने वाली फसल है। गन्ना वैज्ञानिकों के अनुसार बुवाई से कटाई तक गन्ने को लगभग 1800 से 2200 मिलीमीटर पानी की जरूरत पड़ती है, जिसमें से करीब 1000 मिलीमीटर बारिश से मिल जाता है। बाकी सिंचाई से पूरा करना पड़ता है, इसलिए सिंचाई का तरीका सीधे बिजली-डीजल के खर्च से जुड़ता है।
किस खेत के लिए कौन सा सिस्टम सही है
एक से दो एकड़ के खेत में, जहां पंप छोटा है और किसान खुद सिस्टम उठाकर लगाना चाहता है, पोर्टेबल स्प्रिंकलर आमतौर पर आसान रहता है। पांच एकड़ से बड़े, एक ही टुकड़े वाले खेत में रेनगन का फायदा ज्यादा दिखता है, क्योंकि एक पॉइंट से बड़ा दायरा कवर होता है और पाइप बार-बार बदलने की मेहनत घटती है। पर रेनगन को ज्यादा दबाव चाहिए।
मिट्टी भी चुनाव में बोलती है। रेतीली मिट्टी में छोटी सिंचाई बार-बार दें। भारी चिकनी मिट्टी में ज्यादा देर तक चलाना कीचड़ और जड़ सड़न का खतरा बढ़ाता है। नई बुवाई में तेज धार से अंकुर उखड़ सकते हैं।
लगाने के 5 स्टेप, क्रम से
पहला स्टेप है पंप की जांच। पंप की क्षमता और पाइपलाइन का दबाव जाने बिना स्प्रिंकलर खरीदना अंधेरे में तीर चलाना है। दुकानदार से पूछें कि पंप कितने स्प्रिंकलर एक साथ चला सकता है, क्योंकि ज्यादा चलाने पर दबाव बंट जाता है।
दूसरा स्टेप है खेत का नक्शा मन में बनाना। स्प्रिंकलर इस तरह लगाएं कि एक का दायरा दूसरे से थोड़ा मिले, वरना बीच में सूखा पैच रह जाएगा।
तीसरा स्टेप है पाइप और फिटिंग की सही कसावट। जोड़ ढीले रह गए तो दबाव वहीं से निकल जाएगा। पहली बार हर जोड़ पर रिसाव जांचें और छोटा रिसाव भी उसी दिन ठीक करें।
चौथा स्टेप है सिंचाई का समय चुनना। सुबह जल्दी या शाम को फव्वारा चलाना सबसे अच्छा रहता है। दोपहर की धूप में बूंदें सूख जाती हैं और तेज हवा में एक तरफ उड़ जाती हैं, इसलिए तेज हवा में सिंचाई टाल दें।
पांचवां स्टेप है पहली दो-तीन सिंचाई की निगरानी। खेत के कोनों में मिट्टी खोदकर नमी की गहराई देखें। नीचे सूखा है तो समय बढ़ाएं, पानी खड़ा है तो घटाएं।
लागत और अनुदान की सच्चाई, बिना बढ़ा-चढ़ाकर
फव्वारा सिस्टम की लागत खेत के आकार, पाइप की लंबाई और स्प्रिंकलर के प्रकार से तय होती है, इसलिए कोई एक कीमत सब पर लागू नहीं होती। खरीदने से पहले दो-तीन दुकानों से अनुमान लें और पाइप, फिटिंग व मरम्मत का खर्च भी जोड़ें।
अनुदान के बारे में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई पर सहायता का प्रावधान है। उत्तर प्रदेश के उद्यान विभाग के प्रदर्शन कार्यक्रम में बताया गया था कि ड्रिप और मिनी व माइक्रो स्प्रिंकलर की स्थापना पर 90 प्रतिशत तक और रेनगन व पोर्टेबल स्प्रिंकलर की स्थापना पर 75 प्रतिशत तक अनुदान देय है। नियम जिले के अनुसार बदल सकते हैं, इसलिए आवेदन से पहले जिला उद्यान अधिकारी से वर्तमान नियम लिखित में पूछ लें।
वह गलतियां जो फायदा मिटा देती हैं
सबसे आम गलती है तेज हवा और दोपहर की धूप में सिंचाई करना। दूसरी गलती है एक जगह बहुत देर तक चलाना। तीसरी है नोजल की सफाई भूलना, जिससे रेत फंसकर धार टेढ़ी कर देती है।
हर मौसम में एक ही सेटिंग पर चलाना भी गलती है। सर्दी में जरूरत कम और गर्मी में ज्यादा होती है, और कटाई के करीब सिंचाई घटानी होती है। नाली समतल खेत में ठीक है, ड्रिप पानी की कमी में पर महंगा है, फव्वारा इनके बीच का रास्ता है।
मुख्य बातें
- प्रयोगों में 32 प्रतिशत तक पानी की बचत दर्ज हुई है, पर दबाव, ओवरलैप और समय सही होना चाहिए।
- छोटे खेत में पोर्टेबल स्प्रिंकलर और बड़े खेत में रेनगन आमतौर पर सही रहता है, पर चुनाव पंप की क्षमता और मिट्टी देखकर करें।
- अनुदान के वर्तमान नियम आवेदन से पहले जिला उद्यान या गन्ना विभाग से लिखित में जरूर जांच लें।
स्रोत: वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट, पुणे; उत्तर प्रदेश उद्यान विभाग प्रदर्शन कार्यक्रम।
