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गन्ने का बीमा सिर्फ 5% प्रीमियम पर: 72 घंटे में क्लेम का पूरा तरीका

✍️ GannaUP डेस्क · 🗓 29 Oct 2026 · ⏱ 5 मिनट में पढ़ें

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गन्ने का बीमा सिर्फ 5% प्रीमियम पर: 72 घंटे में क्लेम का पूरा तरीका

सितंबर की एक रात तेज बारिश के साथ ओले गिरे। सुबह खेत पहुंचे किसान ने देखा कि गन्ने की पत्तियां फटी हुई हैं और कई जगह पौधे जमीन से लग गए हैं। फसल तो नुकसान में थी ही, मन में दूसरा डर भी था। अगली फसल की बुवाई के लिए बीज और खाद का पैसा कहां से आएगा, और बैंक की किस्त का क्या होगा। यही वह मोड़ है जहां फसल बीमा काम आता है। बीमा गिरी हुई फसल को वापस खड़ा नहीं करता, लेकिन नुकसान की भरपाई का एक रास्ता खोल देता है। गन्ने के किसान के लिए वह रास्ता प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना है।

गन्ने पर बीमा होता कैसे है

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना केंद्र सरकार की योजना है जो 2016 से चल रही है। इसमें सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात जैसे प्राकृतिक आपदाओं और कीट रोग से हुए नुकसान पर मुआवजा मिलता है। गन्ना इसमें वार्षिक वाणिज्यिक फसल की श्रेणी में रखा गया है। यही वजह है कि इसके प्रीमियम का हिसाब खरीफ की धान या रबी के गेहूं से अलग है।

बीमा राशि राज्य सरकार की अधिसूचना से तय होती है और आवेदन करते समय पोर्टल पर ही पता चल जाता है कि जिले और क्षेत्रफल के हिसाब से कितनी राशि का बीमा होगा।

किसान की जेब से सिर्फ 5 प्रतिशत

योजना की सबसे बड़ी राहत प्रीमियम में है। गन्ने जैसे वार्षिक वाणिज्यिक फसल के लिए किसान को बीमा राशि का अधिकतम 5 प्रतिशत ही देना होता है, बाकी केंद्र और राज्य सरकार भरती हैं।

हिसाब सीधा है। अगर किसी किसान की बीमा राशि 50,000 रुपये बनती है तो उसका प्रीमियम 2,500 रुपये से ज्यादा नहीं होगा। खरीफ की खाद्यान्न फसलों में यह दर 2 प्रतिशत और रबी में 1.5 प्रतिशत है, लेकिन गन्ने पर 5 प्रतिशत की दर लागू होती है। पैसा देने से पहले pmfby.gov.in के प्रीमियम कैलकुलेटर से अपने जिले और क्षेत्रफल के हिसाब से सही रकम निकाल लें, और बैंक या सीएससी पर मांगी गई रकम से उसका मिलान कर लें।

किन नुकसान पर पैसा मिलता है

बुवाई न हो पाना, बीच सीजन में मौसम की मार, किसी छोटे इलाके में ओले या बाढ़ का नुकसान और कटाई के बाद खेत में पड़ी फसल का नुकसान, ये सब योजना के दायरे में आते हैं। गन्ने के मामले में ध्यान रखने वाली बात यह है कि व्यापक नुकसान का आकलन फसल कटाई प्रयोगों के जरिए इलाके के स्तर पर होता है, जबकि किसी एक खेत पर हुए स्थानीय नुकसान की सूचना किसान को खुद देनी होती है।

एक सीमा भी समझ लें। लापरवाही से हुआ नुकसान बीमा में नहीं आता। खेत की देखभाल न करना या जानबूझकर फसल छोड़ देना, इन पर दावा नहीं मिलता।

कौन करा सकता है

जमीन का मालिक ही नहीं, बटाईदार और किराये पर खेती करने वाला किसान भी पात्र है। शर्त सिर्फ इतनी है कि उसके पास खेती का सबूत हो, जैसे बटाई का समझौता। पहले कर्ज लेने वाले किसानों का बीमा अपने आप हो जाता था, लेकिन अब योजना सभी के लिए स्वैच्छिक है। कर्जदार हो या गैर कर्जदार, आवेदन खुद करना होता है।

कागज पहले से तैयार रखें

दावा अटकने की सबसे आम वजह कागज की गड़बड़ी होती है। आवेदन से पहले आधार कार्ड, बैंक खाते की जानकारी, खसरा या खाता नंबर वाला जमीन का रिकॉर्ड, बुवाई का प्रमाण और चालू मोबाइल नंबर एक जगह रख लें। नाम और ब्योरे में आधार से जरा भी फर्क नहीं होना चाहिए, वरना नाम की स्पेलिंग का अंतर या गलत खसरा नंबर ही बाद में क्लेम रोक देता है।

आवेदन के दो रास्ते

पहला रास्ता ऑनलाइन है। pmfby.gov.in पर फार्मर कॉर्नर में मोबाइल नंबर और ओटीपी से पंजीकरण होता है। इसके बाद जमीन और फसल का ब्योरा भरना होता है, दस्तावेज अपलोड करने होते हैं और प्रीमियम जमा करना होता है। दूसरा रास्ता बैंक या नजदीकी सीएससी केंद्र का है। वहां ऑपरेटर फॉर्म भर देता है, लेकिन दस्तावेज वही लगते हैं।

हर सीजन की आवेदन अंतिम तारीख अलग होती है और राज्य की अधिसूचना से तय होती है। तारीख चूकना बीमा से बाहर होने का सबसे सीधा रास्ता है, इसलिए जिस सीजन में बीमा कराना हो, उसकी तारीख पहले ही पोर्टल या कृषि विभाग से पता कर लें।

नुकसान हो तो 72 घंटे का नियम

यह गाइड की सबसे जरूरी बात है। फसल को नुकसान पहुंचे तो 72 घंटे के अंदर सूचना देनी होती है। सूचना क्रॉप इंश्योरेंस ऐप से दी जा सकती है, जिसमें नुकसान की फोटो के साथ जगह की जानकारी दर्ज होती है। बैंक, बीमा कंपनी या कृषि अधिकारी को भी सूचना दी जा सकती है।

सूचना के बाद बीमा कंपनी सर्वे कराती है और मंजूर होने पर रकम सीधे किसान के आधार से जुड़े बैंक खाते में आती है। देर से सूचना देना क्लेम खारिज होने की सबसे आम वजह है, इसलिए नुकसान दिखते ही फोटो खींचकर ऐप पर रिपोर्ट करें। फोटो में खेत की पहचान साफ दिखनी चाहिए।

क्लेम अटकता क्यों है, इससे बचें

कुछ गलतियां बार बार दोहराई जाती हैं। आधार और आवेदन में नाम का अंतर, बीमा कराई गई फसल और बोई गई फसल का अलग होना, प्रीमियम कटने के बाद रसीद न लेना और नुकसान की देर से सूचना, ये चार बातें ज्यादातर मामलों में क्लेम रोकती हैं। प्रीमियम कटने पर बैंक या सीएससी से लिखित रसीद जरूर लें और पोर्टल पर आवेदन की स्थिति चेक करते रहें।

गन्ने की फसल लंबे समय तक खेत में रहती है, इसलिए मौसम की मार का खतरा भी लंबा रहता है। 5 प्रतिशत प्रीमियम पर मिलने वाला बीमा छोटे खर्च में बड़ी सुरक्षा देता है, बशर्ते कागज सही हों, आवेदन समय पर हो और नुकसान की सूचना 72 घंटे में दी जाए।

मुख्य बातें

  • गन्ने पर किसान को बीमा राशि का अधिकतम 5 प्रतिशत प्रीमियम देना होता है, बाकी केंद्र और राज्य सरकार भरती हैं।
  • नुकसान की सूचना 72 घंटे के अंदर क्रॉप इंश्योरेंस ऐप, बैंक या कृषि अधिकारी को देनी जरूरी है।
  • आधार से मेल खाते कागज, सही फसल ब्योरा और समय पर आवेदन ही क्लेम मिलने की असली गारंटी है।

स्रोत: pmfby.gov.in, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दिशानिर्देश।

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Aamir Raza
लेखक

GannaUP के संस्थापक एवं मुख्य संपादक। UP गन्ना उद्योग, पर्ची प्रणाली, SAP/FRP मूल्य नीति और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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