गन्ने में ड्रिप लगवाने से पहले ये 7 सवाल जरूर पूछो, पैदावार का पूरा हिसाब साफ होगा

सीतापुर के एक गांव में इस सीजन एक किसान ने 3 एकड़ गन्ने में ड्रिप लगवाई। पड़ोसी हंस रहे थे कि पानी वाली फसल में बूंद-बूंद का क्या काम। कटाई पर ट्रॉली का वजन देखकर वही पड़ोसी चुप हो गए। ट्यूबवेल का पानी नीचे जा रहा है, बिजली का बिल बढ़ रहा है और नाली का पानी खेत के आखिरी छोर तक पहुंचते-पहुंचते आधा बर्बाद हो जाता है। ड्रिप कोई फैशन नहीं, उस समस्या का जवाब है जो हर साल बड़ी होती जा रही है।
यूपी गन्ना विभाग के मुताबिक पिछले 9 सालों में 73,078 हेक्टेयर गन्ने में ड्रिप लग चुकी है। अपनाने वालों की पैदावार करीब 25 प्रतिशत बढ़ी और पानी में लगभग 50 प्रतिशत बचत हुई। ड्रिप लगवाने से पहले किसान के मन में जो 7 सवाल आते हैं, उनके जवाब यहां हैं।
सवाल 1: क्या ड्रिप मेरे खेत के लिए सही है?
ट्यूबवेल हो, पानी की दिक्कत रहती हो या खेत में पानी बराबर न पहुंचता हो, तो ड्रिप आपके लिए है। यह सिर्फ बड़े किसानों की तकनीक नहीं है, एक एकड़ में भी लग सकती है। ढलान या असमतल खेत में ड्रिप बाढ़ सिंचाई से बेहतर है, क्योंकि हर कतार में पानी एक जैसा पहुंचता है। क्षारीय जमीन में भी ड्रिप से गन्ने की खेती सफल हुई है।
एक बात साफ समझ लो। ड्रिप कम पानी से ज्यादा फायदा लेने का तरीका है, पानी की कमी का इलाज नहीं। पानी ही न हो तो पहले पानी का इंतजाम करो।
सवाल 2: खर्चा कितना आएगा और सब्सिडी कैसे मिलेगी?
केंद्र की ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना में छोटे और सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत और अन्य किसानों को 45 प्रतिशत अनुदान मिलता है, अधिकतम 5 हेक्टेयर तक। पैसा सीधे बैंक खाते में (DBT से) आता है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यूपी में गन्ना किसानों को गन्ना विभाग के तहत 90 प्रतिशत तक (लघु-सीमांत) और 80 प्रतिशत तक (अन्य किसानों) अनुदान का प्रावधान रहा है। यानी एक लाख रुपये के सिस्टम पर जेब से सिर्फ 10 से 20 हजार रुपये लग सकते हैं।
आवेदन के लिए आधार कार्ड, खतौनी, बैंक पासबुक और फोटो चाहिए। जिले के गन्ना अधिकारी या कृषि विभाग के कार्यालय में आवेदन होता है। ध्यान रखो, एक ही जमीन पर दोबारा अनुदान 7 साल बाद ही मिलता है। ताजा नियम जिले-दर-जिले बदल सकते हैं, इसलिए आवेदन से पहले गन्ना अधिकारी से पूछ लें।
सवाल 3: गन्ने में ड्रिप का सही डिजाइन क्या हो?
गन्ने में सबसे सफल डिजाइन जोड़ीदार कतार (पेयर्ड रो) वाली बुवाई है। गन्ना 120 सेमी × 30 सेमी या 150 सेमी × 30 सेमी की दूरी पर दो-दो कतारों की जोड़ियों में बोया जाता है, हर जोड़ी के बीच एक लेटरल पाइप बिछती है। एक पाइप दो कतारों को पानी देती है, इसलिए लागत आधी रह जाती है।
16 मिमी की इनलाइन ड्रिप पाइप में हर 30 से 40 सेमी पर एमिटर होता है, सामान्य डिस्चार्ज 2 लीटर प्रति घंटा। ट्यूबवेल के पानी में बालू आती है, इसलिए सैंड फिल्टर और स्क्रीन या डिस्क फिल्टर जरूरी है। बिना फिल्टर सिस्टम कुछ महीनों में चोक हो जाता है। खाद का घोल देने के लिए वेंचुरी या 60 से 100 लीटर का फर्टिगेशन टैंक लगता है।
सवाल 4: ड्रिप से खाद कैसे दें? (फर्टिगेशन)
ड्रिप का दूसरा बड़ा फायदा यह है कि खाद भी पानी के साथ सीधे जड़ों तक पहुंचती है। इसे फर्टिगेशन कहते हैं। बाढ़ सिंचाई में खाद का बड़ा हिस्सा बहकर बर्बाद हो जाता है। ड्रिप में खाद वहीं जाती है जहां जड़ें हैं, इसलिए 25 से 30 प्रतिशत तक खाद बचती है।
ड्रिप में सिर्फ पूरी तरह घुलने वाली खाद डालें। यूरिया आसानी से घुल जाता है। डीएपी या पोटाश का घोल पहले बाल्टी में घोलकर देख लें। तली में दाना बैठे तो वह खाद ठीक नहीं है, एमिटर बंद हो जाएंगे। घोल हमेशा सिंचाई के बीच वाले हिस्से में दें। पहले साफ पानी, फिर खाद वाला पानी, आखिर में फिर साफ पानी।
सवाल 5: मेंटेनेंस में क्या-क्या करना पड़ता है?
ड्रिप लगवाकर भूलना सबसे बड़ी गलती है। हफ्ते में एक बार फिल्टर साफ करो, महीने में एक बार लेटरल के आखिरी सिरे खोलकर पानी बहा दो। इसमें 10 मिनट से ज्यादा नहीं लगते।
चूहों से बचाने के लिए पाइप को हल्की मिट्टी से ढक दें। ट्रैक्टर लेटरल के ऊपर से न गुजरे। सीजन खत्म होने पर सिस्टम धोकर रख दें। सही देखभाल पर ड्रिप 8 से 10 साल चलता है।
सवाल 6: वो गलतियां जो ड्रिप बर्बाद कर देती हैं
पहली गलती। सस्ते के चक्कर में बिना BIS मार्क वाली पाइप लगवा लेना। सब्सिडी भी BIS मार्क वाले सामान पर ही मिलती है और हल्की पाइप 2 साल में फटने लगती है। दूसरी गलती। फिल्टर न लगवाना या उसकी सफाई न करना। ट्यूबवेल के पानी की रेत एमिटर बंद कर देती है। तीसरी गलती। गलत डिजाइन। बुवाई और लेटरल की दूरी में तालमेल न हो तो आधी कतारों को पानी नहीं मिलेगा। चौथी गलती। ड्रिप में अघुलनशील खाद डाल देना।
सवाल 7: ड्रिप से पैदावार सच में बढ़ती है?
गन्ना विभाग के आंकड़े कहते हैं कि यूपी में ड्रिप अपनाने वालों की पैदावार करीब 25 प्रतिशत बढ़ी है। बाढ़ सिंचाई में 15-20 दिन में एक बार भारी पानी मिलता है। जड़ें एक बार डूबती हैं, फिर हफ्तों सूखी रहती हैं। ड्रिप में हर 2-3 दिन में थोड़ा-थोड़ा पानी मिलता रहता है, नमी एक जैसी बनी रहती है, कल्ले ज्यादा फूटते हैं, गन्ना मोटा होता है।
लेकिन एक ईमानदार बात भी सुन लो। ड्रिप जादू की छड़ी नहीं है। बीज खराब हो, खाद समय पर न दी गई हो या खेत में पानी भरा रहता हो, तो ड्रिप अकेले पैदावार नहीं बढ़ाएगी। ड्रिप पानी और खाद की बर्बादी रोकती है। बाकी मेहनत वही पुरानी चाहिए।
मुख्य बातें
- यूपी में 73,078 हेक्टेयर गन्ने में ड्रिप लग चुकी है; अपनाने वालों को करीब 25% ज्यादा पैदावार और 50% पानी की बचत मिली है।
- केंद्र की योजना में 55% (छोटे-सीमांत) और 45% (अन्य) अनुदान मिलता है; यूपी में गन्ना किसानों को 90% तक का अनुदान मिल चुका है।
- जोड़ीदार कतार (120×30 या 150×30 सेमी) + 16 मिमी लेटरल + फिल्टर ही गन्ने का सही डिजाइन है; बिना फिल्टर ड्रिप कुछ महीनों में चोक हो जाती है।
स्रोत: उत्तर प्रदेश गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग के आंकड़े; प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पर ड्रॉप मोर क्रॉप) के आधिकारिक प्रावधान; ईटीवी भारत और चीनीमंडी में छपे गन्ना आयुक्त के बयान।
