गन्ने में ड्रिप पर 90% तक अनुदान: आवेदन से इंस्टॉलेशन तक पूरा तरीका

मई-जून की गर्मी में गन्ने के खेत को पानी देना मतलब ट्यूबवेल रात-रात भर चलाना। बिजली का मीटर घूमता रहता है, और भूजल लगातार नीचे जा रहा है।
यहीं पर ड्रिप सिंचाई काम की चीज़ बनती है। और अच्छी खबर यह है कि उत्तर प्रदेश में ड्रिप पर सरकार 80 से 90 प्रतिशत तक अनुदान दे रही है। यानी लघु और सीमांत किसान को लागत का सिर्फ करीब दसवां हिस्सा ही अपनी जेब से लगाना पड़ता है। यह अनुदान प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” घटक के तहत उद्यान विभाग के माध्यम से मिलता है, और अब तक प्रदेश के करीब 82 हजार किसान इसका लाभ ले चुके हैं।
अनुदान किसे कितना मिलेगा
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार ड्रिप, मिनी और माइक्रो स्प्रिंकलर पर लघु एवं सीमांत किसानों को लागत का 90 प्रतिशत और बाकी किसानों को 80 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। पोर्टेबल, सेमी-परमानेंट और रेनगन स्प्रिंकलर पर लघु-सीमांत किसानों को 75 प्रतिशत और अन्य किसानों को 65 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान है। यानी ज्यादातर गन्ना किसान अगर ड्रिप लगवाते हैं, तो उन्हें सबसे ऊंची दर वाली श्रेणी का फायदा मिलता है।
एक बात साफ रखिए: अनुदान निर्धारित मानदंड लागत पर प्रतिशत के हिसाब से मिलता है, खेत के आकार और सिस्टम की किस्म के अनुसार। गणित फिर भी किसान के पक्ष में है, क्योंकि अपने हिस्से की रकम बचत के रूप में वापस मिल जाती है।
ड्रिप में गन्ना किसान को क्या फायदा
गन्ना पानी का बहुत ज्यादा प्यासा फसल है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बुवाई से कटाई तक गन्ने को 1800 से 2200 मिमी पानी की जरूरत होती है, जिसमें से करीब 1000 मिमी वर्षा से मिल जाता है। बाकी पानी किसान को ट्यूबवेल से देना पड़ता है।
ड्रिप में पानी बूंद-बूंद करके सीधे जड़ों तक पहुंचता है। इससे खेत में बहने वाला पानी बर्बाद नहीं होता। उद्यान राज्यमंत्री के हवाले से आई रिपोर्टों के अनुसार इस पद्धति से 40 से 50 प्रतिशत तक जल बचत होती है। ट्यूबवेल कम समय चलता है, तो बिजली या डीजल का खर्च भी घटता है।
दूसरा बड़ा फायदा फर्टिगेशन का है। ड्रिप लाइन के जरिए यूरिया या तरल खाद को पानी के साथ सीधे जड़ों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे खाद की बर्बादी कम होती है और पौधे को जरूरत के हिसाब से पोषण मिलता है। गन्ने में यह अंतर उपज में साफ दिखता है, क्योंकि खाद जमीन पर बिखेरने से बड़ी मात्रा वाष्प बनकर या पानी के साथ बहकर बर्बाद हो जाती है।
पात्रता और शर्तें क्या हैं
योजना का लाभ लेने के लिए किसान के पास सिंचाई का पानी स्रोत उपलब्ध होना जरूरी है। यह स्रोत ट्यूबवेल, कुआं या कोई अन्य स्वीकृत साधन हो सकता है।
खास बात यह है कि अपने नाम की जमीन के अलावा संविदा खेती या कम से कम सात वर्ष के लीज एग्रीमेंट वाली भूमि पर भी यह सुविधा उपलब्ध है। यानी बटाईदार या पट्टेदार किसान भी आवेदन कर सकते हैं, बशर्ते उनके पास वैध लीज दस्तावेज हों।
सिस्टम में लगने वाले सभी कंपोनेंट बीआईएस मार्क वाले होने चाहिए। यह शर्त गुणवत्ता के लिए है। मान्यता प्राप्त वेंडर से ही सिस्टम लगवाएं, वरना अनुदान में अटक सकती है।
आवेदन का पूरा तरीका
आवेदन ऑनलाइन होता है। किसान www.upmip.in या www.uphorticulture.gov.in पोर्टल पर आवेदन कर सकते हैं। प्रक्रिया मोटे तौर पर इस तरह चलती है:
सबसे पहले पोर्टल पर पंजीकरण करके अपनी जानकारी भरिए। आधार कार्ड, खतौनी या लीज दस्तावेज, बैंक पासबुक और पासपोर्ट साइज फोटो पहले से तैयार रखिए। खाता आधार से जुड़ा होना जरूरी है, क्योंकि अनुदान सीधे बैंक खाते में डीबीटी के जरिए आता है।
आवेदन के बाद विभाग की ओर से खेत का सत्यापन होता है। अनुमति मिलने पर मान्यता प्राप्त वेंडर से ड्रिप सिस्टम लगवाई जाती है। इंस्टॉलेशन के बाद विभागीय निरीक्षण होता है और फिर अनुदान की राशि किसान के खाते में भेज दी जाती है।
एक सलाह: आवेदन करने से पहले अपने जिले के उद्यान अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र से बात जरूर कर लें। हर जिले में लक्ष्य और कतार की स्थिति अलग होती है, और वे आपको बता देंगे कि आपके क्षेत्र में अभी आवेदन खुला है या नहीं।
ड्रिप लगवाते समय ध्यान रखने वाली बातें
सबसे पहली बात, वेंडर की सूची विभाग से ले लें। बाजार में सस्ता सिस्टम लगाने वाले कई मिल जाएंगे, लेकिन अनुदान सिर्फ मान्यता प्राप्त विक्रेताओं के माध्यम से मिलता है।
दूसरी बात, ड्रिप की मेंटेनेंस ड्रिप की जान है। फिल्टर नियमित साफ करना, लाइनों में हवा न फंसने देना और सीजन खत्म होने पर सिस्टम को फ्लश करना, यह तीन काम अगर ठीक से हो जाएं तो सिस्टम वर्षों चलता है। कई किसान लगवाने के बाद देखरेख छोड़ देते हैं और फिर कहते हैं कि ड्रिप बेकार है। असल में गड़बड़ देखरेख में होती है, तकनीक में नहीं।
तीसरी बात, पानी की गुणवत्ता। अगर आपके पानी में बालू या चिकनी मिट्टी ज्यादा है, तो फिल्टर का काम और बढ़ जाता है। वेंडर से पूछिए कि आपके पानी के हिसाब से कौन सा फिल्टर ठीक रहेगा।
गन्ने की पेड़ी में भी काम की है
गन्ने की पेड़ी (रटून) में ड्रिप और भी कारगर होती है। पेड़ी में जड़ें पहले से विकसित होती हैं और पानी बूंद-बूंद में मिलने पर थूंठ जल्दी फूटते हैं। यही वजह है कि जो किसान एक बार ड्रिप अपना लेते हैं, वे आमतौर पर उसे छोड़ते नहीं।
मुख्य बातें
- उत्तर प्रदेश में ड्रिप, मिनी और माइक्रो स्प्रिंकलर पर लघु-सीमांत किसानों को 90 प्रतिशत और अन्य किसानों को 80 प्रतिशत तक अनुदान मिल रहा है।
- आवेदन www.upmip.in या www.uphorticulture.gov.in पर होता है; आधार, खतौनी/लीज दस्तावेज और आधार-लिंक्ड बैंक खाता जरूरी है।
- ड्रिप से 40-50 प्रतिशत जल बचत का दावा है, ट्यूबवेल कम चलता है और फर्टिगेशन से खाद की बर्बादी घटती है।
स्रोत: दैनिक जागरण (उत्तर प्रदेश संस्करण), कृषि जागरण हिंदी, आईएएनएस/न्यू केरला — प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पर ड्रॉप मोर क्रॉप) संबंधी रिपोर्टें।
