फरवरी-मार्च में गन्ना बुवाई: 90 सेमी दूरी और 180 किलो नाइट्रोजन का सही हिसाब

अक्टूबर खत्म होने को है। मिलों के पेराई सत्र का शोर बढ़ रहा है और किसान की नजरें ट्रॉली और पर्ची पर टिकी हैं। लेकिन इसी भीड़ के बीच कुछ किसान चुपचाप फरवरी की योजना बना रहे हैं। वे जानते हैं कि बसंतकालीन गन्ने की उपज का आधा फैसला बुवाई से तीन महीने पहले होता है। अक्टूबर से जनवरी तक का समय उसी तैयारी का है।
बसंतकालीन बुवाई का मतलब है फरवरी-मार्च में गन्ना बोना। यूपी में यह सबसे पुराना और भरोसेमंद तरीका है। गन्ना 12 महीने की फसल है, इसलिए फरवरी में बोया गया गन्ना अगले पेराई सत्र तक पककर तैयार हो जाता है। कृषि विज्ञानियों की सलाह साफ है: बसंत बुवाई में पंक्ति से पंक्ति 90 सेंटीमीटर की दूरी रखें और प्रति हेक्टेयर 180 किलो नाइट्रोजन का हिसाब लगाएं। बाकी पूरी गणना इस गाइड में है।
अक्टूबर-जनवरी: खेत को बुवाई के लिए तैयार करें
सबसे बड़ी गलती बुवाई से दो हफ्ते पहले खेत में उतरना है। गन्ने की 80 प्रतिशत जड़ें 60 सेंटीमीटर तक गहराई में जाती हैं, इसलिए कम से कम 30 सेंटीमीटर गहरी जुताई जरूरी है। अक्टूबर-नवंबर में खेत खाली होते ही डिस्क या मोल्डबोर्ड हल से गहरी जुताई कर दें। दिसंबर-जनवरी में 2-3 बार कल्टीवेटर चलाकर खेत समतल करें।
गोबर की खाद या वर्मी-कम्पोस्ट 20-25 टन प्रति हेक्टेयर की दर से जुताई के समय मिला दें। मिट्टी का पीएच 6.5 से 7.5 के बीच सबसे अच्छा रहता है। अगर पिछले साल फसल कमजोर रही थी तो नवंबर-दिसंबर में मिट्टी परीक्षण करा लेना समझदारी है, ताकि बुवाई से पहले खेत की कमी पता चल जाए।
बीज: अक्टूबर में ही बुकिंग की सोचें
बसंतकालीन बुवाई का बीज कहां से आएगा, यह सवाल अक्टूबर में पूछना चाहिए, फरवरी में नहीं। 8-10 महीने पुराना, रोग-मुक्त और मोटा गन्ना ही बीज के लिए चुनें। किस्म हमेशा अपने क्षेत्र के लिए स्वीकृत सूची से लें। जिला गन्ना अधिकारी या गन्ना समिति से पूछकर ही किस्म तय करें।
को-20016 (करन-20) किस्म को एआईसीआरपी समिति ने को-0238 के विकल्प के तौर पर चुना है, लेकिन केंद्रीय किस्म रिलीज समिति की मंजूरी अभी प्रक्रिया में है।
बीज उपचार बुवाई की सबसे सस्ती बीमा पॉलिसी है। 100 लीटर पानी में 2 ग्राम बाविस्टिन (कार्बेन्डाजिम) घोलकर दो-तीन आंख वाले पैड़ों को 15 मिनट तक भिगोएं। जो किसान रासायनिक उपचार नहीं चाहते, वे एजोटोबैक्टर और पीएसबी जैसे जैव उर्वरकों के घोल में पैड़ों को 30 मिनट भिगो सकते हैं।
बुवाई का सही तरीका और दूरी
बसंत बुवाई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सेंटीमीटर रखें। आईआईएसआर की सिफारिश के मुताबिक प्रति हेक्टेयर लगभग 35 हजार तीन-आंख वाले पैड़े पर्याप्त हैं। बुवाई मार्च के बाद खिसके तो दूरी घटाकर 60 सेंटीमीटर कर दें। संशोधित ट्रेंच विधि में 120 सेंटीमीटर चौड़े ट्रेंच बनाएं और हर 30 सेंटीमीटर पर दो आंख का पैड़ा रखें। पैड़ों को कूड़ में 4-5 सेंटीमीटर गहराई पर रखकर ऊपर हल्की मिट्टी डालें। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी हो, लेकिन पानी खड़ा न रहे।
खाद का हिसाब: 180 किलो नाइट्रोजन कहां-कब
बसंत बुवाई वाले गन्ने के लिए कृषि विज्ञानियों की सिफारिश है: प्रति हेक्टेयर 180 किलो नाइट्रोजन। इसे एक बार में डालना पैसे की बर्बादी है। सही तरीका यह है: कुल नाइट्रोजन का एक-तिहाई हिस्सा, साथ में 60-80 किलो फास्फोरस और 40-60 किलो पोटाश, बुवाई से पहले कूड़ों में डाल दें। फास्फोरस और पोटाश की मात्रा मिट्टी परीक्षण के अनुसार तय करें।
नाइट्रोजन के बचे हुए दो-तिहाई हिस्से को दो बराबर किस्तों में जून से पहले डाल दें। जिंक की कमी वाले खेतों में जिंक सल्फेट भी डालें।
सिंचाई: क्षेत्र के हिसाब से गिनती अलग
पूरे यूपी के लिए एक जैसा सिंचाई का कैलेंडर नहीं चलता। कृषि सलाह के अनुसार पूर्वी यूपी में 4-5, मध्य यूपी में 5-6 और पश्चिमी यूपी में 7-8 सिंचाई पर्याप्त मानी गई है। बुवाई के बाद अंकुरण के समय खेत में नमी बनी रहे, लेकिन जलभराव न हो। कल्ले निकलने के समय हर 10 दिन पर और बढ़वार के समय हर हफ्ते सिंचाई का नियम कई क्षेत्रों में अपनाया जाता है।
गर्मियों में हर सिंचाई के बाद गुड़ाई करें। इससे जड़ों को हवा मिलती है और खरपतवार भी दबता है। जून के आखिर में थानों की जड़ पर हल्की मिट्टी चढ़ाएं और जुलाई में अंतिम बार पर्याप्त मिट्टी चढ़ा दें।
बंधाई और कटाई का समय
गन्ना जब लगभग 150 सेंटीमीटर ऊंचा हो जाए, आमतौर पर जुलाई के आखिर में, तब पहली बंधाई करें। पहली बंधाई से करीब 50 सेंटीमीटर ऊपर अगस्त में दूसरी बंधाई करें। अगस्त-सितंबर में दो पंक्तियों के तीन थानों को एक साथ बांधने वाली कैंची बंधाई भी कर सकते हैं। बंधाई न करने पर गन्ना गिरता है, चीनी घटती है और कटाई में दिक्कत आती है।
कटाई बुवाई के समय और किस्म की परिपक्वता के हिसाब से नवंबर से अप्रैल के बीच करें। मिल का सट्टा और पर्ची का कैलेंडर ध्यान में रखें, ताकि कटा गन्ना खेत में सूखे नहीं।
गेहूं वाले किसानों के लिए खास सलाह
पश्चिमी यूपी में लाखों किसान गेहूं काटकर अप्रैल-मई में गन्ना बोते हैं। इसमें कल्ले निकलने का समय घट जाता है और उपज प्रभावित होती है। लखनऊ के भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के प्रयोगों में इसका एक रास्ता निकला: खड़े गेहूं में ही फरवरी के आखिरी हफ्ते से मार्च के पहले हफ्ते में गन्ने के पैड़े लगा दें। गेहूं की कटाई अप्रैल में हो जाती है और तब तक गन्ने की पौध खड़ी हो चुकी होती है। इस तरीके से बसंत बुवाई का फायदा गेहूं की फसल गंवाए बिना मिलता है।
मुख्य बातें
- बसंत बुवाई फरवरी-मार्च में करें, पंक्ति दूरी 90 सेंटीमीटर रखें और प्रति हेक्टेयर 180 किलो नाइट्रोजन का हिसाब तीन किस्तों में लगाएं।
- बीज 8-10 माह पुराना, रोग-मुक्त और क्षेत्र-स्वीकृत किस्म का हो; बुवाई से पहले बीज उपचार जरूर करें।
- सिंचाई क्षेत्र के हिसाब से करें, मिट्टी चढ़ाना जून-जुलाई में और बंधाई समय पर करें।
स्रोत: कृषि जागरण (गन्ना खेती वैज्ञानिक मार्गदर्शिका), भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ (आईआईएसआर) / एआईसीआरपी सिफारिशें, एग्रीइनसाइट (गन्ना किस्म संबंधी रिपोर्ट)।
