₹400 के भाव में हाथ क्या आएगा: पेराई से पहले गन्ना आय का पूरा गणित

छह साल में उत्तर प्रदेश का चीनी उत्पादन 126.37 लाख टन से घटकर 89.52 लाख टन रह गया है। करीब 29 फीसदी की यह गिरावट किसी सूखे या बाढ़ की देन नहीं है। वजह है गन्ने की सबसे भरोसेमंद किस्म को.0238 पर लगा लाल सड़न रोग। अब सवाल सिर्फ चीनी मिलों का नहीं है। उपज घटी तो सीधा असर किसान की जेब पर पड़ा है। पेराई सत्र 2026-27 दरवाजे पर है, लेकिन नए सीजन का भाव अभी तय नहीं हुआ। ऐसे में समझना जरूरी है कि ₹400 के मौजूदा भाव में किसान की कुल आमदनी का गणित क्या बनता है और बचत कहां से बढ़ सकती है।
2025-26 का भाव: ₹400, ₹390 और ₹355
उत्तर प्रदेश सरकार ने पेराई सत्र 2025-26 के लिए गन्ने का राज्य परामर्शी मूल्य (एसएपी) अगेती प्रजाति पर ₹400 प्रति क्विंटल तय किया था। सामान्य प्रजाति का भाव ₹390 और अनुपयुक्त प्रजाति का ₹355 प्रति क्विंटल रखा गया था। यानी जिस किसान का गन्ना अगेती किस्म का था, उसे हर क्विंटल पर ₹400 मिले।
अब नजर 2026-27 पर है। 9 अक्टूबर को हुई कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गन्ने का नया भाव घोषित नहीं किया। बैठक में बताया गया कि पिछले नौ वर्षों में प्रदेश के करीब 48 लाख गन्ना किसान परिवारों को ₹3.30 लाख करोड़ से अधिक का भुगतान किया गया है और राज्य में 122 चीनी मिलें संचालित हैं। लेकिन नए सीजन का एसएपी अब भी लंबित है। किसान संगठनों की मांग पुरानी है। संयुक्त किसान मोर्चा ने 23 अक्टूबर को प्रदेशभर में धरना-प्रदर्शन का आह्वान किया है और गन्ना मूल्य ₹600 प्रति क्विंटल करने की मांग रखी है। 7 अक्टूबर को लखनऊ में गन्ना आयुक्त कार्यालय की बैठक में भी सहकारी गन्ना विकास समिति बलरामपुर के अध्यक्ष रणवीर सिंह रन्नू ने ₹600 प्रति क्विंटल की मांग पुरजोर तरीके से उठाई थी।
आंकड़ों से बनता हिसाब: एक हेक्टेयर में कितनी कुल आमदनी
बचत का सवाल उपज से शुरू होता है। शाहजहांपुर गन्ना शोध परिषद के परीक्षणों में नई अगेती किस्म को.शा.23232 की औसत उपज 95.56 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज हुई, यानी 955.6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। अगर यह गन्ना अगेती के ₹400 वाले भाव पर बिके तो एक हेक्टेयर से कुल आमदनी ₹3,82,240 बनती है। सामान्य प्रजाति के ₹390 भाव पर यही आंकड़ा ₹3,72,684 का होता है।
अब लाल सड़न का असर इसी गणित में देखिए। अगर रोग की वजह से उपज सिर्फ 20 फीसदी भी घट जाए, तो 955.6 क्विंटल घटकर 764 क्विंटल रह जाएगा। ₹400 के भाव पर यह करीब ₹76,000 प्रति हेक्टेयर का सीधा नुकसान है। छह साल में चीनी उत्पादन में आई 29 फीसदी की गिरावट और चीनी रिकवरी का 11.73 से घटकर 10.83 फीसदी पर आना बताता है कि यह नुकसान कागज पर नहीं, खेतों में हो रहा है। ध्यान रहे, यह हिसाब कुल आमदनी का है। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, छिलाई और ढुलाई का खर्च इसके ऊपर से निकलता है, तब जाकर बचत बचती है।
नई किस्में: उपज बढ़े तो आमदनी बढ़े
लागत तो हर साल बढ़ती है, लेकिन आमदनी बढ़ाने का एक रास्ता उपज बढ़ाना है। सितंबर के आखिरी हफ्ते में गन्ना आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति ने चार नई किस्मों को खेती की मंजूरी दी, जिनमें से तीन शाहजहांपुर और एक लखनऊ के शोध केंद्र की है। केंद्र की 8 किस्मों को मिलाकर अब किसानों के पास 12 नए विकल्प हैं।
को.शा.23232 की औसत उपज को.0238 से 9.44 फीसदी ज्यादा पाई गई और यह लाल सड़न के प्रति रोगरोधी है। लखनऊ संस्थान की को.लख.21201 में चीनी की मात्रा (पोल प्रतिशत) 13.94 पाई गई, जबकि को.0238 में यह 13.71 थी। दो मध्यकालीन किस्मों में को.शा.19235 ने 87.58 टन प्रति हेक्टेयर की उपज दी, जो मानक किस्म से 21.01 फीसदी ज्यादा है। को.शा.18232 की 92.38 टन प्रति हेक्टेयर उपज मानक से 26.51 फीसदी अधिक रही। पश्चिमी यूपी के लिए जनवरी 2026 में रिलीज हुई को.18022 (कर्ण-18) भी लाल सड़न प्रतिरोधी है और सूखे तथा खारे पानी को सहन करती है।
अभी किसान क्या करें
पहला, बीज का चुनाव बदलें। जिस खेत में को.0238 पर लाल सड़न लगा है, वहां से न तो पेड़ी लें और न ही बीज। रोगी बीज नई फसल को जन्म से बीमार करता है। दूसरा, शरदकालीन बुवाई का यह समय नई किस्मों को अपनाने का सही मौका है। बीज गन्ना समितियों और शोध केंद्रों से बुकिंग के जरिए लें। तीसरा, मिल की पर्ची और कैलेंडर पर नजर रखें ताकि गन्ना समय पर तुले और घटतौली से बचा जा सके। भाव की घोषणा पर नजर बनी रहे, लेकिन खेत का गणित अपने हाथ में रखना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
मुख्य बातें
- 2025-26 का SAP अगेती पर ₹400/क्विंटल था; 2026-27 का भाव अभी घोषित नहीं हुआ, किसान संगठन ₹600 की मांग कर रहे हैं।
- 6 साल में UP का चीनी उत्पादन 126.37 से घटकर 89.52 लाख टन हुआ; लाल सड़न से उपज घटी तो किसान की कुल आमदनी सीधे घटी।
- 12 नई लाल-सड़न-प्रतिरोधी किस्मों को मंजूरी मिली है; को.शा.23232 की उपज को.0238 से 9.44 फीसदी ज्यादा दर्ज हुई।
स्रोत: गांव जंक्शन (9 अक्टूबर 2026), इंडियन एक्सप्रेस (28 सितंबर 2026), दैनिक जागरण और कृषक जगत (अक्टूबर 2026 की रिपोर्टें)।
