6 पुरानी गन्ना किस्में 2 साल में बंद! जानें नई 4 किस्मों के नाम

गन्ना बोने से पहले बीज चुनना इस बार पहले जैसा आसान नहीं रहा। उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर ने राज्य की 6 पुरानी गन्ना किस्मों को खेती के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया है। इनकी बुवाई धीरे-धीरे रोकी जाएगी और अगले दो वर्षों में इन्हें चरणबद्ध तरीके से खेती से बाहर किया जाएगा। अगर आपके खेत में इनमें से कोई किस्म लगी है, तो आने वाले सीजन में बीज बदलने की तैयारी अभी से शुरू करनी होगी।
कौन सी 6 किस्में बंद हो रही हैं
अनुपयुक्त घोषित की गई किस्में ये हैं: को.शा.95255, को.शा.97264, को.शा.96275, को.शा.97261, को.शा.96436 और को.शा.98231। ये वे किस्में हैं जिनका प्रजनन बीज कोयंबटूर से लेकर शाहजहांपुर केंद्र में विकसित किया गया था। कभी ये प्रदेश के खेतों में खूब बोई जाती थीं, लेकिन अब शोध परिषद का कहना है कि वर्तमान समय के हिसाब से ये नई उन्नत किस्मों के आगे कमजोर पड़ गई हैं।
यह फैसला अचानक नहीं आया है। उत्तर प्रदेश बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की 29 सितंबर को गन्ना आयुक्त की अध्यक्षता में हुई बैठक में इन पुरानी किस्मों को हटाने का निर्णय लिया गया था। इसी बैठक में चार नई किस्मों को मंजूरी भी मिली, जो पुरानी किस्मों की जगह लेंगी।
हटाने की वजह क्या है
शोध परिषद के अनुसार इन छह किस्मों में अब दो दिक्कतें साफ दिख रही हैं। पहली, इनकी उपज नई किस्मों के मुकाबले कम रह गई है। दूसरी, इनसे मिलने वाली चीनी की रिकवरी यानी चीनी परता भी कमजोर पड़ा है। किसान के लिए इसका सीधा मतलब है कि उतनी ही मेहनत और उतने ही खर्च में खेत से कम गन्ना और मिल से कम भुगतान।
यहां एक बात समझना जरूरी है। चीनी मिलें भी उन्हीं किस्मों को प्राथमिकता देती हैं जिनसे ज्यादा चीनी निकलती है, क्योंकि मिल का मुनाफा उसी से तय होता है। जब किस्म की रिकवरी गिरती है, तो भुगतान की रफ्तार पर भी असर पड़ता है। इसलिए शोध परिषद ने किसानों से अपील की है कि इन किस्मों की बुवाई धीरे-धीरे कम करते जाएं।
जगह कौन सी किस्में लेंगी
पुरानी किस्मों की जगह चार नई उन्नत किस्मों को मंजूरी दी गई है। इनमें शाहजहांपुर परिषद की तीन किस्में, को.शा.23232, को.शा.19235 और को.शा.18232, तथा भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ की विकसित को.लख.21201 शामिल हैं। इनमें दो अगेती और दो मध्य-देर से पकने वाली किस्में हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा को.शा.23232 की है। यह अगेती किस्म है और रिपोर्टों के अनुसार इसकी औसत उपज 85 से 95 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज हुई है, जो मानक किस्म को.0238 से 9.44 प्रतिशत अधिक है। नवंबर, जनवरी और मार्च में इसकी शर्करा मात्रा भी को.0238 से ज्यादा मिली। पेड़ी की उपज 80.57 टन प्रति हेक्टेयर रही, जो को.0238 से 3.16 प्रतिशत ज्यादा है। सबसे बड़ी खूबी यह कि यह किस्म लाल सड़न रोग के प्रति प्रतिरोधी है, वही बीमारी जिसने को.0238 को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया।
मध्य-देर से पकने वाली को.शा.18232 की औसत उपज 92.38 टन प्रति हेक्टेयर तक मिली है। वहीं को.लख.21201 की औसत उपज 86.57 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज हुई, जिसमें पोल इन केन 13.94 प्रतिशत पाया गया, जबकि को.0238 में यह 13.71 प्रतिशत था। इसमें लाल सड़न के प्रति उच्च प्रतिरोध क्षमता है और इसे पूरे उत्तर प्रदेश के लिए अनुमोदित किया गया है।
इस सीजन में किसान क्या करें
पहला काम, अपने खेत में लगी किस्म का नाम पक्का करें। कई किसान सालों से एक ही बीज दोहरा रहे हैं और किस्म का नाम तक भूल चुके हैं। अपनी गन्ना समिति या मिल के कृषि विभाग से बीज की पुष्टि कराएं।
दूसरा काम, नई बुवाई के लिए समिति से पहले ही बात कर लें। मंजूर की गई चार नई किस्मों का बीज इस सीजन में सीमित मात्रा में मिलेगा। जो किसान जल्दी संपर्क करेंगे, उन्हें असली बीज मिलने की संभावना ज्यादा रहेगी। बीज लेते वक्त टैग और स्रोत जरूर जांचें, ताकि पुरानी अनुपयुक्त किस्म का बीज नई किस्म के नाम पर न मिले।
तीसरा काम, पूरे खेत का बीज एक बार में न बदलें। शोध परिषद खुद चरणबद्ध बदलाव की बात कह रही है। एक-दो बीघे में नई किस्म लगाकर अपने खेत की मिट्टी और पानी में उसका प्रदर्शन देख लें। पेड़ी की क्षमता नई किस्मों का बड़ा दावा है, इसलिए एक फसल के बाद दूसरी फसल में कितनी पैदावार रहती है, यह देखना समझदारी होगी।
इस फैसले का पर्ची, तौल या भुगतान से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह पूरी तरह बीज और किस्म से जुड़ा तकनीकी फैसला है। लेकिन लंबे समय में बेहतर किस्म का मतलब ज्यादा उपज और समय पर भुगतान की संभावना दोनों है।
मुख्य बातें
- उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद ने 6 पुरानी गन्ना किस्मों को अनुपयुक्त घोषित किया, अगले 2 साल में चरणबद्ध तरीके से बंद होंगी।
- हटाई जा रहीं किस्में: को.शा.95255, को.शा.97264, को.शा.96275, को.शा.97261, को.शा.96436 और को.शा.98231।
- इनकी जगह 4 नई किस्मों को मंजूरी मिली है, जिनमें को.शा.23232 की उपज को.0238 से 9.44 प्रतिशत ज्यादा दर्ज हुई और यह लाल सड़न रोग प्रतिरोधी है।
स्रोत: किसान इंडिया (20 अक्टूबर 2026), दैनिक जागरण (7 अक्टूबर 2026), कृषक जगत (2 अक्टूबर 2026)
