₹365 मिलता है, ₹575 की मांग: गन्ने का कानूनी दाम अब दिल्ली में तय होगा

मेरे खेत का गन्ना जिस भाव पर तुलेगा, वो फैसला कौन करेगा? और उस फैसले की मेज पर किसान की आवाज भी होगी, या सिर्फ अधिकारी और मिल मालिक बैठेंगे? दिल्ली से आई ताजा खबर ने इन्हीं दो सवालों को पूरे देश के गन्ना किसानों के सामने खड़ा कर दिया है।
अखिल भारतीय किसान सभा ने मांग की है कि गन्ने का मूल्य कानूनी रूप से गारंटीकृत हो और वह कम से कम ₹575 प्रति क्विंटल तय किया जाए। साथ ही संगठन ने केंद्र सरकार की बनाई गन्ना समिति के पुनर्गठन की मांग भी उठाई है। संगठन का कहना है कि समिति की मौजूदा संरचना में किसान संगठनों की कोई जगह नहीं है, इसलिए उसका चेहरा फिर से बनाया जाए। (कृषक जगत, 17 अक्टूबर 2026; ग्लोबल एग्रीकल्चर, 16 अक्टूबर 2026)
₹575 बनाम ₹365: असली गणित समझिए
आज की हकीकत यह है कि केंद्र ने पेराई सत्र 2026-27 के लिए गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) ₹365 प्रति क्विंटल तय किया है। यह 10.25 प्रतिशत बेस रिकवरी पर लागू होगा। 2025-26 के ₹355 से इसमें सिर्फ ₹10 की बढ़ोतरी हुई है। (बिज़नेस स्टैंडर्ड; हिंदू बिज़नेस लाइन)
उत्तर प्रदेश में गन्ना एफआरपी से ऊपर राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) पर बिकता है। पेराई सत्र 2025-26 के लिए यूपी का एसएपी ₹400 प्रति क्विंटल (अगेती) और ₹390 प्रति क्विंटल (सामान्य) था। 2026-27 के एसएपी की घोषणा अभी बाकी है। (ट्रैक्टर जंक्शन)
अब ₹575 की मांग को इस गणित से जोड़कर देखिए। मौजूदा यूपी एसएपी ₹400 से ₹575 का फासला करीब ₹175 प्रति क्विंटल का है। यानी मांग असल में यह है कि कानूनी तौर पर मिलने वाले भाव में बड़े बदलाव की गारंटी हो। कर्नाटक के गन्ना उत्पादक संगठन भी पहले ही कम से कम ₹550 प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य मांग चुके हैं। (इकोनॉमिक टाइम्स, 12 अक्टूबर 2026)
समिति में किसान की कुर्सी खाली क्यों
केंद्र सरकार ने यह समिति नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. रमेश चंद की अध्यक्षता में बनाई है। बाकी तीन सदस्य हैं: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि आयुक्त, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के संयुक्त सचिव (चीनी) और उपभोक्ता मामले विभाग के संयुक्त सचिव (विधिक माप विज्ञान)। (इकोनॉमिक टाइम्स, 14 अक्टूबर 2026; किसान तक, 15 अक्टूबर 2026)
लेकिन यहीं पर किसान सभा ने सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया है। सरकारी आदेश के मुताबिक समिति किसानों, मिलों, राज्य सरकारों और विशेषज्ञों से सिर्फ परामर्श करेगी। यानी ये पक्ष समिति के सदस्य नहीं हैं, बस सुने जाएंगे। और रिपोर्ट सौंपने की कोई समयसीमा भी नहीं दी गई है। आदेश में सिर्फ इतना कहा गया है कि सिफारिशें “जितनी जल्दी संभव हो” दी जाएं। पेराई सत्र 1 अक्टूबर से शुरू हो चुका है। (हिंदू बिज़नेस लाइन, 15 अक्टूबर 2026; ग्लोबल एग्रीकल्चर, 16 अक्टूबर 2026)
समिति तब बनी थी जब कर्नाटक और महाराष्ट्र के किसान प्रतिनिधियों की केंद्रीय कृषि मंत्री और उपभोक्ता मामलों के मंत्री से बैठक हुई थी। महाराष्ट्र में 15 अक्टूबर को मिलों ने पेराई शुरू कर दी थी, मगर विरोध के चलते पहले दिन सिर्फ 15 मिलें ही चल पाई थीं। (एशियानेट न्यूज़/एएनआई; किसान इंडिया, 15 अक्टूबर 2026)
किसान सभा के तीन सवाल
समिति की संरचना पर किसान सभा ने तीन आपत्तियां रखी हैं।
पहली आपत्ति: समिति में गन्ना उत्पादक संगठनों, गन्ना उत्पादक राज्यों की सरकारों और स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। संगठन की मांग है कि इन्हें समिति में शामिल किया जाए।
दूसरी आपत्ति: प्रो. रमेश चंद की नियुक्ति पर। संगठन ने कहा है कि उन्होंने पूर्व में तीन कृषि कानूनों का समर्थन किया था, इसलिए किसानों का भरोसा इस समिति पर कम है। (कृषक जगत, 17 अक्टूबर 2026)
तीसरी आपत्ति सबसे गहरी है। समिति के विचारार्थ विषयों में किसानों को मिलने वाले मूल्य को चीनी मिलों की वित्तीय व्यवहार्यता से जोड़ा गया है। किसान सभा का कहना है कि इससे भाव तय करने में मिल मालिकों के हितों को तरजीह मिलने की आशंका है। मूल्य निर्धारण का आधार किसानों की लागत और मेहनत होनी चाहिए। (ग्लोबल एग्रीकल्चर, 16 अक्टूबर 2026)
यूपी के किसान के लिए इसका मतलब
उत्तर प्रदेश इस पूरी बहस के केंद्र में है। प्रदेश के करीब 48 लाख गन्ना किसान परिवारों की आजीविका गन्ने की खेती पर निर्भर है और यहां 122 चीनी मिलें चलती हैं। (अमर उजाला, 17 अक्टूबर 2026)
यूपी में भाव की मांग पहले से तेज है। भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) ने शुक्रवार को बुलंदशहर कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर 2026-27 के लिए एसएपी ₹500 प्रति क्विंटल करने की मांग रखी। वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मांगेराम त्यागी और जिलाध्यक्ष शैलेंद्र आर्य ने प्रदर्शन का नेतृत्व किया। उधर भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) ने स्याना तहसील का घेराव कर ₹600 प्रति क्विंटल की मांग रखी है। (अमर उजाला; हिंदुस्तान, 17 अक्टूबर 2026)
एक और अहम बिंदु चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य है। यह मूल्य पहली बार जून 2018 में ₹29 प्रति किलो तय हुआ था, जब गन्ने का एफआरपी ₹255 प्रति क्विंटल था। 2018-19 में एफआरपी ₹275 हुआ तो यह मूल्य बढ़ाकर ₹31 प्रति किलो कर दिया गया। उसके बाद से करीब सात साल से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। (हिंदू बिज़नेस लाइन, 15 अक्टूबर 2026; एशियानेट न्यूज़)
समिति चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य के संशोधन, शुगर रिकवरी के परीक्षण की पारदर्शिता, मिलों में तौल की पद्धतियों और मशीनी कटाई वाले गन्ने के वजन में कटौती जैसे बिंदुओं की भी जांच करेगी। यानी यह लड़ाई सिर्फ ₹575 के आंकड़े की नहीं है। यह लड़ाई इस बात की है कि भाव तय करने वाली मेज पर किसान भी बैठेगा या सिर्फ सुना जाएगा।
मुख्य बातें
- अखिल भारतीय किसान सभा ने गन्ने का कानूनी गारंटीकृत मूल्य ₹575 प्रति क्विंटल तय करने और रमेश चंद समिति के पुनर्गठन की मांग की है।
- समिति में चारों सदस्य अधिकारी हैं, किसान संगठनों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं; रिपोर्ट की कोई समयसीमा तय नहीं है।
- यूपी में 2026-27 के एसएपी की घोषणा बाकी है; किसान संगठन ₹500-600 प्रति क्विंटल एसएपी की मांग कर रहे हैं।
स्रोत: कृषक जगत, ग्लोबल एग्रीकल्चर, इकोनॉमिक टाइम्स, हिंदू बिज़नेस लाइन, बिज़नेस स्टैंडर्ड, एशियानेट न्यूज़ (एएनआई), अमर उजाला, हिंदुस्तान, किसान तक, ट्रैक्टर जंक्शन।
