लगातार गन्ने से थकी ज़मीन? फसल चक्र से 45 दिन में पाएं मुफ्त नाइट्रोजन

रामकिशोर का खेत पिछले आठ साल से गन्ना ही दे रहा है। पहली पेड़ी तक उपज 80 क्विंटल प्रति बीघा थी, अब 60 पर अटक गई है। यूरिया की बोरी पहले 2 थी, अब 4 लगती है। खेत में पानी भी पहले जैसा नहीं रुकता। रामकिशोर अकेले नहीं हैं। एक ही फसल लगातार लेने पर ज़मीन की ताकत धीरे-धीरे घटती है। मिट्टी में नाइट्रोजन खत्म होता है, रोग के कीटाणु जमा होते हैं और हर साल खाद का खर्च बढ़ता है।
इसका इलाज कोई महंगी दवा नहीं है। पुराने किसानों का एक आजमाया हुआ तरीका है: फसल चक्र। मतलब गन्ने के बीच-बीच में खेत को दूसरी फसल देना, खासकर ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसल। सिर्फ 45 से 50 दिन में ढैंचा खेत में पलटकर आपको 85 से 120 किलो तक नाइट्रोजन मिल जाता है, बिना एक रुपया खर्च किए। यह गाइड बताती है कि फसल चक्र का सही पैटर्न क्या है और इसे अपनाने में किन बातों का ध्यान रखना है।
फसल चक्र होता क्या है, सीधी भाषा में
फसल चक्र का मतलब है एक ही खेत में फसलों को बारी-बारी से लगाना ताकि मिट्टी को आराम और नया पोषण मिले। गन्ने जैसे मामले में इसका सीधा फायदा तीन तरह से होता है। पहला, दलहनी फसलों की जड़ों में राइजोबियम बैक्टीरिया हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करते हैं। दूसरा, लगातार एक ही फसल से पनपने वाले रोगों का चक्र टूटता है। तीसरा, मिट्टी की भौतिक दशा सुधरती है. पानी रुकने और जड़ें फैलने की क्षमता बढ़ती है।
कृषि विज्ञान केंद्रों की सलाह साफ है। हरी खाद के लिए सनई, ढैंचा, लोबिया जैसी तेज बढ़ने वाली दलहनी फसलें चुनें और 45 से 60 दिन की अवस्था में इन्हें खेत में पलटकर पूरी तरह सड़ने दें। ढैंचा की खासियत यह है कि यह लगभग हर तरह की मिट्टी में उग जाता है और जलभराव व सूखा दोनों सहन कर लेता है। एक हेक्टेयर में उगाई गई हरी खाद की फसल से 8 से 25 टन तक हरी खाद मिलती है, जो मिट्टी में पलटने पर करीब 60 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर देती है। यानी हरी खाद 10 टन गोबर की खाद के बराबर काम करती है।
पैटर्न 1: गन्ना-पेड़ी-ढैंचा-गन्ना (सबसे कारगर चक्र)
पश्चिम यूपी के ज्यादातर किसान इस पैटर्न को आसानी से अपना सकते हैं। बुवाई वाला गन्ना काटने के बाद 2 से 3 पेड़ियां लें। इसके बाद खेत को नई बुवाई से पहले ढैंचे का एक चक्र दें।
समय और मात्रा: मई-जून में ढैंचा की बुवाई करें। प्रति हेक्टेयर 40 से 50 किलो बीज पर्याप्त है। 45 से 50 दिन बाद जब फसल हरी-भरी हो, तब इसे खेत में पलट दें। सिद्धार्थनगर कृषि विज्ञान केंद्र के प्रसार वैज्ञानिकों के अनुसार बुवाई के 45-50 दिन बाद ढैंचे से 20 से 25 टन तक हरी खाद मिलती है, जिससे 85 से 120 किलो तक नाइट्रोजन प्राप्त होता है। पलटने के बाद मिट्टी में पूरी तरह सड़ने का समय दें, फिर अक्टूबर-नवंबर में शरदकालीन गन्ने की नई बुवाई करें।
इस चक्र का बड़ा फायदा यह है कि अगली गन्ना फसल को बुवाई के समय यूरिया की जरूरत कम पड़ेगी। गन्ने की मानक सिफारिश 150 से 180 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की है। हरी खाद से मिली नाइट्रोजन इस जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा कर देती है। शाहजहांपुर के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि दलहनी फसलों से मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ने पर यूरिया की जरूरत घटती है और मिट्टी की उर्वरता सुधरती है।
पैटर्न 2: गन्ने के बाद रबी फसल का चक्र
जिन किसानों के खेत में सिंचाई की अच्छी सुविधा है, वे गन्ने के बाद रबी सीजन में गेहूं, सरसों, आलू या मसूर जैसी फसल ले सकते हैं। यह चक्र उन खेतों के लिए अच्छा है जहां शरदकालीन की बजाय बसंतकालीन गन्ना लगाया जाता है। रबी फसल काटने के बाद फरवरी-मार्च में गन्ने की बुवाई हो जाती है। मसूर और चना जैसी दलहनी फसलें इसमें दोहरा फायदा देती हैं: नकद आय भी और मिट्टी में नाइट्रोजन भी।
पेड़ी चक्र का नियम न भूलें
फसल चक्र की बात करते समय पेड़ी का हिसाब भी समझना जरूरी है। लगातार कई पेड़ियां लेने पर भी उपज घटती है क्योंकि थूंट पुराने हो जाते हैं और खेत में रोग जमा होते हैं। आमतौर पर 2 से 3 अच्छी पेड़ियों के बाद खेत को नया चक्र देना बेहतर रहता है। पेड़ी काटते समय थूंट की चंटाई करना न भूलें. पुराने सूखे थूंट हटाने से नई किल्लों को जगह और हवा मिलती है। जिन खेतों में लाल सड़न का प्रकोप रहा हो, वहां तो फसल चक्र और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि नई फसल से रोग का सिलसिला टूटता है।
तीन गलतियां जो फसल चक्र बिगाड़ देती हैं
पहली गलती है ढैंचा पलटने में देरी करना। 45-50 दिन की अवस्था में जब पौधे कोमल होते हैं, तभी पलटना फायदेमंद है। ज्यादा पुराना होने पर तने सख्त हो जाते हैं और सड़ने में वक्त लगता है। दूसरी गलती है बीज की मात्रा में कंजूसी। प्रति हेक्टेयर 40-50 किलो से कम बीज पर खेत में घना कवर नहीं बनेगा और हरी खाद की मात्रा घट जाएगी। तीसरी गलती है पलटने के तुरंत बाद बुवाई कर देना। हरी खाद को मिट्टी में पूरी तरह सड़ने का समय देना जरूरी है, वरना नाइट्रोजन का पूरा फायदा नहीं मिलता।
मुख्य बातें
- ढैंचा की हरी खाद वाला फसल चक्र 45-50 दिन में 85-120 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर देता है, जो यूरिया का खर्च घटाता है
- मई-जून में 40-50 किलो/हेक्टेयर बीज बोएं, 45-60 दिन की अवस्था में खेत में पलटकर पूरी तरह सड़ने दें
- 2-3 पेड़ियों के बाद खेत को नया चक्र दें; लाल सड़न वाले खेतों में फसल चक्र रोग का सिलसिला तोड़ता है
स्रोत: कृषि जागरण (हरी खाद व उर्वरक सिफारिशें), किसान इंडिया (ढैंचा हरी खाद रिपोर्ट), लाइव हिंदुस्तान (सिद्धार्थनगर कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह), न्यूज18 (शाहजहांपुर कृषि विशेषज्ञ)।
