चावल से एथेनॉल पर 324 करोड़ लीटर की कैप, अब मक्के की मांग 1.6 करोड़ टन तक पहुंचेगी

पेराई सीजन के बीच सरकार ने एथेनॉल नीति में एक और बड़ा बदलाव कर दिया है, और इस बार निशाने पर गन्ना नहीं, चावल है। संशोधित टेंडर में कहा गया है कि एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में भारतीय खाद्य निगम के अतिरिक्त चावल से सिर्फ 324 करोड़ लीटर एथेनॉल ही खरीदा जाएगा, और खराब अनाज से बनने वाले एथेनॉल पर भी 160 करोड़ लीटर की सालाना सीमा लगा दी गई है।
यूपी के गन्ना किसान से इसका क्या लेना देना है? यूपी में 122 चीनी मिलें चलती हैं और इनकी कमाई का एक हिस्सा एथेनॉल से आता है। एथेनॉल की कमाई घटे तो मिलों की नकदी पर दबाव बढ़ता है, और मिलों की नकदी का सीधा रिश्ता किसानों के गन्ना भुगतान से है।
संशोधित टेंडर में क्या-क्या तय हुआ
3 नवंबर के संशोधन के मुताबिक, एफसीआई के 72 लाख टन अतिरिक्त चावल से 324 करोड़ लीटर एथेनॉल बनेगा। यह आवंटन 30 जून 2027 तक पहली तीन तिमाहियों में फैला होगा, हर तिमाही में अधिकतम 108 करोड़ लीटर। एक शर्त यह भी है कि कोई भी एक डिस्टिलरी अपनी कुल पेशकश का 30 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा एफसीआई चावल वाले एथेनॉल से नहीं दे सकेगी।
खराब अनाज से पूरे साल में अधिकतम 160 करोड़ लीटर एथेनॉल मिलेगा, हर तिमाही में 40 करोड़ लीटर की सीमा के साथ। दोनों स्रोतों को जोड़ दें तो कुल 484 करोड़ लीटर होता है, जो तेल कंपनियों के कुल 1,100 करोड़ लीटर के टेंडर का करीब 44 प्रतिशत है। बाकी जरूरत दूसरे स्रोतों से पूरी होगी, जिसमें सबसे बड़ा दावेदार मक्का है।
पहले गन्ने पर रोक लगी, अब चावल पर सीमा
करीब तीन हफ्ते पहले, 16 अक्टूबर को भारत पेट्रोलियम ने तेल कंपनियों की ओर से 2026-27 के लिए करीब 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल का टेंडर जारी किया था। उसी दिन सरकार ने निर्देश दिया कि इस आपूर्ति वर्ष में चीनी का एथेनॉल की ओर रुख शून्य रहेगा, यानी गन्ने के रस, सिरप और बी-हेवी शीरे से बना एथेनॉल इस टेंडर में नहीं खरीदा जाएगा।
सी-हेवी शीरा इस रोक से बाहर है, यानी चीनी निकालने के बाद बचे शीरे से मिलें अब भी कुछ एथेनॉल बेच सकती हैं। लेकिन बी-हेवी शीरे और रस से कमाई का रास्ता बंद है, और अब चावल पर सीमा लगने के बाद पूरा बोझ मक्के पर आ गया है।
मक्का क्यों बन गया सबसे अहम कच्चा माल
उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, 2026-27 में एथेनॉल के लिए मक्के की जरूरत करीब 1.6 करोड़ टन तक पहुंच सकती है, जबकि मौजूदा वर्ष में यह करीब 1.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यानी करीब 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी। एक टन मक्के से करीब 380 लीटर एथेनॉल बनता है, इसलिए करीब 6 अरब लीटर के अंतर को भरने के लिए 1.6 करोड़ टन मक्का चाहिए।
कीमतों का गणित भी अहम है। मक्के से बने एथेनॉल का भाव 68.86 रुपये प्रति लीटर है, जबकि एफसीआई चावल वाले का 60.32 रुपये, खराब अनाज वाले का 64 रुपये और सी-हेवी शीरे वाले का 57.97 रुपये प्रति लीटर है। बी-हेवी शीरे की जगह मक्के से बने हर 100 करोड़ लीटर एथेनॉल पर तेल कंपनियों की करीब 813 करोड़ रुपये की अतिरिक्त लागत आने का अनुमान है।
मक्के की मांग सिर्फ एथेनॉल तक सीमित नहीं है। पोल्ट्री फीड के लिए ही 2027 में 2.2 करोड़ टन से ज्यादा मक्के की जरूरत का अनुमान है। कुल मिलाकर 2027 में मक्के की कुल मांग 5.57 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है।
यूपी के किसान पर इसका सीधा और परोक्ष असर
पहला असर मिलों की कमाई पर पड़ेगा। गन्ने से एथेनॉल का रास्ता पहले ही बंद है और अब सस्ते अनाज वाले स्रोतों पर भी सीमा लग गई है। मिलों को अब चीनी की बिक्री और सी-हेवी शीरे पर ज्यादा निर्भर रहना होगा। चीनी के भाव को कुछ सहारा मिलने की उम्मीद है, लेकिन पेराई सीजन में मिलों की नकदी पर दबाव बना रहेगा।
दूसरा असर उन किसानों पर पड़ेगा जो गन्ने के साथ मक्का भी उगाते हैं। मक्के की मांग बढ़ने से उनके लिए बाजार का रुख मजबूत हो सकता है, लेकिन पोल्ट्री और स्टार्च उद्योग के साथ एथेनॉल उद्योग की खींचतान से भाव में उतार चढ़ाव भी आ सकता है। मक्का बोने से पहले अपनी मंडी का भाव जरूर देख लें।
तीसरी बात पर्ची और भुगतान से जुड़ी है। इस खबर का मतलब यह नहीं है कि गन्ने का भाव घटेगा या भुगतान रुक जाएगा। भुगतान का सीधा रिश्ता मिल की चीनी बिक्री और नकदी से है, इसलिए इस खबर को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए और इसे भुगतान रुकने की खबर की तरह भी नहीं पढ़ना चाहिए।
आने वाले हफ्तों में टेंडर के नतीजे और मक्के की फसल का आकार इस तस्वीर को और साफ करेंगे। पेराई सीजन में मिल की खरीद और भुगतान पर नजर रखना ही किसान के लिए सबसे काम की बात है।
मुख्य बातें
- 3 नवंबर के संशोधित टेंडर में एफसीआई चावल से एथेनॉल पर 324 करोड़ लीटर और खराब अनाज पर 160 करोड़ लीटर की सीमा तय हुई है।
- गन्ने के रस, सिरप और बी-हेवी शीरे से एथेनॉल की खरीद पहले से बंद है, सी-हेवी शीरा अब भी मान्य है।
- एथेनॉल के लिए मक्के की मांग 1.3 से बढ़कर 1.6 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे मिलों की कमाई और किसानों के भुगतान पर परोक्ष असर पड़ेगा।
स्रोत: ज़ी बिज़नेस (4 नवंबर 2026), चिनीमंडी (हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के हवाले से, 4 नवंबर 2026), हिंदुस्तान टाइम्स (21 अक्टूबर 2026)
