50 दिन में खेत को 40 किलो तक नाइट्रोजन: ढैंचा हरी खाद की पूरी विधि

अक्टूबर का महीना है। शरदकालीन गन्ने की बुवाई सिर पर है और हर किसान की जुबान पर एक ही हिसाब है: यूरिया और डीएपी की बोरी इस बार कितने की पड़ेगी। खाद के दाम हर सीजन ऊपर जाते हैं, लेकिन खेत की जान हर सीजन घटती जाती है। ऐसे में एक तरीका है जिसमें खाद खरीदनी नहीं पड़ती, उगानी पड़ती है। नाम है ढैंचा।
ढैंचा एक हरी खाद वाली फसल है, जिसे खेत में उगाकर उसी में जोत दिया जाता है। पौधा सड़कर मिट्टी में मिलता है और खेत को भरपूर नाइट्रोजन, जैविक पदार्थ और पोषक तत्व दे जाता है। गन्ना मिट्टी से सबसे ज्यादा नाइट्रोजन खींचता है, इसलिए यह तरीका गन्ने में खासा मुफीद है।
ढैंचा काम कैसे करता है
ढैंचा दलहनी कुल की फसल है। इसकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणु गांठें बनाते हैं, जो हवा की नाइट्रोजन को पकड़कर मिट्टी में जमा करते हैं। बुवाई के 45 से 50 दिन में ढैंचा करीब 3 फीट ऊंचा हो जाता है। इसी अवस्था में इसे जोत देने पर खेत को एक फसल से 35 से 40 किलो तक प्राकृतिक नाइट्रोजन मिलती है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक यह मात्रा प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत के बराबर मानी जाती है।
फायदा सिर्फ नाइट्रोजन तक सीमित नहीं है। ढैंचा सड़कर जैविक कार्बन बढ़ाता है, मिट्टी भुरभुरी होती है और पानी रोकने की ताकत भी सुधरती है। अगले सीजन में गन्ने का रंग गहरा हरा दिखता है, पौधे मजबूत बनते हैं और रोग का दबाव कम रहता है।
गन्ने के कैलेंडर में ढैंचा कब बोएं
ढैंचा गर्मी और बरसात की फसल है। इसकी बुवाई का सही समय अप्रैल से जुलाई तक माना जाता है। गन्ने के हिसाब से इसे ऐसे जोड़ें।
शरदकालीन बुवाई (अक्टूबर) वालों के लिए यह सबसे मुफीद है: जून-जुलाई में ढैंचा बोएं, सितंबर में जोत दें और अक्टूबर में गन्ने की बुवाई के लिए खेत तैयार। जो किसान इस बार जून में ढैंचा बो चुके हैं, उनके लिए अब जोतने का समय है।
बसंतकालीन बुवाई (फरवरी-मार्च) वाले किसान खरीफ में खाली पड़े खेतों में जून-जुलाई में ढैंचा बोकर सितंबर में जोत सकते हैं। फिर चाहें तो रबी की फसल लें या खेत को सीधे बसंतकालीन गन्ने के लिए तैयार रखें।
बीज कितना और बुवाई कैसे करें
एक एकड़ के लिए 20 से 25 किलो बीज काफी होता है। बुवाई से पहले खेत की हल्की जुताई कर लें और मिट्टी में नमी बनाए रखें। बीज को रातभर पानी में भिगोकर बोने से जमाव बेहतर होता है। छिड़काव विधि से भी बुवाई हो जाती है।
ढैंचा को बढ़ने के लिए यूरिया या भारी रासायनिक खाद की जरूरत नहीं पड़ती, यह खुद हवा से नाइट्रोजन लेता है। विशेषज्ञ सिर्फ थोड़ा फास्फोरस देने की सलाह देते हैं, इससे पौधों की बढ़वार घनी और तेज होती है। बीज सस्ता है और सिंचाई भी ज्यादा नहीं मांगता।
जोतने का सही समय: यहीं सबसे बड़ी गलती होती है
ढैंचा का पूरा फायदा जोतने के समय पर टिका है। बुवाई के 45 से 50 दिन बाद जैसे ही पौधों में फूल आने लगें, उसी समय खेत में जोत दें। फूल आने की अवस्था में पौधे नरम होते हैं, जल्दी सड़ते हैं और नाइट्रोजन भी सबसे ज्यादा होती है।
देर की तो डंठल कड़े हो जाते हैं। कड़े डंठल सड़ने में समय लेते हैं और नाइट्रोजन का फायदा घट जाता है। सबसे बड़ी दिक्कत तब होती है जब फूल से बीज बनने लगते हैं। पके हुए बीज खेत में गिरकर अगले सीजन में खरपतवार की तरह उगते हैं।
खड़ी फसल पर हैरो या कल्टीवेटर चलाकर पौधों को मिट्टी में दबा दें। इसके बाद हल्की सिंचाई कर दें। पानी मिलने पर ढैंचा जल्दी गल जाता है। जोतने के तुरंत बाद गन्ना न बोएं। बुवाई से पहले कुछ दिन का अंतर रखें ताकि हरी खाद पूरी तरह गल जाए। अधगली खाद बुवाई में अड़चन बन सकती है।
हिसाब-किताब: खर्च कितना, बचत कितनी
बीज और जुताई मिलाकर ढैंचा की एक फसल पर प्रति एकड़ करीब 1,500 रुपये खर्च आता है। इसके बदले खेत को 35 से 40 किलो नाइट्रोजन मिलती है, जो लगभग 2 बोरी यूरिया के बराबर है। ऊपर से मिट्टी की सेहत का फायदा अलग।
सीधा हिसाब यह है: करीब 1,500 रुपये लगाकर हजारों रुपये की खाद के बराबर पोषण और खेत की जान, दोनों मिलती हैं। लगातार रासायनिक खाद से थकी हुई मिट्टी के लिए यह सबसे सस्ता इलाज है।
बीज आधे दाम पर: अनुदान कहां से मिलेगा
उत्तर प्रदेश कृषि विभाग हरी खाद को बढ़ावा देने के लिए ढैंचा के बीज पर 50 प्रतिशत तक अनुदान देता है। खरीफ 2026 में विभाग ने हजारों क्विंटल ढैंचा बीज अनुदान पर किसानों को देने की योजना बनाई है। अनुदान पर बीज लेने के लिए अपने नजदीकी राजकीय कृषि बीज भंडार या ब्लॉक के कृषि अधिकारी से संपर्क करें।
एक बात याद रखें: अनुदान वाला बीज अक्सर जल्दी खत्म हो जाता है। बुवाई के समय से पहले ही संपर्क कर लें। सीजन में जाकर हाथ मलने से कुछ नहीं होगा।
तीन गलतियां जो फायदा आधा कर देती हैं
पहली: फूल निकलने के बाद जोतने में देरी। डंठल कड़े होंगे, फायदा घटेगा और पके बीज खरपतवार बनेंगे।
दूसरी: जोतने के बाद सिंचाई न करना। बिना पानी ढैंचा सड़ेगा नहीं और बुवाई लेट होगी।
तीसरी: जोतते ही गन्ना बो देना। हरी खाद को गलने का समय दें, कुछ दिन रुककर बोएं।
मुख्य बातें
- ढैंचा 45-50 दिन में तैयार होने वाली हरी खाद है: एक एकड़ में 20-25 किलो बीज बोएं और फूल आते ही जोत दें।
- एक फसल से खेत को 35-40 किलो नाइट्रोजन मिलती है, जो लगभग 2 बोरी यूरिया के बराबर है; खर्च करीब 1,500 रुपये प्रति एकड़ आता है।
- यूपी कृषि विभाग ढैंचा बीज पर 50 प्रतिशत तक अनुदान देता है; बीज भंडार से समय पर बीज लें और देर से जोतने की गलती न करें।
स्रोत: ट्रैक्टर जंक्शन (ढैंचा से यूरिया बचत और 50 दिन में तैयार फसल पर रिपोर्ट), किसान हेल्पलाइन (ढैंचा हरी खाद की विधि और नाइट्रोजन मात्रा), कृषि जागृति (यूपी में ढैंचा बीज पर 50% अनुदान, खरीफ 2026)।
