चीनी ₹55 किलो बिकी, मिलें कमाई में — गन्ने का भाव ₹400 पर क्यों अटका?

दुकान पर चीनी खरीदते वक्त भाव सुनकर हाथ ठिठक जाता है: 55 रुपये किलो। और उसी दुकान से घर लौटता गन्ना किसान सोचता है कि उसी चीनी का कच्चा माल उसने ₹400 क्विंटल पर दिया था। आखिर यह अंतर जाता कहां है? यह सवाल आज का नहीं है, लेकिन इस साल इसका जवाब ज्यादा खटक रहा है, क्योंकि चीनी के दाम एक साल में 19 प्रतिशत चढ़ गए हैं।
उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 8 अक्टूबर 2026 को खुदरा चीनी का भाव ₹55.21 प्रति किलो रहा, जबकि 8 अक्टूबर 2025 को यही चीनी ₹46.49 किलो बिक रही थी। यानी ठीक 18.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी। 2021 में चीनी ₹42.18 किलो थी, फिर करीब पांच साल तक भाव लगभग स्थिर रहा। असली उछाल पिछले एक साल में आया है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुताबिक खुदरा चीनी ₹55.34 प्रति किलो तक पहुंची, जो पिछले साल से 19 प्रतिशत ज्यादा है।
भाव का पूरा ग्राफ: 65 से 55 तक की कहानी
यह तेजी अचानक नहीं आई। फूड प्राइस वॉच के आंकड़े बताते हैं कि 20 जुलाई को ₹48.18 किलो वाली चीनी 26 अगस्त को ₹65.05 के शिखर पर पहुंची, फिर सरकार की सख्ती से 20 सितंबर तक ₹57.54 पर आ गई। दो राष्ट्रीय रिपोर्टों में यही आंकड़े दोहराए गए हैं।
मगर भाव गिरकर भी 55 से नीचे नहीं आया। वहीं 2025-26 सीजन में गन्ने का SAP अगेती के लिए ₹400 और सामान्य प्रजाति के लिए ₹390 प्रति क्विंटल ही रहा। दुकान पर 55 रुपये किलो, खेत से 400 रुपये क्विंटल, इसी अंतर पर इस बार किसान संगठन सबसे तेज आवाज उठा रहे हैं।
सरकार ने खुद मानी भाव चढ़ने की ये वजहें
खाद्य मंत्रालय ने चीनी की तेजी के पीछे कई कारक गिनाए हैं: प्रतिकूल मौसम से उत्पादन में अनुमान से बड़ी गिरावट, त्योहारी सीजन में बढ़ी मांग, कसे हुए वैश्विक भंडार और व्यापार के कुछ वर्गों की सट्टेबाजी व जमाखोरी। इसमें सबसे अहम है उत्पादन का आंकड़ा। बिजनेस रिपोर्टों के मुताबिक 2025-26 सीजन का चीनी उत्पादन अब 30.6 मिलियन टन आंका जा रहा है, जबकि शुरुआती अनुमान 34.3 मिलियन टन का था। लाल सड़ांध (रेड रॉट), टॉप बोरर कीट और जलभराव ने फसल को काटा। महाराष्ट्र में भी मराठवाड़ा में कम बारिश ने फसल को नुकसान पहुंचाया।
सरकार का साफ कहना है कि एथेनॉल की तरफ चीनी की खपत बढ़ना इस महंगाई की मुख्य वजह नहीं है। चीनी उद्योग करीब पांच करोड़ किसानों की आजीविका और मिलों में करीब पांच लाख नौकरियों से जुड़ा है, इसलिए सरकार भाव पर काबू के लिए लगातार कदम उठा रही है।
भाव काबू करने के लिए सरकार ने क्या किया
कीमतें थामने के लिए केंद्र ने 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात मंजूर किया। 15 अक्टूबर से 30 नवंबर तक डीलर एक बार में 1,000 क्विंटल से ज्यादा चीनी नहीं रख सकेंगे और मिला स्टॉक 15 दिन में बेचना होगा। मिठाई कारखानों और फूड प्रोसेसिंग इकाइयों जैसे बड़े उपभोक्ताओं पर भी 15 दिन की खपत से ज्यादा स्टॉक रखने पर रोक है। सितंबर से मिलों को मासिक की जगह पाक्षिक रिलीज कोटा दिया जा रहा है, ताकि चीनी बाजार में लगातार आती रहे।
सरकार ने मिलों से 15 अक्टूबर के आसपास पेराई शुरू करने को भी कहा है, ताकि बाजार को भरोसा मिले कि रोज नई चीनी बन रही है। जानकारों के मुताबिक भाव अब चरम के करीब हैं और आगे नरमी आ सकती है।
किसान की जेब पर इसका क्या असर पड़ेगा
चीनी महंगी होने का सीधा फायदा मिलों को मिलता है, और उनकी जेब भरी हो तो गन्ने का बकाया चुकाने की ताकत बढ़ती है। यूपी में जिन मिलों पर करोड़ों का बकाया अटका है, वहां के किसानों के लिए यह अच्छी खबर हो सकती है। बकाया भुगतान की लड़ाई में मिल की माली हालत ही सबसे बड़ा हथियार है।
इसी दम पर किसान संगठन 2026-27 के लिए गन्ने का भाव कम से कम ₹500 प्रति क्विंटल तय करने की मांग उठा रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) की किसान युवा संसद में यही मांग पुरजोर उठी। संगठन का तर्क सीधा है: जब चीनी 55 रुपये किलो बिक रही है तो गन्ना 400 पर कैसे अटका रहे?
जल्दी पेराई का मतलब है खेत समय पर खाली होंगे और सरसों या गेहूं की बुवाई का मौका मिलेगा। पर्ची का सिलसिला भी चल पड़ेगा। लेकिन सावधानी भी जरूरी है: भाव चरम के करीब हैं और सरकार किसी भी दिन और सख्त कदम उठा सकती है। इसलिए मंडी के ताजा भाव पर नजर रखें और जल्दबाजी में गन्ना बेचने से बचें।
मुख्य बातें
- खुदरा चीनी ₹55.21/किलो (8 अक्टूबर 2026), एक साल पहले ₹46.49 थी — 18.8% की तेजी।
- 2025-26 का उत्पादन घटकर 30.6 मिलियन टन रहने का अनुमान; रेड रॉट, टॉप बोरर और जलभराव बड़ी वजह।
- सरकार ने 10 लाख टन आयात, डीलरों पर 1,000 क्विंटल स्टॉक सीमा और 15 अक्टूबर से जल्दी पेराई जैसे कदम उठाए।
- किसान संगठन 2026-27 के लिए ₹500/क्विंटल गन्ना भाव की मांग कर रहे हैं; चीनी की तेजी से मिलों की भुगतान क्षमता बढ़ेगी।
स्रोत: एनडीटीवी (उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़े), फाइनेंशियल एक्सप्रेस (9-10 अक्टूबर 2026), स्क्रॉल.इन व न्यूज़लॉन्ड्री (फूड प्राइस वॉच आंकड़े, उत्पादन अनुमान), रूरल वॉइस (सरकारी उपाय)।
