बस्ती में 60% सर्वे में किस्म ही गलत: खेत में 94184, कागज में 'रिजेक्ट' 5191

“पेड़ी का गन्ना, जो हर साल उसी खेत में उगता है, इस बार कागजों में ‘रिजेक्ट’ की श्रेणी में कैसे आ गया?” बस्ती के शिवपुर गांव के किसान गगन सिंह ने रविवार को जांच टीम के सामने यही सवाल रखा। मौजूद अधिकारियों में से किसी के पास इसका जवाब नहीं था।
मामला पेराई सत्र 2026-27 के सट्टा सर्वे का है। किसानों की शिकायत पर जिला गन्ना अधिकारी जगभान सिंह भदौरिया रविवार को अपनी टीम के साथ शिवपुर गांव पहुंचे और किसानों के खेतों में जाकर गन्ने की किस्मों का सर्वे रिकॉर्ड से मिलान किया। कृषि वैज्ञानिक डॉ. अरविंद कुमार के अनुसार जांचे गए प्लॉटों में सिर्फ 40 प्रतिशत रिकॉर्ड सही पाए गए हैं, बाकी में किस्म की गड़बड़ी है। रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी।
सबसे चौंकाने वाला केस गांव के अशोक सिंह के खेत का रहा। उनके प्लॉट में लगी फसल 94184 प्रजाति की निकली, जबकि सर्वे रिकॉर्ड में उसके सामने 5191 दर्ज था। 5191 रिजेक्ट श्रेणी की प्रजाति मानी जाती है। यानी खेत में अच्छी प्रजाति का गन्ना खड़ा होने के बावजूद कागजों में उसे ऐसी किस्म दर्ज कर दिया गया था, जिसे मिल लेने से इनकार कर सकती है। टीम ने गांव के ध्रुवनरायन सिंह के खेत में भी फसल की वेराइटी का सत्यापन किया।
कागज में गलती, चोट सीधे किसान की जेब पर
गन्ने का सट्टा सर्वे सिर्फ रकबे का हिसाब नहीं है। उसी रिकॉर्ड में दर्ज किस्म तय करती है कि मिल किसान की फसल किस भाव और किन शर्तों पर खरीदेगी। रिजेक्ट किस्म दर्ज होने का मतलब है कि पेराई के समय मिल गन्ना लेने से इनकार कर सकती है, या तौल में कटौती कर सकती है। पर्ची और भुगतान, दोनों अटक सकते हैं।
बात को गंभीर बनाने वाली चीज है समय। पेराई सत्र 2026-27 अब नजदीक है। ऐसे मौके पर सर्वे रिकॉर्ड में किस्म की गलती सीधे किसान की कमाई पर चोट करती है। गगन सिंह का सवाल इसीलिए वाजिब है कि पिछले साल जब किसी किसान का गन्ना रिजेक्ट श्रेणी में दर्ज नहीं हुआ था, तो उसी पेड़ी का गन्ना इस बार रिजेक्ट कैसे हो गया। यह सवाल सिर्फ एक गांव का नहीं, पूरे प्रदेश के हर उस किसान का है जिसका सर्वे रिकॉर्ड उसने खुद कभी नहीं देखा।
जांच में ही उठे पक्षपात के आरोप
जांच के दौरान एक और बात सामने आई जिसने मामले को और उलझा दिया। किसानों ने आपस में ही एक-दूसरे पर पक्षपात के आरोप लगाए। यानी सर्वे में किस्म दर्ज करने की प्रक्रिया पर खुद गांव के किसानों का भरोसा डगमगाया हुआ है।
यह छोटी बात नहीं है: जब रिकॉर्ड बनाने की प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहा हो, तो निष्पक्ष सर्वे की उम्मीद कैसे की जाए।
शिवपुर की घटना अपवाद नहीं
बस्ती का मामला अलग-थलग नहीं है। कर्नाटक और महाराष्ट्र के किसान भी किस्म और रिकवरी के आंकड़ों में हेरफेर तथा तौल में कटौती को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। 12 अक्टूबर को दिल्ली में केंद्रीय मंत्रियों के साथ तीन घंटे की बैठक के बाद केंद्र ने एक हफ्ते में हाई-लेवल जॉइंट कमेटी बनाने का फैसला किया है। इस कमेटी पर हमने विस्तार से लिखा था: तौल-रिकवरी विवाद: केंद्र की हाई-लेवल कमेटी, एक हफ्ते में रिपोर्ट।
बस्ती की जांच रिपोर्ट जब शासन को पहुंचेगी, तो यह मामला उसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा बनेगा। पर पेराई का सीजन इंतजार नहीं करेगा, इसलिए किसानों को अभी से सतर्क होना होगा।
पेराई से पहले खुद करें ये तीन काम
बस्ती की घटना से एक सबक साफ है: सर्वे रिकॉर्ड पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। पेराई शुरू होने से पहले हर किसान ये तीन काम खुद करे:
- पोर्टल पर रिकॉर्ड देखें: enquiry.caneup.in पर अपना सट्टा सर्वे रिकॉर्ड खोलें और रकबा व किस्म जांचें। पूरी विधि सर्वे रिकॉर्ड चेक गाइड में है।
- खेत-कागज का मिलान करें: खेत में जो किस्म लगी है, वही कागज में दर्ज होनी चाहिए। अंतर दिखे तो गन्ना पर्यवेक्षक या सहकारी समिति को लिखित में सुधार मांगें। सिर्फ मौखिक बात से काम नहीं चलेगा।
- शिकायत दबाकर न रखें: गन्ना विकास विभाग का टोल-फ्री नंबर 1800-121-3203 है, जहां शिकायत दर्ज की जा सकती है। जिला गन्ना अधिकारी कार्यालय में लिखित शिकायत भी असर करती है — शिकायत के पांच असरदार तरीके यहां पढ़ें। बस्ती में जांच किसानों की शिकायत पर ही शुरू हुई थी, इसलिए समय पर दर्ज शिकायत सबसे बड़ा हथियार है।
मुख्य बातें
- बस्ती के शिवपुर गांव में किसानों की शिकायत पर जिला गन्ना अधिकारी जगभान सिंह भदौरिया की टीम ने रविवार को खेतों में गन्ने की वेराइटी की जांच की।
- कृषि वैज्ञानिक डॉ. अरविंद कुमार के अनुसार जांचे गए प्लॉटों में सिर्फ 40% रिकॉर्ड सही मिले; शेष में किस्म की गड़बड़ी थी। एक खेत में 94184 प्रजाति लगी थी, लेकिन रिकॉर्ड में 5191 (रिजेक्ट) दर्ज था।
- जांच रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। पेराई से पहले हर किसान enquiry.caneup.in पर अपना सर्वे रिकॉर्ड जरूर जांच ले और गलती दिखे तो लिखित में सुधार मांगें।
स्रोत: हिंदुस्तान (बस्ती संस्करण, 12 अक्टूबर 2026), चिनीमंडी (12 अक्टूबर 2026)
