बरेली: मिल में 45, दुकान पर 60 - चीनी के दाम पर स्टॉक-लिमिट भी बेअसर

अक्तूबर की शुरुआत में बरेली की दुकानों पर चीनी 50 रुपये किलो मिल रही थी। तीन हफ्ते भी नहीं बीते और भाव 60 रुपये किलो पहुंच गया। त्योहारों का सीजन है। मिठाइयों की मांग बढ़ी है और घर का बजट बिगड़ रहा है। सवाल सीधा है। जब जिले की मिलों में चीनी भरी पड़ी है तो दाम क्यों चढ़ रहे हैं?
रिपोर्टों को खंगाला तो एक और उलझन सामने आई। स्टॉक के आंकड़े ही एक जैसे नहीं हैं। एक रिपोर्ट 1.24 लाख क्विंटल बताती है, दूसरी 85 हजार क्विंटल।
दो रिपोर्ट, दो स्टॉक
दैनिक जागरण की 14 अक्तूबर की रिपोर्ट के मुताबिक सेमीखेड़ा चीनी मिल में 57 हजार क्विंटल और फरीदपुर स्थित द्वारिकेश शुगर मिल में 67 हजार क्विंटल चीनी का स्टॉक है। दोनों को मिलाकर कुल 1.24 लाख क्विंटल। मिलों में भाव 4,500 से 4,700 रुपये प्रति क्विंटल, यानी 45 से 47 रुपये किलो बताया गया। अमृत विचार ने 19 अक्तूबर की रिपोर्ट में इन्हीं आंकड़ों को दोहराया।
वहीं अमर उजाला की 15 अक्तूबर की रिपोर्ट कुछ और कहती है। गन्ना समिति के हवाले से उसके मुताबिक दोनों मिलों के पास 85 हजार क्विंटल चीनी बची है। जिले में रोज करीब पांच हजार क्विंटल चीनी की खपत होती है। श्यामगंज मंडी से शाहजहांपुर, बदायूं, पीलीभीत और उत्तराखंड तक चीनी की आपूर्ति होती है।
अब सवाल उठता है। अगर 14 अक्तूबर को स्टॉक 1.24 लाख क्विंटल था तो एक दिन बाद 85 हजार कैसे रह गया? रोज पांच हजार क्विंटल की खपत से भी इतनी गिरावट नहीं आती। जिला गन्ना अधिकारी खुद कह रहे हैं कि मिलों से चीनी का उठान नहीं हो रहा। यानी आंकड़े जुटाने का तरीका ही अलग-अलग लगता है। किसान हो या उपभोक्ता, दोनों के भरोसे के लिए यह उलझन अच्छी नहीं है।
मिल से दुकान तक 15 रुपये का फासला
मिल भाव 45 से 47 रुपये किलो है और फुटकर बाजार में चीनी 60 रुपये किलो बिक रही है। परिवहन, भंडारण और कारोबार का खर्च जुड़ता है, यह बात समझ में आती है। लेकिन 13 से 15 रुपये का फासला हर बार त्योहारों के सीजन में ही क्यों चौड़ा होता है?
जागरण की रिपोर्ट में इस खेल का एक कड़वा पहलू भी है। उसके मुताबिक मिल कर्मियों और कुछ व्यापारियों की मिलीभगत से चीनी के दाम बढ़ाए जा रहे हैं, और जिम्मेदार अधिकारी इस खेल को पकड़ने की जहमत नहीं उठा रहे। त्योहारों पर दामों में बार-बार बढ़ोतरी प्रशासन की उदासीनता भी दिखाती है।
अमर उजाला की रिपोर्ट का शीर्षक खुद बताता है कि प्रशासन को भी शक है। जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा तय की गई है। यानी कहीं न कहीं माल दबाकर रखने का खेल चल रहा है।
पेराई की देरी से दाम का सीधा कनेक्शन
इस कहानी का दूसरा सिरा खेतों में है। जिले में पेराई सत्र इस बार 15 दिन पहले शुरू करने की तैयारी थी। लेकिन बार-बार हो रही बारिश ने कार्यक्रम बिगाड़ दिया। खेतों में पानी भरा है। गन्ने की कटाई और छिलाई में परेशानी आ रही है। ट्रैक्टर-ट्रॉली गीले खेतों तक नहीं पहुंच पा रही।
जिला गन्ना अधिकारी दिलीप सैनी के मुताबिक पिछले साल पेराई नवंबर के पहले सप्ताह में शुरू हुई थी। इस बार करीब एक सप्ताह की देरी की संभावना है और मिलों के नवंबर के मध्य तक चालू होने के आसार हैं। उपायुक्त गन्ना राजेश कुमार मिश्र का कहना है कि खेतों में पानी भरा है, कटाई-छोलाई मुश्किल है। नवंबर के दूसरे सप्ताह में ही पेराई शुरू हो सकेगी।
इसका मतलब साफ है। नए सत्र की ताजी चीनी बाजार में आने से पहले दामों में राहत की उम्मीद कम है। चीनीमंडी की एक रिपोर्ट के मुताबिक बारिश से गन्ने में पानी की मात्रा 70 से बढ़कर 80 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इससे सुक्रोज घटता है और चीनी की रिकवरी कम होती है।
किसान के लिए इसका मतलब
पहला काम खेतों से पानी की निकासी का है। नालियों से पानी निकालकर जमीन सुखाने की कोशिश करें। गीले खेत का कटा गन्ना मिल तक पहुंचने में और खराब होगा।
दूसरा, जिन खेतों में गन्ना हवा से गिर चुका है, उसे ज्यादा दिन खेत में न रखें। गिरे हुए गन्ने में जमीन के संपर्क से खराबी जल्दी आती है और चीनी की मात्रा घटती है।
तीसरा, गेहूं की बुवाई का कैलेंडर दिमाग में रखें। नवंबर का पहला पखवाड़ा बुवाई का इष्टतम समय माना जाता है। पेराई देर से होगी तो खेत देर से खाली होगा। जिन खेतों से गन्ना हट चुका है, वहां जमीन तैयार रखें।
ई-गन्ना ऐप पर अपना सट्टा और पर्ची का कैलेंडर भी जांच लें। बैंक खाता सक्रिय और आधार से लिंक रखें। भुगतान में देरी की सबसे आम वजह निष्क्रिय खाते या गलत खाता विवरण होते हैं।
मुख्य बातें
- अक्तूबर की शुरुआत में 50 रुपये किलो वाली चीनी बरेली में अब 60 रुपये किलो है। स्टॉक के आंकड़ों में ही उलझन है। एक रिपोर्ट 1.24 लाख क्विंटल बताती है, दूसरी 85 हजार क्विंटल।
- मिल भाव 45-47 रुपये किलो के बावजूद फुटकर भाव 60 रुपये। मिलीभगत के आरोपों के बीच जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक-सीमा तय की गई है।
- बारिश से पेराई नवंबर के मध्य तक टल सकती है। नए सत्र की ताजी चीनी आने से पहले दाम घटने की उम्मीद कम है। गिरा हुआ गन्ना जल्द मिल पहुंचाएं और गेहूं की बुवाई की तैयारी रखें।
स्रोत: दैनिक जागरण (14 अक्तूबर 2026), अमर उजाला (15 अक्तूबर और 27 सितंबर 2026), अमृत विचार (19 अक्तूबर 2026), चीनीमंडी (29 सितंबर 2026)
