राज्यपाल देंगी सम्मान: अचल मिश्रा ने एकड़ की गन्ना उपज 700 से 2,000 क्विंटल कैसे की

एक एकड़ खेत से साल भर की मेहनत के बाद 700-800 क्विंटल गन्ना निकलता है। क्या वही खेत 2,000 क्विंटल तक दे सकता है? लखीमपुर खीरी के अचल मिश्रा का जवाब हां है, और इसी जवाब की बदौलत आज, 15 अक्टूबर को कानपुर में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करेंगी।
यह सम्मान सिर्फ एक मेडल नहीं है। यह उन लाखों किसानों के लिए सबूत है कि खेती में पढ़ाई, प्रयोग और समूह, तीनों का सही मिश्रण रकबा बढ़ाए बिना आमदनी बढ़ा सकता है। अचल की कहानी को जानना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि उन्होंने जो तरीके अपनाए, वे किसी बड़े बजट के नहीं हैं।
आज कानपुर में क्या हो रहा है
कानपुर का राष्ट्रीय शर्करा संस्थान आज अपना 91वां स्थापना दिवस मना रहा है। समारोह की मुख्य अतिथि राज्यपाल आनंदीबेन पटेल होंगी और गन्ना विकास एवं शर्करा उद्योग मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक इस मौके पर वैज्ञानिक खेती से प्रति हेक्टेयर उल्लेखनीय उपज लेने वाले प्रगतिशील गन्ना किसानों, संस्थान के पूर्व छात्रों और वैज्ञानिकों को सम्मानित किया जाएगा।
समारोह सुबह 11 बजे संस्थान परिसर स्थित शर्करा सौध में होगा। साथ में जल संरक्षण और प्रदूषण रोकथाम पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी भी आयोजित होगी, जिसमें चीनी और आसवनी उद्योगों के अधिकारियों को जल उपचार और शून्य तरल निष्कासन जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।
वकील की डिग्री, खेत की कहानी
अचल कुमार मिश्रा लखीमपुर खीरी के गोला तहसील में बिजुआ ब्लॉक के मेड़ाईपुरवा गांव के रहने वाले हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री लेने के बाद पिता के निधन पर वे शहर छोड़कर गांव लौट आए। गांव के लोग आज उन्हें ‘बड़े भैय्या’ कहकर पुकारते हैं, यह पहचान उन्होंने खेती से कमाई है।
खेती उन्होंने 2005 में शुरू की थी। कृषि जागरण की पुरानी रिपोर्ट के अनुसार 2007-08 में ही उन्होंने गन्ने के सर्वाधिक उत्पादन के पैमाने पर पूरे उत्तर प्रदेश में प्रथम स्थान हासिल किया था। उनके खेतों और एक पर्यटन केंद्र के जरिए इलाके के करीब 50 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिलता है।
उपज दोगुनी-तिगुनी कैसे हुई
सबसे बड़ा बदलाव बुवाई के तरीके में आया। अचल ने पारंपरिक बुवाई छोड़कर ट्रेंच ओपनर और फिर ट्रेंच रिंग ओपनर तकनीक अपनाई। इससे पानी की बचत हुई और गन्ने को जड़ों तक पोषक तत्व ज्यादा मिले। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक जब आसपास के किसान रासायनिक खाद पर निर्भर थे, तब अचल ने जैविक खाद का रास्ता चुना।
उनके खेत में गोबर की खाद और हरी खाद का इस्तेमाल होता है, कीटनाशक न्यूनतम मात्रा में डालते हैं। यूरिया का प्रयोग स्प्रे के रूप में करते हैं, मात्र 2-3 किलोग्राम प्रति एकड़।
किस्मों के चुनाव पर भी प्रयोग किया गया। Co 238 किस्म से प्रति बीघा 250 क्विंटल से ऊपर की उपज मिली और गन्ने की लंबाई लगभग 18.5 फीट तक पहुंची। गन्ने के साथ तिलहन, दलहन और फूलों की सह-फसली खेती से कुल आमदनी भी बढ़ी।
अकेले नहीं, 400 किसानों को साथ लिया
अचल ने एक किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनाकर करीब 400 किसानों को साथ जोड़ा है। संगठन से जुड़े किसान सह-फसली खेती के साथ बीज उत्पादन करते हैं और गुड़ व काला नमक चावल जैसे उत्पाद बनाकर बेचते हैं, जो उनके ही खेतों की उपज से तैयार होते हैं।
उन्हें ‘करोड़पति किसान’ सम्मान मिल चुका है, कृषि मंत्रालय ने उन्हें देश के प्रगतिशील प्रेरणादायक किसानों में शामिल किया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने ‘इनोवेटिव फार्मर’ प्रमाणपत्र दिया और मुख्यमंत्री ने राज्य के सबसे अधिक गन्ना उत्पादन करने वाले किसानों में से एक के रूप में उनका सम्मान किया था।
संस्थान, जिसकी स्थापना 1936 में हुई
राष्ट्रीय शर्करा संस्थान की उम्र इस सम्मान को और वजन देती है। अक्टूबर 1936 में हरकोर्ट बटलर टेक्नोलॉजिकल इंस्टीट्यूट के शर्करा अनुभाग को अलग करके इंपीरियल इंस्टीट्यूट ऑफ शुगर टेक्नोलॉजी के रूप में इसकी स्थापना हुई थी। 1957 में यह राष्ट्रीय शर्करा संस्थान बना और 1963 में कल्याणपुर स्थित 525 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल वाले परिसर में स्थानांतरित हुआ। चीनी उद्योग के आधुनिकीकरण में इसकी भूमिका बड़ी रही है, और ऐसे मंच पर एक प्रगतिशील किसान का सम्मानित होना संकेत है कि नीति बनाने वाले भी अब खेत की नवाचारी सोच को गंभीरता से ले रहे हैं।
दूसरे किसानों के काम की चार बातें
अचल की कहानी से हर गन्ना किसान चार चीजें सीधे उतार सकता है। पहली, ट्रेंच विधि से बुवाई: नाली जैसी कतारों में बुवाई से पानी कम लगता है और जड़ों तक खाद पहुंचती है। दूसरी, पत्ती को जलाना छोड़कर खेत में सड़ाकर खाद बनाएं, यह पेड़ी फसल की ताकत बढ़ाता है। तीसरी, कीटनाशक कम करें और गोबर की खाद व हरी खाद को मुख्य रखें, लागत घटती है और जमीन की सेहत बनी रहती है। चौथी, गन्ने की कतारों के बीच खाली जगह में तिलहन या दलहन जैसी छोटी फसल लगाएं, खेत का हर इंच कमाएगा। और सबसे बड़ी बात, संगठन बनाकर करने का सौदा अकेले करने से बेहतर होता है। एफपीओ जैसा समूह बनाकर बीज उत्पादन और उत्पाद बिक्री दोनों किसानों के पक्ष में झुकती हैं।
मुख्य बातें
- लखीमपुर खीरी के अचल मिश्रा को आज 15 अक्टूबर को एनएसआई कानपुर के 91वें स्थापना दिवस पर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल सम्मानित करेंगी।
- ट्रेंच तकनीक, जैविक खाद और सह-फसली खेती से उनकी प्रति एकड़ गन्ना उपज रिपोर्टों के मुताबिक कई गुना बढ़ी।
- उन्होंने करीब 400 किसानों का एफपीओ बनाया है और उन्हें पहले ‘करोड़पति किसान’ सम्मान, आईसीएआर का ‘इनोवेटिव फार्मर’ प्रमाणपत्र भी मिल चुका है।
स्रोत: दैनिक जागरण (14 अक्टूबर 2026), लाइव हिन्दुस्तान (14 अक्टूबर 2026), हिन्दुस्तान टाइम्स, पीटीआई/चिनीमंडी, कृषि जागरण
